Sunday, June 8, 2014

||| नज़्म |||



बड़ी देर हो गई है ,
कागज़ हाथ में लिए हुए !

सोच रहा हूँ ,
कि कोई नज़्म लिखूं !

पर शब्द कहीं खो गए है ,
जज्बात कहीं उलझ गए है ,
हाथों की उंगलियाँ हार सी गई है ;

क्या लिखु .... कैसे लिखु ...

सोचता हूँ ,
या तो ;
सिर्फ “खुदा” लिख दूं !
या फिर ;
सिर्फ “मोहब्बत” लिख दूं !
या फिर ;
तुम्हारा नाम ही लिख दूं !

इन तीनो से बेहतर भला
कोई और नज़्म क्या होंगी...!!!

© विजयकुमार 

Wednesday, April 2, 2014

प्रेम


हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी 
और बांटना था प्यार 
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे ! 
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा 
नदी के साथ मन बांटा 
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो 
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने 
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी 
और कहा उनसे कि वो आशीष दे 
हमारे प्रेम को 
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह 
और 
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि 
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए 
धरती आकाश और नदी पीछे , 
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से 
और दोनों का आत्मा से 
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से 
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था 
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ, 
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को 
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की 
देवता सच में होते है कहीं ? 

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित 
अतीत में और सपनो में ! 

और अब कहीं भी;
तुम और मैं 
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित 
किन्ही दुसरे स्त्री –पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 

Thursday, February 27, 2014

मैं, वो और मोहब्बत !


उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!

© नज़्म : विजय

Monday, February 10, 2014

::: मन-मंथन की दुःख गाथा ::: अपनी बात – part III :::


मन कुछ ख़राब सा है , आजकल कुछ ज्यादा ही रहने लगा है . मैंने अपने उस फोल्डर पर नज़र डाली है जिसका नाम था “unfinished stories & poems” . देखा तो करीब ३५ कहानियो के ड्राफ्ट थे , जिन्हें शुरू किये हुए करीब २ साल हो रहे थे. कुछ दिन पहले एक नयी किताब भी लिखना शुरू किया था खतो पर और करीब १०० से कविताएं थी , जो लिखकर भी अधूरी ही थी. मैंने सोचना शुरू किया कि क्या ये सब कुछ अधुरा ही रहा जायेंगा . क्या मेरा एक छोटा सा जीवन पर्याप्त है; मुझमे मौजूद विविधताओं को जीने के लिए ?

सोचता हूँ कि कुछ कविताएं लिखू फिर मर जाऊं या कुछ कहानियाँ बुन लूं ,फिर मर जाऊं या एक उपन्यास जो पिछले १५ सालो से लिखने की सोच रहा हूँ वो ही लिख लूं फिर मर जाऊं. दो –तीन किताबे लिख लूं और फिर दुनिया से चला जाऊं .

लिखना और मरना और जीना सब साथ साथ चल रहे है . कुछ लिखता हूँ तो लगता है जी गया , और फिर अगला ही पल मृत्यु का होता है . जीवन की कई राहो पर एक साथ चलना भी कठिन ही होता है . और फिर मैं तो शब्दों का और सपनो का सौदाकार हूँ .......!!!

कुछ दिन पहले कुछ नए closeup लेंस खरीदे ताकि और फोटोग्राफी कर सकूँ. वो सब वैसे ही रखे है . जिसे शूट करना चाहा वो मिला ही नहीं !!! एक नयी पेंटिंग शुरू की Nefertiti – The queen of Egypt वो भी अधूरी ही है . बहुत सारी किताबे खरीद ली ताकि और पढ़ सकू , ताकि मैं खुद कुछ और अच्छा लिख सकू ..लेकिन वो बस कुछ पेज ही ........ और फिर सब रुक गया है ....सब कुछ उलझा हुआ है ... या यूँ कहू कि सब कुछ उलझ सा गया है .

कितनी सारी lounge music DVDs सारी दुनिया से मंगा लिया है . संगीत ही जीवन है मेरा ... उन्हें भी पूरा नहीं सुन पा रहा हूँ एक ट्रैक सुनता हूँ ,फिर MTV coke studio पर चला जाता हूँ फिर soft ballads फिर जगजीत की गज़ले .... और फिर कोई jazz track या बॉब मारली.. फिर देवा प्रेमल ....... बस न जाने क्या क्या .... अभी किसी से दोस्ती हुई तो उसने बताया कि उसे ३७ इंस्ट्रूमेंट्स आते है बजाना . मैं अवाक रह गया हूँ ....... और मुझे सिर्फ drums.... !!!

