आदरणीय दोस्तों , मैंने अपना फोटोग्राफी ब्लॉग को update किया है ...आप से निवदन है की अगर समय हो तो जरुर मेरे द्वारा लिए गए photographs को देखे और अपनी अमूल्य राय देवे. .. ब्लॉग का लिंक है : http://photographyofvijay.blogspot.com/
विजय
आबार एशो [ আবার এশো ] [ फिर आना ]
आज शाम सोचा ;
कि ,
तुम्हे एक झील दिखा लाऊं ...
पता नही तुमने उसे देखा है कि नही;
देवताओं ने उसे एक नाम दिया है….
उसे जिंदगी की झील कहते है...
बुजुर्ग ,अक्सर आलाव के पास बैठकर,
सर्द रातों में बतातें है कि,
वह दुनिया कि सबसे गहरी झील है
उसमे जो डूबा , फिर वह उभर कर नही आ पाया ...
उसे जिंदगी की झील कहते है...
आज शाम , जब मैं तुम्हे ,अपने संग ,
उस झील के पास लेकर गया ,
तो तुम काँप रही थी ,
डर रही थी ;
सहम कर सिसक रही थी..
क्योंकि ; तुम्हे डर था;
कहीं मैं तुम्हे उस झील में डुबो न दूँ ....
पर ऐसा नही हुआ ..
मैंने तुम्हे उस झील में ;
चाँद सितारों को दिखाया ;
मोहब्बत करने वालों को दिखाया;
उनकी पाक मोहब्बत को दिखाया ;
तुमने बहुत देर तक, उस झील में ,
अपना प्रतिबिम्ब तलाशती रही ,
तुम ढूंढ रही थी॥
कि शायद मैं भी दिखूं तुम्हारे संग,
पर ईश्वर ने मुझे छला…
मैं क्या, मेरी परछाई भी ,
झील में नही थी तुम्हारे संग !!!
तुम रोने लगी ....
तुम्हारे आंसू ,
बूँद बूँद खून बनकर झील में गिरते गए ,
फिर झील का गन्दा और जहरीला पानी साफ होते गया,
क्योंकि अक्सर जिंदगी की झीलें ,
गन्दी और जहरीली होती है ....
फिर, तुमने मुझे आँखे भर कर देखा...
मुझे अपनी बांहों में समेटा ...
मेरे माथे को चूमा..
और झील में छलांग लगा दी ...
तुम उसमें डूबकर मर गयी ....
और मैं...
मैं जिंदा रह गया ,
तुम्हारी यादों के अवशेष लेकर,
तुम्हारे न मिले शव की राख ;
अपने मन पर मलकर मैं जिंदा रह गया ...
मैं युगों तक जीवित
रहूंगा और तुम्हे आश्चर्य होंगा पर ,
मैं तुम्हे अब भी ;
अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
और हमेशा देखते रहूंगा..
युग से अनंत तक ....
अनंत से आदि तक ....
आदि से अंत तक....
देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...
जब मैं तुझे छोड़ने उस अजनबी स्टेशन पर पहुंचा ;
जो की अब मेरा जाना पहचाना बन रहा था ….
तो एक बैचेन सी रात की सुबह हो रही थी ......
एक ऐसी रात की , जो हमने साथ बिताई थी
ज़िन्दगी के तारो के साथ .. जागते हुए सपनो के साथ
और प्यार के नर्म अहसासों के साथ ...
हमारे प्रेम की मदिरा का वो जाम
जो हम दोनों ने एक साथ पिया था ..
उसका स्वाद अब तक मेरे होंठों पर था...
मैंने धुंधलाती हुई आँखों से देखा तो पाया कि ;
तेरे चेहरे के उदास उजाले
मेरे आंसुओ को सुखा रहे थे......
मौन की भी अपनी भाषा होती है
ये आज पता चला .......
जब तुमने मेरा हाथ पकड़ कर कुछ कहना चाहा....
और कुछ न कह सकी .....
मैं भी सच कितना चुप था !!
हम दोनों क्या कहना सुनना चाहते थे ;
ये समझ में नहीं आ रहा था .....और सच कहूँ तो
मैं समझना भी नहीं चाहता था !
