Tuesday, January 19, 2010

तलाश

कुछ तलाशता हुआ मैं कहाँ आ गया हूँ .....
बहुत कुछ पीछे छूट गया है .....
मेरी बस्ती ये तो नहीं थी .....

मट्टी की वो सोंघी महक ...
कोयल के वो मधुर गीत ...
वो आम के पेड़ो की ठंडी ठंडी छांव ..
वो मदमाती आम के बौरो की खुशबू ...
वो खेतो में बहती सरसराती हवा ....
उन हवा के झोंको से बहलता मन ..
वो गायो के गले बंधी घंटियाँ ...
वो मुर्गियों की उठाती हुई आवाजे ....
वो बहुत सारे बच्चो का साथ साथ चिल्लाना ....
वो सुख दुःख में शामिल चौपाल ....
लम्बी लम्बी बैठके ,गप्पो की …

और सांझ को दरवाजे पर टिमटिमाता छोटा सा दिया .....
वो खपरैल की छप्पर से उठता कैसेला धुआ...
वो चूल्हे पर पकती रोटी की खुशबू ...
वो आँगन में पोते हुए गोबर की गंध ...

वो कुंए पर पानी भरती गोरिया ...
वो उन्हें तांक कर देखते हुए छोरे...
वो होली का छेड़ना , दिवाली का मनाना ...

वो उसका; चेहरे के पल्लू से झांकती हुई आँखे;
वो खेतो में हाथ छुड़ाकर भागते हुए उसके पैर ;
वो उदास आँखों से मेरे शहर को जाती हुई सड़क को देखना

वो माँ के थके हुए हाथ
मेरे लिए रोटी बनाते हाथ
मुझे रातो को थपकी देकर सुलाते हाथ
मेरे आंसू पोछ्ते हुए हाथ
मेरा सामान बांधते हुए हाथ
मेरी जेब में कुछ रुपये रखते हुए हाथ
मुझे संभालते हुए हाथ
मुझे बस पर चढाते हुए हाथ
मुझे ख़त लिखते हुए हाथ
बुढापे की लाठी को कांपते हुए थामते हुए हाथ
मेरा इन्तजार करते करते सूख चुकी आँखों पर रखे हुए हाथ ...

फिर एक दिन हमेशा के हवा में खो जाते  हुए हाथ !!!

न जाने ;
मैं किसकी तलाश में शहर आया था ....

Saturday, January 9, 2010

पाप !!!



दोस्तों ,


मैंने ये कविता 1987 में लिखी थी. ये मेरे एक मित्र की आत्मकथा पर लिखी थी ,इसे लिखने में मुझे बहुत मानसिक उलझन भी थी .. क्योंकि इस कविता की पूरी undertone सिर्फ physical relation पर ही based है ...मैंने अब उस मित्र से permission ली है की इसे मैं ब्लॉग में डालू .. ये एक super psycho poem है .. !!! relationship का canvas बहुत बड़ा होता है और physical activity सिफ एक छोटा हिस्सा होता है ..लेकिन मानव मन कितना दुर्बल है , कितना विवश है , इस छोटे से हिस्से के लिए वो पाप करता है [ anything , which is forced ,and done without interest and in which ,no heart is involved ,can be termed as PAAP ] . मैं इस कविता को पहली बार publish कर रहा हूँ .. मेरा ये प्रयास है इस कविता के सहारे हम एक HUMAN ERROR के MAGNITUDE को समझे की; हम कितने ज्यादा tempt हो जाते है और हम कितने ज्यादा इन जैसी भावनाओ के spell में रहते है ....हमेशा की तरह आपके प्यार और आशीर्वाद की तमन्ना है ...चाहे अच्छे हो या खराब , आपके comments मेरे सर आँखों पर !!!!




पाप !!!


जब कहीं तम,
यौवन की नीरवता की विवश विडंबना सहते रहे
जब हाहाकार लिए रजनी ;
किसी शांत और अनेपिक्षित तूफ़ान की प्रतीक्षा करे
जब अन्धकार के विकसित गर्भ में प्रथम सांस लेती है
पाप की उत्तेजित जागृतता !!
क्या तभी जन्म लेती है मेरी सिसकती कविता ?

जब उत्तेजित पाप प्रथम सांस लेकर
अपने जन्म को कोसते रहे ;
जब अपने निश्चित अंतिम उच्छावास पर,
पपित आवेश लज्जित होते रहे ;
जब खामोश सिसकियाँ भरती है पाप की लज्जा
पाकर अपने अंत की निकटता !!
क्या तभी जन्म लेती है मेरी सिसकती कविता ?

जब अपने कायर अंत का आलिंगन करके
पाप; स्वंय की दुष्टता सहे ,
जब स्वंय की प्रतिछाया , स्वंय को ही,
धिक्कारती, परायी और सिमटी सी लगे;
जब अपने पूर्ण गति को हो प्राप्त ,
फिर प्रारम्भ के लिए छटपटाती है दुर्बल मानसिकता !!
क्या तभी जन्म लेती है मेरी सिसकती कविता ?

जब दुर्बल मानसिकता , प्रारम्भ से लिपट कर
स्वंय को फिर पाप के लिए प्रेरित करे ;
जब प्रेरित हो विवेक तथा मानसिकता के द्वन्द्व में ,
विवश विवेक ; स्वंय को दुर्बल करे,
जब घटित होते पाप को सुनकर, देखकर और छूकर
विजय होती है मानस ह्रदय की दुर्बलता !!!
हाँ..शायद ; तभी जन्म लेती है मेरी विवश कविता !!!