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Thursday, August 24, 2017

.......कुछ लफ्ज़ तेरे नाम ............



मेरे उम्र के कुछ दिन , कभी तुम्हारे साडी में अटके तो कभी तुम्हारी चुनरी में ....
कुछ राते इसी तरह से ; कभी तुम्हारे जिस्म में अटके तो कभी तुम्हारी साँसों में .....
मेरे ज़िन्दगी के लम्हे बेचारे बहुत छोटे थे.
वो अक्सर तुम्हारे होंठो पर ही रुक जाते थे.
फिर उन लम्हों के भी टुकड़े हुए हज़ार
वो हमारे सपनो में बिखर गए !
और फिर मोहब्बत के दरवेशो ने उन सपनो को बड़ी मेहनत से सहेजा . 
उन्हें बामुश्किल इबादत दी .
और फिर अक्सर ही किसी बहती नदी के किनारे बिखेर दिए .
यूँ ही ज़िन्दगी के दास्तानों में हम नज़र आते है ..
उन्ही सपनो को चुनते हुए.. अपने आंसुओ से सींचते हुए..
गर्मी के मौसम में साँसों से हवा देते हुए और सर्दियों में उन्ही साँसों से गर्माते हुए .
बारिशो में सपनो के साथ बहते हुए ..
कहानी बड़ी लम्बी है जानां ...
लेकिन मुझ में बड़ा हौसला है . कुछ खुदा की मेहर भी है
मैं हर रोज ,
अपनी बड़ी बेउम्मीद ज़िन्दगी से कुछ लम्हों में तुम्हारे लिए नज्मे बुनता हूँ
और फिर उन्ही नज्मो के अक्षरों में तुझे तलाशता हूँ.
तुझे मेरा इकबाल करना होंगा इस हुनर के लिए
जो दरवेशो ने मुझे बक्शी है ....
मैं हर जन्म कुछ ऐसे ही गुजारना चाहता हूँ
तेरे पलकों की छाँव में जहाँ तेरे हर अश्क में मेरी इस कहानी का अक्षर समाया हो .
हां , यही अब मेरी इल्तजा है .
और यही मेरा प्यार है तेरे लिये जानां !
हाँ !

© विजय

Friday, March 10, 2017

क्षितिझ

मिलना मुझे तुम उस क्षितिझ पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी 
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिझ है कहाँ प्रिय ।
वि ज य

Monday, January 2, 2017

सोचता हूँ...................



सोचता हूँ
कि
कविता  में शब्दों
की जगह
तुम्हें भर दूँ ;

अपने मन की भावों के संग

फिर मैं हो जाऊँगा
पूर्ण

विजय


Monday, May 30, 2016

लम्हों का सफ़र....


किसी एक लम्हे में तुमसे नज़रे मिली
और
उम्र भर का परदा हो गया...
किसी एक लम्हे में तुमसे मोहब्बत हुई
और
ज़िन्दगी भर की जुदाई मिली......

लम्हों का सफ़र
लम्हों में ही सिमटा रहा !!!
© विजय

Thursday, October 15, 2015

एक नज़्म खुदा के लिए.........


उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा
तुमने उस हाथ को दफना दिया
अपनी जिस्म की जमीन में !
और कुछ आंसू जो मेरे नाम के थे ,
उन्हें भी दफना दिया अपनी आत्मा के साथ !

अब तुम हो
और मैं हूँ
और हम बहुत दूर है !
हां; इश्क खुदा के आगोश में चुपचाप बैठा है!

खुदा ने एक कब्र बनायीं है ,
तुम्हारी और मेरी ,
उसने उसमे कुछ फूल और आहो के साथ मेरी प्रार्थनाओ को भी दफ़न किया है !

हां ;
कुछ लोग अब भी मेरी नज्मे पढ़ते है और मोहब्बत की बाते करते है !

© विजय

Thursday, September 24, 2015

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

दुनिया भर घूम आते हो !
दुनिया को जी भर कर देखते हो !!
दुनिया से बाते करते रहते हो ....!!!

.......कभी उस मोड़ पर भी चले आओ.....जहाँ हम खड़े है ,
……….कभी हमें भी जी भर कर देख लो …….आँखे तुम्हारा इन्तजार करती रहती है ;
………कभी कोई एक लफ्ज़ हमारे नाम कर दो .......मन तुम्हे सुनने को तरसते रहताा है !

और फिर..... दुनिया के पास वो निगाहें कहाँ जो हमारे पास है !
और दुनिया के पास वो अलफ़ाज़ कहाँ जो हमारे दिल में है !
और इस फानी दुनिया के पास वो आगोश कहाँ जो हमारे बांहों में है !

all you have to remember that YOU live only once ....!

या तो इस तरह जी लो या फिर उस तरह ही जी जाओ , जो जी रहे हो .
फर्क बहुत मामूली है , उस जहान में मैं नहीं और इस जहान में मेरे सिवा कुछ भी नहीं ..!!!

© विजय

Friday, September 11, 2015

अंत

...............और अंत में कुछ भी न रह जायेंगा !!
न ही ये सम्मान , न ही ये मान ,
न ही ये धन और न ही ये यश !
बस ...चंद यादें कुछ अपनों के मन में 
और वो शब्द भी जो मैंने कभी लिखे थे !!!
एक अनंत की जिज्ञासा भी साथ में थी ,
साथ में ही रही और
अंत में साथ ही चली गयी !
प्रभु तुम ही तो हो एक मेरे
बाकी तो सब जग झूठा .....!
विजय


Saturday, August 22, 2015

यूँ ही ...

यूँ ही ...

ज़िन्दगी भर कुछ साए साथ साथ ही चलते है
और उन्ही सायो की याद में ये ख़ाक ज़िन्दगी;
.......कभी कभी गुलज़ार भी होती है !!!

सोचता हूँ अक्सर यूँ ही रातो को उठकर ...
अगर अम्मा न होती ,
अगर पिताजी न होते .
अगर तुम न होती ..
अगर वो दोस्त न होता ...
...चंद तकलीफ देने वाले रिश्तेदार न होते ...
...चंद प्यार करने वाले दुनियादार न होते ..

तो फिर जीना ही क्या होता !
यूँ ही ज़िन्दगी के पागलपन में लिखे गए अलफ़ाज़ भी न होते !

copyright © विजय कुमार

Sunday, June 7, 2015

||| कविता : ज़िन्दगी ||



भीगा सा दिन,
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !


कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

© विजय

एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...