फिर थोडी देर बाद तुझे ;
तेरे शहर को ले जाने वाली ट्रेन आयी ....
ये वही स्टेशन था ,जिसने तुम्हे मुझसे मिलाया था
और हम दोनों ने ये जाना था कि ;
किसी पिछले जनम के बिछडे हुए है हम...
मैंने मरघट की खामोशी के साथ ;
तुझे उस ट्रेन में बिठाया ..
तेरा चले जाना जैसे ;
मेरी आत्मा को तेरे संग लिए जा रहा था ..
जिस जगह हम मिले , उसी जगह हम जुदा हुए..
ये कैसी किस्मत है हमारे प्यार की ......
फिर ट्रेन चल पड़ी ....
बहुत दूर तलक मैं उसे जाते हुए देखते रहा
और उसे ;
तुझे ले जाते हुए भी देखते रहा ..
मेरी आँखों ने कहा ,
सुन यार मेरे .. अब तो हमें बहने दे.....
बहुत देर हुई ..रुके हुए ...
मैं अपने कदमो को खीचंते हुए वापस आया ....
देखा तो ;
कमरा उतना ही खामोश था ..
जितना हमने उसे छोड़ा था ....
बिस्तर पर पड़ी चादर को छुआ तो ,
तुमने उसे अपनी ठोडी तक ओड़ ली ...
और अपनी चमकीली आँखों से
मुझे देखकर मुस्करा दिया ...
और फिर कोने में देखा तो तुम
मेरे संग चाय पी रही थी ..
सोफे पर शायद तुम्हारा दुपट्टा पड़ा था ...
या मेरी धुंधलाती हुई आँखों को कोई भ्रम हुआ था ...
आईने में देखा तो तुम थी मेरे पीछे खड़ी हुई ...
मुझे छूती हुई .....मेरे कानो में कुछ कहती हुई..
शायद I LOVE YOU कह रही थी......
सारे कमरे में हर जगह तुम थी ...
अभी अभी तो मैं तुम्हे छोड़ आया था
फिर ये सब ..................................
सुनो ,
मैं बहुत देर से रो रहा हूँ ..
तुम आकर मेरे आंसू पोंछ दो ......
लिख रहा हूं मैं आज एक लव लैटर ,
अपनी बैठक रूपी गुफा में लेटकर ;
आ गई मेरी बीवी ,चौके से दौड़कर ;
जाने उसे कैसे हो गई इसकी ख़बर !
मुंह फाड़कर गुराई मुझ पर ,
फिर तुम कुछ लिख रहे हो ;
मेरे बाप की गाढ़ी कमाई यों ही उडा रहे हो !
कौन सी किताब से कविता चुरा रहे हो ;
और अपनी कह , उसे , अपना नाम जमा रहे हो !!
सुनकर मैं ये सब बिल्ली बन भीग गया ;
डरते हुए उससे दास्ताँ सारी कह गया ;
प्रिये, तुम्हें अपने पति पर फख्र होना चाहिए ;
विकट मुश्किल में सदा मेरा साथ देना चाहिए !
प्रेमिका अपने प्रेमी से नाराज़ है ;
उसका प्रेमी निकम्मा और बेजार है ;
प्रेमिका को प्रेमी लग रहा कचरा है ;
कविताओं से भर गई सारी कचरापेटी है ;
प्रेमिका उसी कचरापेटी के पास लेटी है ;
और ......
वो प्रेमिका कौन है ,
बात मेरी काट कर
जोर से चिल्ला कर
मेरी प्यारी बीवी ने आसमान सिर पर उठाया !
भौचक्का रह गया मैं
उसने सही था अंदाजा लगाया !!
मेरी बीवी नेता बन बकती रही
और मैं पब्लिक बन सुनता रहा !
वो चली गई ;
मुझे सब कुछ कह गई ;
कुछ गुस्से में , कुछ जल कर और बाकी भुनकर !!
मैं फिर लिखने लगा लव लैटर
बेशर्म नेताओं की तरह फिर दोबारा लेट कर ;
मैं लिखने लगा लव लैटर !!!!


इमरोज़ के लिए ....
