Monday, June 29, 2009

क्षमा

मान्यवर मित्रो ....

मैं कुछ दिनों के लिए लेखन से विराम ले रहा हूँ .... मन कुछ ठीक नहीं है ....

यदि किसी कारणवश मुझसे कोई गलती हो गयी हो ,या मेरे कारण किसी को दुःख पहुंचा हो या ,मेरी कोई बात से कोई आहत हुआ हो तो मैं क्षमा मांगता हूँ ..

क्षमापना सारी गलतियों व अपराधों को धोने का अमोघ उपाय है. मनुष्य की श्रेष्टथा इसी में है कि वह अपनी भूलो को स्वीकार करे. जो अपराध को स्वीकार नही करता वह अपराध से कभी मुक्त भी नही हो पाता . जीवन पथ इतना लंबा और अटपटा है कि उसे यदि क्षमापना से बार बार बुहारा न जाए तो वह कुडादान बन जायेगा. दुनिया में सारे धर्मग्रंथो और उपदेशों का सार है कि क्षमा को छोड़कर हम कितना भी चले कहीं भी नही पहुँच पाएंगे. याथार्थ तो यही है कि आत्म उत्कर्ष के किसी भी शिखर पर कोई कभी पहुँचेंगा तो वह क्षमा के साथ ही पहुँचेंगा .

मैं क्षमा द्वार से प्रवेश कर ,मनो मालिन्य ,राग, द्वेष और अहंकार से मुक्त होना चाहता हूँ ..

क्षमा प्राथी

विजय

Saturday, June 27, 2009

मैं तुमसे प्यार करता हूँ ......


अक्सर मैं सोचता हूँ कि,

मैं तुम्हारे संग बर्फीली वादियों में खो जाऊँ !
और तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हे देखूं ...
तुम्हारी मुस्कराहट ;
जो मेरे लिए होती है , बहुत सुख देती है मुझे.....
उस मुस्कराहट पर थोडी सी बर्फ लगा दूं .

यूँ ही तुम्हारे संग देवदार के लम्बे और घने सायो में
तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलूँ......
और उनके सायो से छन कर आती हुई धुप से
तुम्हारे चेहरे पर आती किरणों को ,
अपने चेहरे से रोक लूं.....

यूँ ही किसी चांदनी रात में
समंदर के किनारे बैठ कर
तुम्हे देखते हुए ;
आती जाती लहरों से तेरा नाम पूछूँ ..

यूँ ही ,किसी घने जंगल के रास्तो पर
टेड़े मेडे राहो पर पढ़े सूखे पत्तो पर चलते हुए
तुम्हे प्यार से देखूं ..

और ; तुम्हारा हाथ पकड़ कर आसमान की ओर देखूं
और उस खुदा का शुक्रिया अदा करूँ .
और कहूँ कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ....

Monday, June 15, 2009

आओ सजन

दोस्तों , मेरी नयी नज़्म " आओ सजन " आपके खिदमत में पेश है ....उम्मीद है की हमेशा की तरह आप सबका प्यार और आर्शीवाद इस कविता को मिलेंगा . ये नज़्म एक सूफियाना भक्ति गीत है . इस कविता का जन्म एक गुरूद्वारे में हुआ था ..मैं एक कीर्तन सुन रहा था ..उसमे ये शब्द थे " आओ सजन " . ये शब्द मन में बस गए और मुझे बहुत दिनों तक मुझे haunt करते रहे . और आज इसे आप सबको नज़र कर रहा हूँ .. दोस्तों ; मैं ये नज़्म ; आदरणीय प्राण शर्मा जी , आदरणीय महावीर जी , आदरणीय तेजेंद्र जी और मेरे मित्र मुफलिस जी और सुशील छोक्कर जी को समर्पित कर रहा हूँ ...ये सारे गुरु -उस्ताद और मेरे प्रिय मित्र है और देखा जाए तो उस्ताद और मित्र भी मेरे लिए सजन ही है.... दोस्तों ,जब मैंने इस नज़्म को complete किया तो एक रुहानी positive energetic aroma मेरे आस पास था .मुझे उम्मीद है की आप के साथ भी कुछ ऐसा experience हो ..... I am sure that this poem will take you to an inner journey of soul...........MAY GOD BLESS YOU ALL. आपके प्रेम के लिए ,आप सब का आभार !!!


आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !
तेरे दर्शन को तरसे है ; मेरे भीगे नयन !
घर , दर सहित सजाया है ; अपने मन का आँगन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

तू नहीं तो जग , क्यों सूना सूना सा लगता है !
तू नहीं तो हर कोई , पराया सा नज़र आता है !
इतनी बड़ी दुनिया में कौन है यहाँ मेरा ; तेरे बिन !
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

बहुत घूम चूका मैं ; मंदिर ,मस्जिद और गुरुद्वारे !
किसी अपने को न मिल पाया ; मैं किसी भी द्वारे...!
कहीं भी तू न मिला , भटके है हर जगह मेरा मन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

जीवन में छाये है उदासी के साये बहुत गहरे !
सबने छला है मुझको तेरे नाम से ; प्रभु मेरे !
अब तो तेरे मेहर की बरसात हो मेरे सूने आँगन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

बुल्ले शाह ने कहा था ' रमज सजन दी होर '
आज समझा हूँ कि , क्यों खींचे तू मुझे अपनी ओर !
तू ही मेरा सजन ,बस तू ही मेरा सजन !
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!