Sunday, May 12, 2013

अम्मा !



अम्मा !
तेरा मुझ में अब तक बहुत कुछ बाकी है माँ.
प्यार , ममता ,क्षमा और ज़िन्दगी की छाँव !!
नमन !



Wednesday, May 1, 2013

अक्सर……………….!!!




अक्सर….
ज़िन्दगी की तन्हाईयो में जब पीछे मुड़कर देखता हूँ ;
तो धुंध पर चलते हुए दो अजनबी से साये नज़र आते है .. 
एक तुम्हारा और दूसरा मेरा.....!
पता नहीं क्यों एक अंधे मोड़ पर हम जुदा हो गए थे ;
और मैं अब तलक उन  गुमशुदा कदमो के निशान ढूंढ रहा हूँ. 
अपनी अजनबी ज़िन्दगी की जानी पहचानी राहो में !
कहीं अगर तुम्हे “ मैं “ मिला  ;
तो उसे जरुर गले लगा लेना ,
क्योंकि वो "मैं" अब तन्हा है ......!

अक्सर ...
बारिशो के मौसम में ;
यूँ ही पानी की तेज बरसाती बौछारों में ;
मैं अपना हाथ बढाता हूँ कि तुम थाम लो  ,
पर सिर्फ तुम्हारी यादो की बूंदे ही ;
मेरी हथेली पर तेरा नाम लिख जाती है .. !
और फिर गले में कुछ गीला सा अटक जाता है ;
जो पिछली बारिश की याद दिलाता है ,
जो बरसो पहले बरसी थी .
और ; तुमने अपने भीगे हुए हाथो से मेरा हाथ पकड़ा था;
और मुझमे आग लग गयी थी .
तुम फिर कब बरसोंगी जानां ....!

अक्सर ....
हिज्र की तनहा रातो में 
जब जागता हूँ मैं - तेरी यादो के उजाले में ;
तो तेरी खोयी हुई मुस्कराहट बिजली की तरह कौंध जाती है,
और मैं तेरी तस्वीर निकाल कर अपने गालो से लगा लेता हूँ .
इस ऐतबार में कि तुम शायद उस तस्वीर से बाहर आ जाओ .
पर ऐसा जादू सिर्फ एक ही बार हुआ था ,
जो कि पिछली बहार में था,
जब दहकते फ्लाश की डालियों के नीचे मैंने तुम्हे छुआ था.
तुम जो गयी , ज़िन्दगी का वसंत ही मुरझा गया ;
अब पता चला कि ;
ज़िन्दगी के मौसम भी तुम से ज़ेरेसाया है जानां !

अक्सर ...
मैं तुम्हे अपने आप में मौजूद पाता हूँ , 
और फिर तुम्हारी बची हुई हुई महक के साथ ;
बेवजह सी बाते करता हूँ ;
कभी कभी यूँ ही खामोश सडको और अजनबी गलियों में,
और पेड़ो के घने सायो में भी तुम्हे ढूंढता हूँ.
याद है तुम्हे - हम आँख मिचोली खेला करते थे
और तुम कभी कभी छुप जाती थी 
और अब जनम बीत गए ..
ढूंढें नहीं मिलती हो अब तुम ;
ये किस जगह तुम छुप गयी हो जानां !!!

अक्सर ..... 
उम्र के गांठे खोलता हूँ और फिर बुनता हूँ
बिना तुम्हारे वजूद के .
और फिर तन्हाईयाँ डसने लगती है .. 
सोचता हूँ कि तेरे गेसुओं में मेरा वजूद होता तो 
यूँ तन्हा नहीं होता पर ..
फिर सोचता हूँ कि ये तन्हाई भी तो तुमने ही दी है ..
ज़िन्दगी के किसी भी साहिल पर अब तुम नज़र नहीं आती हो ...
अक्सर मैं ये सोचता हूँ की तुम न मिली होती तो ज़िन्दगी कैसी होती .
अक्सर मैं ये सोचता हूँ कि तुम मिली ही क्यों ;
अक्सर मैं ये पूछता हूँ कि तुम क्यों जुदा हो गयी ?
अक्सर मैं बस अब उदास ही रहता हूँ 
अक्सर अब मैं जिंदा रहने के सबब ढूंढता हूँ  .... 
अक्सर........

कविता और फोटोग्राफी  © विजय कुमार 

Monday, April 22, 2013

आदमजाद

या खुदा 
इस दुनिया के आदमजाद को अक्ल दे ,
सोच और समझ दे ;

औरते सिर्फ जिस्म के लिए नहीं होती ;
वो भी एक औरत ही है , जिसने इस आदमजाद को जन्म दिया !

औरते है तो दुनिया है !
इस बात को मजहब की तरह माने !!

या खुदा ,
इस दुनिया के आदमजाद को ये बता ,
कि औरत का वतन सिर्फ उसका बदन ही नहीं होता ,जैसा कि सारा शगुफ्ता ने कहा था !