ये नज़्म सिर्फ़ एक नज़्म नही है ; ये मेरा सलाम है उस मोहब्बत के दरवेश को [ probably the most sacrificing love soul on earth ] ... और शायद ये मेरी अपनी तलाश को एक परिभाषा देती हुई नज़्म भी है .....
जब मैं इमरोज़ जी से कई साल पहले मिला था , तो हमने खूब paintings की बातें की थी , उन्होंने मुझे बताया की कैसे वो पाकिस्तान में paintings की पढ़ाई पूरी की , फिर हमने OSHO पर बहुत सी बातें की , यूं लगा की मैं ही इमरोज़ हूँ ... हमारे ख्यालात इतने मिलते थे.. फिर हमने अमृता जी के बारें में बातें की , उन्होंने मुझसे दिल खोल कर बातें की , मैं बहुत देर तक मोहब्बत के समंदर में उतरता ,डूबता ,फिर तैरता रहा .. फिर हम अमृता जी से मिलने गए.. मैंने उनसे भी बातें की . मैं जब इमरोज़ जी से अलग हुआ तो ,ऐसा लगा की मेरी रूह पीछे छूट रही हो…..वापसी के वक्त ; मैं बहुत देर तक उस घर को देखता रहा ,जिसमे ये दरवेश रहता है ....
फिर , मैं फिर से ज़िन्दगी की आपा-धापी और जिसे rat race कहते है ,में खो गया . और अब जाकर जब मुझे ये लगा की मैंने अपने बारें में भी जीना चाहिए तो ये नज्मों का सफर २००८ से प्रारंभ हुआ.
बीतें दिनों जब मैंने इमरोज़ जी को अपनी नज़्मे भेजी तो उन्हें बहुत पसंद आई ..फिर मैंने सोचा की क्यों न उन पर एक नज़्म लिखी जाएँ . तीन दिन पहले ये नज़्म लिखी ... so friends here it is ... लेकिन क्या ये सिर्फ़ इमरोज़ की नज़्म है या फिर मेरी भी ? या आपकी भी ? ...............!
" इमरोज़ के लिए....... "
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
दो बूँद अपने इश्क के पैमाने की ,
मुझे भी पिला दे ;
तो ;
मैं भी किसी का इमरोज़ बन जाऊँ , मेरे यार !
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
कौन कहता है कि
मोहब्बत के दरवेश दिखाई नही देते
कोई किसी अमृता से तेरी पहचान मांग ले ....
तेरी चाहत का एक साया ,
मैं भी ओड़ लूँ तो ,
मैं भी किसी का इमरोज़ बन जाऊँ , मेरे यार !
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
रूहानी प्यार के मज़हब को
तुने ही तो सवांरा है मेरे यार ..
किसी नज़्म में ,
मैं भी किसी का ख्याल बनूँ तो
मैं भी किसी का इमरोज़ बन जाऊँ , मेरे यार !
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
किसी सोच की हद से आगे है तू,
किसी दीवानगी की दरगाह है तू ,
किसी के इश्क में ,
मैं भी सजदा करूँ ...
मैं भी किसी का इमरोज़ बन जाऊं , मेरे यार !
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
किस्से कहानियाँ और भी होंगे ,
पर तुझ जैसा कोई दीवाना न होंगा ,
प्यार करने वाले और भी होंगे ;
पर तुझ जैसा कोई परवाना न होंगा ;
मुझे भी अपने जैसा बना दे मेरे यार !
तो कभी, किसी अपने का ; मैं भी इमरोज़ बन जाऊं मेरे यार !
इस ज़िन्दगी में मैं भी मोहब्बत पा लूं मेरे यार !
मैं भी किसी का इमरोज़ बन जाऊं मेरे यार !
तेरे इश्क पर मुझे रश्क है ; मेरे यार !
मौत
बड़ी देर से भटक रहा था पनाह की खातिर ;
कि तुम मिली !
सोचता हूँ कि ;
तुम्हारी आंखो में अपने आंसू डाल दूं...
तुम्हारी गोद में अपना थका हुआ जिस्म डाल दूं....
तुम्हारी रूह से अपनी रूह मिला दूं....
पहले किसी फ़कीर से जानो तो जरा ...
कि ,
तुम्हारी किस्मत की धुंध में मेरा साया है कि नही !!!!