कैसी भटकन है ..कैसी उलझन है .. क्या हम सब इसी तरह जी रहे है क्या ...या सिर्फ मैं ही इन लहरों से लड़ रहा हूँ .

सब कुछ ठहरा हुआ सा है ...रुका हुआ सा है ...

एक और फोल्डर है मन में बसा हुआ ..... उसमे पता नहीं ....क्या क्या भरा हुआ है .....उसे कब खाली कर पाऊंगा ये बता पाना ही असंभव है .

१५ दिन की मेहनत से ‘मानवता’ पर एक कविता लिखी , उस पर ५ कमेंट मिलते है . ऐसे ही ५ मिनट में कोई प्रेम-विरह की नज़्म लिखता हूँ तो उस पर ४० कमेंट आते है . दुनिया क्या चाहती है ....

फेसबुक एक और तमाशा है . मन एक झूठी आशा और निराशा में यहाँ आता है और पता नहीं क्या क्या सोचता है . जिनके प्रोफाइल को मैं देखता हूँ ; मैं उनके जीवन में सिर्फ नाम ही हूँ .. न्यूज़ फीड में दुनिया भर का शोर ! जाने क्या क्या वाही –तबाही !! लोग कितना नकली जीवन जीते है न .

एक नौकरी है जो पता नहीं मुझे कहाँ ले जा रही है . पिछले बरस professionally और financially मैं जो collapse हुआ , बस पूछो मत ..बिमारी में घर बिक गया .सब कुछ ख़त्म सा हो गया , मुझमे अगर मेरा अध्यात्म न होता तो पता नहीं मैं कैसा संभल पाता . जीवन अब कहाँ जा रहा है .. समझ ही नहीं आता है .

समय – शब्द - चित्र - रंग - मौसम - रात - दिन – आना – जाना –हंसी और आंसू ...ज़िन्दगी करीब करीब इन्ही टुकडो में बंटी हुई है . और ये सब टुकड़े शब्द बनकर उभरते है .

चुप रहता हूँ तो भीतर का शोर आंसू बन जाते है . बोलता हूँ तो बाहर का शोर दर्द बन जाता है. जिनसे बोलना सुनना चाहता हूँ वो बात नहीं करते और जो मुझसे बाते करते है वो दुनिया की बाते करते है .

लोगो को मैं कितना हंसाता हूँ , खुद हँसे जाने कितने दिन हो गए !

किसी को चाहना भी एक दुःख का कारण ही है . बहुत से दुःख हमारे खुद के द्वारा ही उपजाए होते है . अपेक्षा और उपेक्षा के मध्य जीवन का जीना होता है .

एक दिन सब कुछ ठहर जायेंगा ..हमेशा के लिए ! मैं खुद ही ख़ामोशी को अपना लूँगा .... फिर कुछ दिनों बाद फिर से लिखना शुरू करूँगा...जब मन शांत हो जाए. अगर हो जाए तो !

विजय

Tuesday, February 4, 2014

मानवता के स्वप्न अब तक अधूरे है



 
स्वप्न मेरे, अब तक वो अधूरे है;  
जो मानव के रूप में मैंने देखे है !

मानवता के उन्ही स्वप्नों की आहुति पर
आज विश्व सारा;
एक प्राणरहित खंडहर बन खड़ा है !

आज मानवता एक नए युग-मानव का आह्वान करती है;
क्योंकि,
आदिम-मानव के उन अधूरे स्वप्नों को,
इस नए युग-मानव को ही पूर्ण करना होंगा !