या खुदा ,
आदमजाद को ये बता कि जानवर से भी बदतर होते जा रहा है वो .
कोई औरत उसकी बेटी ,बहन ,बीबी भी हो सकती है.

या खुदा
आदमजाद को इंसान बना !!!

विजय कुमार

Wednesday, February 27, 2013

सिलसिला



सिलसिला कुछ इस तरह बना..........!

कि मैं लम्हों को ढूंढता था खुली हुई नींद के तले |
क्योंकि मुझे सपने देखना पसंद थे - जागते हुए भी ; 
और चूंकि मैं उकता गया था ज़िन्दगी की हकीक़त से !
अब किताबो में लिखी हर बात तो सच नहीं होती न .
इसलिए मैं लम्हों को ढूंढता था ||

फिर एक दिन कायनात रुक गयी ;
दरवेश मुझे देख कर मुस्कराये 
और ज़िन्दगी के एक लम्हे में तुम दिखी ;
लम्हा उस वक़्त मुझे बड़ा अपना सा लगा ,
जबकि वो था अजनबी - हमेशा की तरह ||

देवताओ ;
मैंने उस लम्हे को कैद किया है ..
अक्सर अपने अल्फाजो में , 
अपने नज्मो में ...
अपने ख्वाबो में .. 
अपने आप में ....||

एक ज़माना सा गुजर गया है
कि अब सिर्फ तुम हो और वो लम्हा है ||

ये अलग बात है कि तुम हकीक़त में  कहीं भी  नहीं हो .
बस एक ख्याल का साया  बन कर जी रही हो मेरे संग . 
हाँ , ये जरुर सोचता हूँ कि तुम ज़िन्दगी की धडकनों में होती 
तो ये ज़िन्दगी कुछ जुदा सी जरुर होती……|| 

पर उस ज़िन्दगी का उम्र से क्या रिश्ता . 
जिस लम्हे में तुम थीउसी में ज़िन्दगी बसर हो गयी . 

और ये सिलसिला अब तलक  जारी है …….|||

Monday, February 4, 2013

मेरी पहली किताब : : उजले चांद की बेचैनी :


आदरणीय गुरुजनो  और मित्रो . 
नमस्कार ;

आप सभी से अपनी एक खुशखबरी  शेयर करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है .

मेरी पहली किताब : जो की एक कविता संग्रह है ; अब छप  चुकी है . 
इसका नाम है : उजले चांद की बेचैनी : 

इसे बोधि प्रकाशन ने छापा  है . ये किताब आपको विश्‍व पुस्‍तक मेला, प्रगति मैदान, नई दिल्‍ली
दिनांक 4 फरवरी से 10 फरवरी के दौरान ; बोधि प्रकाशन, हॉल नं: 12 बी, स्‍टॉल नं 115 में उपलब्ध रहेंगी 

इसके अलावा आप इसे बोधि प्रकाशन से भी मंगवा सकते है . उनका पता है : 
बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्‍ट्रीयल एरिया, बाइस गोदाम, जयपुर 302006 राजस्थान   संपर्क करे : 082900 34632

हमेशा की तरह , इसे भी आप सभी का प्यार और आशीर्वाद  चाहिए . कृपया अपनी राय को मेरे ब्लोग के इस पोस्ट पर कमेंट के रूप में देकर मुझे अनुग्रहित करे। आपके कमेंट्स का हमेशा से ही स्वागत रहा है। 

आपका अपना 
विजय कुमार 


Saturday, January 19, 2013

खुशखबरी ! खुशखबरी !! खुशखबरी !!!



दोस्तों , मुझे आप सभी को ये बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि विश्व हिंदी सचिवालय, मरिशिश  द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता में मुझे तृतीय पुरूस्कार  मिला है .  पुरूस्कार राशि USD $ 300  है , लेकिन इससे बड़ी ख़ुशी ये है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुझे एक पहचान मिली है . हिंदी के लिए मेरा जीवन कुछ काम आया . मुझे इस बात की भी ख़ुशी है . आप सभी मित्रो का प्रोत्साहन मेरे लिए अमूल्य है . धन्यवाद. 


http://vishwahindi.com/en/contest.html



Tuesday, January 1, 2013

भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!















भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा,
रवि ने किया दूर ,जग का दुःख भरा अन्धकार ;
किरणों ने बिछाया जाल ,स्वर्णिम और मधुर
अश्व खींच रहें है रविरथ को अपनी मंजिल की ओर ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी रथ का सार्थ बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

सुंदर सुबह का स्वागत ,पक्षिगण ये कर रहे
रही कोयल कूक बागों में और भौंरें मस्त तान गुंजा रहे ,
स्वर निकले जो पक्षी-कंठ से ,मधुर वे मन को हर रहे ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी गगन का पक्षी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

खिलकर कलियों ने खोले ,सुंदर होंठ अपने ,
फूलों ने मुस्कराकर सजाये जीवन के नए सपने ,
पर्णों पर पड़ी ओस ,लगी मोतियों सी चमकने ,
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी मधुबन का माली बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रभात की ये रुपहली किरने ,प्रभु की अर्चना कर रही
साथ ही इसके ; घंटियाँ मंदिरों की एक मधुर धुन दे रही ,
मन्त्र और श्लोक प्राचीन , देवताओं को पुकार रही,
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी देवालय का पुजारी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रक्रति ,जीवन के इस नए भोर का स्वागत कर रही
प्रभु की सारी सृष्टि ,इस भोर का अभिनन्दन कर रही ,
और वसुंधरा पर ,एक नए युग ,एक नये जीवन का आव्हान कर रही ,
तू भी हे मानव ,इस जीवन रूपी सृष्टि का एक अंग बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

फोटोग्राफी और कविता © विजय कुमार

Sunday, December 30, 2012

स्त्री – एक अपरिचिता

दोस्तों , दामिनी की मौत ने पुरुष की मानसिकता पर एक सवाल उठा दिया है . बहुत समय पहले मैंने एक कविता लिखी थी . उसी कविता को आज फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ. दामिनी को नमन . और एक आह्वान , सारे पुरुषो से की वो अपनी मानसिकता बदले.



मैं हर रात ;
तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ
कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ;
मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा
और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ”

कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही
मैं जन्मो से ,तुम्हारे लिए सिर्फ शरीर ही बनी रही ..
ताकि , मैं तुम्हारे घर के काम कर सकू ..
ताकि , मैं तुम्हारे बच्चो को जन्म दे सकू ,
ताकि , मैं तुम्हारे लिये तुम्हारे घर को संभाल सकू .

तुम्हारा घर जो कभी मेरा घर  बन सका ,
और तुम्हारा कमरा भी ;
जो सिर्फ तुम्हारे सम्भोग की अनुभूति के लिए रह गया है
जिसमे , सिर्फ मेरा शरीर ही शामिल होता है ..
मैं नहीं ..
क्योंकि ;
सिर्फ तन को ही जाना है तुमने ;
आज तक मेरे मन को नहीं जाना .

एक स्त्री का मन , क्या होता है ,
तुम जान  सके ..
शरीर की अनुभूतियो से आगे बढ़  सके

मन में होती है एक स्त्री..
जो कभी कभी तुम्हारी माँ भी बनती है ,
जब वो तुम्हारी रोगी काया की देखभाल करती है  ..
जो कभी कभी तुम्हारी बहन भी बनती है ,
जब वो तुम्हारे कपडे और बर्तन धोती है
जो कभी कभी तुम्हारी बेटी भी बनती है ,
जब वो तुम्हे प्रेम से खाना परोसती है
और तुम्हारी प्रेमिका भी तो बनती है ,
जब तुम्हारे बारे में वो बिना किसी स्वार्थ के सोचती है ..
और वो सबसे प्यारा सा संबन्ध ,
हमारी मित्रता का , वो तो तुम भूल ही गए ..

तुम याद रख सके तो सिर्फ एक पत्नी का रूप
और वो भी सिर्फ शरीर के द्वारा ही ...
क्योंकि तुम्हारा सम्भोग तन के आगे
किसी और रूप को जान ही नहीं पाता  है ..
और  अक्सर  चाहते हुए भी मैं तुम्हे
अपना शरीर एक पत्नी के रूप में समर्पित करती हूँ ..
लेकिन तुम सिर्फ भोगने के सुख को ढूंढते हो ,
और मुझसे एक दासी के रूप में समर्पण चाहते हो ..
और तब ही मेरे शरीर का वो पत्नी रूप भी मर जाता है .

जीवन की अंतिम गलियों में जब तुम मेरे साथ रहोंगे ,
तब भी मैं अपने भीतर की स्त्री के
सारे रूपों को तुम्हे समर्पित करुँगी
तब तुम्हे उन सारे रूपों की ज्यादा जरुरत होंगी ,
क्योंकि तुम मेरे तन को भोगने में असमर्थ होंगे
क्योंकि तुम तब तक मेरे सारे रूपों को
अपनी इच्छाओ की अग्नि में स्वाहा करके
मुझे सिर्फ एक दासी का ही रूप बना चुके होंगे ,

लेकिन तुम तब भी मेरे साथ सम्भोग करोंगे ,
मेरी इच्छाओ के साथ..
मेरी आस्थाओं के साथ..
मेरे सपनो के साथ..
मेरे जीवन की अंतिम साँसों के साथ

मैं एक स्त्री ही बनकर जी सकी
और स्त्री ही बनकर मर जाउंगी
एक स्त्री ....
जो तुम्हारे लिए अपरिचित रही
जो तुम्हारे लिए उपेछित रही
जो तुम्हारे लिए अबला रही ...

पर हाँ , तुम मुझे भले कभी जान न सके
फिर भी ..मैं तुम्हारी ही रही ....
एक स्त्री जो हूँ.....


पेंटिंग और कविता © विजय कुमार