स्वप्न था कि,
एक अकाल मुक्त विश्व हो,
जहाँ न कोई प्यासा रहे और न ही कोई भूखा सोये;
हर मानव को जीने के लिए अन्न और जल मिले !
पर अभिशप्त आदिम तृष्णा ने अर्ध-विश्व को,
भूखा–प्यासा ही रखा है अब तक !
मेरा वो खाद्यान से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक हर भाषा के अक्षरों से संपन्न विश्व हो,
जहाँ हर कोई किताब और कलम को ह्रदय से लगाए;
अक्षरों से मिल रहे ज्ञान पर अधिकार हो हर किसी का !
पर निर्धनता के राक्षस ने कागज़ और कलम के बदले में,
क्षणिक मजदूरी थमा दी मासूमो के हाथो में !
मेरा वो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक स्वछन्द मेघो और स्वतंत्र विचारों से भरा हुआ विश्व हो,
जहाँ मानवता मुक्त पक्षियों की तरह उड़ान भरे;
जहाँ जीवन स्वतंत्रता और खुशियों की सांस ले हर क्षण !
पर युद्ध की विभीषिका ने बारूद से सारा आकाश ढक दिया है,
और निर्दोषों के रक्त से सींचकर, इस भूमि को अपवित्र कर दिया है !
मेरा वो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
इंसानों, पशुओ और वृक्षों से स्पंदित एक सुन्दर विश्व हो,
कि हर किसी को यहाँ जीवन-ऊर्जा की प्राण-छाया मिले;
इस धरा ने हम सभी को जीने लायक कितना कुछ तो दिया है !
पर इंसान हैवान बन गया, पशु मिट गए और वृक्ष ख़त्म हो गए,
और अब हमारा ये एकमात्र भूमण्ड़ल ख़त्म होने की कगार पर है !
मेरा वो प्रकृति के प्रति मातृभाव से भरे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सरहदे न रहे; सृष्टि में एक सकल बंधुत्व हर ओर बना रहे,
इस धरती पर जो कि हम सबके लिए है; सिर्फ मानवता ही बसी रहे;
पर, हमने सरहदे बना दी और जमीन को अनचाहे हिस्सों में बाँट दिया !
अपने देश बेगाने से और अपने इंसान पराये से हो गए / कर दिए,
धर्म को अधर्म में बदल दिया और अंत में ईश्वर को भी बाँट दिया !
मेरा वो सर्वव्यापी बंधुत्व वाले विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
हम प्रेम, मित्रता और भाईचारा को बिना शर्त निभाये,
पर हमने प्रेम की ह्त्या की, मित्रता में विश्वासघात किया;
और भ्रातुत्व के भाव को जलाया; और जीने के लिए शर्ते रखी  !
इंसानों का घृणित व्यापार किया और  स्वंय को लालसा / वासना के दांव पर लगाया,
और आज सम्पूर्ण विश्व प्रेम, मित्रता और भ्रातृभाव से वंचित है !
मेरा वो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सारी पृथ्वी पर बुद्ध की असीम शान्ति की स्थापना हो,
सारी वसुंधरा में कृष्ण के पूर्ण प्रेम का बहाव हो;
सारी भूमि पर ईशा का सदैव क्षमाभाव हो !
हर धर्म, हर भाषा, हर जाती और व्यक्ति का सम्मान हो  !
पर अब सिर्फ आदमियत की विध्वंसता बची है और ईश्वर कहीं खो से गए है !
एक अतुलनीय विश्व के जागरण का मेरा वो स्वप्न अब तक अधुरा है !


स्वप्न था कि,
मानव मुक्त हो राग, द्वेष, क्रोध, पाप और वासना के मन-मालिन्य से,
अंहकार, आकांक्षाओ, सांसारिक धारणाओ और असीमित आसक्तियो से;
और भर जाए जीवन के उल्लास से और प्रफुल्लित कर दे अपनी आत्मा को;
बच्चो की मासूमियत, फूलो के सौन्दर्य और वर्षा की तृप्त अनुभूतियो से !
एक नये जीवन का; एक नए युग-मानव का और एक नए विश्व का जन्म हो !
मेरा वो प्राण -स्पंदन से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

हां !
देशकाल के अँधेरे अवरोधनो से मुक्त होकर,
हमें एक नए युग-मानव के रूप में बदलकर;
मानवता के इन अधूरे स्वप्नों को पूरा करना ही होंगा !

हां !
वो हम ही होंगे जो एक नए विश्व का निर्माण करेंगे,
जहाँ निश्चिंत ही हम मानवो के सारे अधूरे स्वप्न पूरे होंगे !

हाँ !
एक सुन्दर और प्यारा विश्व होंगा, जो हम सबका होंगा;
जो खाद्यान से भरा हुआ होंगा, हर किसी के लिए !
जो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान होंगा, हर मानव के लिए !
जो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त होंगा, हर इंसान के लिए !
जो प्रकृति के मातृभाव से भरा होंगा, हर मनुष्य के लिए !
जो सार्वभौमिक, सर्वव्यापी बंधुत्व वाला होंगा, हर व्यक्ति के लिए !
जो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबा हुआ होंगा; हर किसी के लिए !

और मेरा वो आदिम / प्राचीन स्वप्न,
जिसमे मैं;
एक अतुलनीय, अप्रतिम,  उत्कृष्ट,  सार्वभौमिक, अद्भुत  और,
प्राण-स्पंदन से भरे हुए विश्व का नूतन जागरण देखता हूँ;
वो अवश्य पूरा होंगा !

मैं अपने सारे अधूरे स्वप्न,
इस धरा को और नए युग-मानव को समर्पित करता हूँ !

Monday, December 9, 2013

ज़िन्दगी




भीगा सा दिन, 
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !

कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई  टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

नज़्म  © विजय कुमार