Saturday, August 22, 2015

यूँ ही ...

यूँ ही ...

ज़िन्दगी भर कुछ साए साथ साथ ही चलते है
और उन्ही सायो की याद में ये ख़ाक ज़िन्दगी;
.......कभी कभी गुलज़ार भी होती है !!!

सोचता हूँ अक्सर यूँ ही रातो को उठकर ...
अगर अम्मा न होती ,
अगर पिताजी न होते .
अगर तुम न होती ..
अगर वो दोस्त न होता ...
...चंद तकलीफ देने वाले रिश्तेदार न होते ...
...चंद प्यार करने वाले दुनियादार न होते ..

तो फिर जीना ही क्या होता !
यूँ ही ज़िन्दगी के पागलपन में लिखे गए अलफ़ाज़ भी न होते !

copyright © विजय कुमार

Monday, August 17, 2015

अम्मा.

......मैंने पहले बोलना सीखा ...अम्मा... !

फिर लिखना सीखा.... क ख ग a b c 1 2 3 ...
फिर शब्द बुने !
फिर भाव भरे !

.... मैं अब कविता गुनता हूँ  , कहानी गड़ता हूँ ..
जिन्हें दुनिया पढ़ती है ..खो जाती है .. रोती है ... मुस्कराती है ...हंसती है ..चिल्लाती है ...
.....मुझे इनाम ,सम्मान , पुरस्कार से अनुग्रहित करती है ...!

.....और मैं किसी अँधेरे कोने में बैठकर,
....खुदा के सजदे में झुककर ,
धीमे से बोलता हूँ ...अम्मा !!!

विजय

Sunday, June 7, 2015

||| कविता : ज़िन्दगी ||



भीगा सा दिन,
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !


कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

© विजय

Saturday, June 6, 2015

माँ / तलाश




माँ को मुझे कभी तलाशना नहीं पड़ा;
वो हमेशा ही मेरे पास थी और है अब भी .. !
लेकिन अपने गाँव/छोटे शहर की गलियों में ,
मैं अक्सर छुप जाया करता था ;
और माँ ही हमेशा मुझे ढूंढती थी ..!
और मैं छुपता भी इसलिए था कि वो मुझे ढूंढें !!
....और फिर मैं माँ से चिपक जाता था ..!!!
अहिस्ता अहिस्ता इस तलाश की सच्ची आँख-मिचोली ,
किसी और झूठी तलाश में भटक गयी ,
मैं माँ की गोद से दूर होते गया ...!
और फिर एक दिन माँ का हाथ छोड़कर ;
मैं ;
इस शहर की भटकन भरी गलियों में खो गया ... !!
मुझे माँ के हाथ हमेशा ही याद आते रहे .....!!
वो माँ के थके हुए हाथ ,
मेरे लिए रोटी बनाते हाथ ,
मुझे रातो को थपकी देकर सुलाते हाथ ,
मेरे आंसू पोछ्ते हुए हाथ ,
मेरा सामान बांधते हुए हाथ ,
मेरी जेब में कुछ रुपये रखते हुए हाथ ,
मुझे संभालते हुए हाथ ,
मुझे बस पर चढाते हुए हाथ ,
मुझे ख़त लिखते हुए हाथ ,
बुढापे की लाठी को कांपते हुए थामते हुए हाथ ,
मेरा इन्तजार करते करते सूख चुकी आँखों पर रखे हुए हाथ ...!
फिर एक दिन हमेशा के हवा में खो जाते हुए हाथ !!!
आज सिर्फ माँ की याद रह गयी है , उसके हाथ नहीं !!!!!!!!!!!
न जाने ;
मैं किसकी तलाश में इस शहर आया था .............
© विजय

Tuesday, June 2, 2015

मेरा कुछ सामान



कुछ दिन पहले मेरा कुछ सामान
मैंने तुम्हारे पास रख छोडा था !

वो पहली नज़र ..
जिससे तुम्हे मैंने देखा था ;
मैं अब तक तुम्हे देख रहा हूँ..

वो पहली बार तुम्हे छूना..
तुम्हारे नर्म लबो के अहसास आज भी
अक्सर मुझे रातों को जगा देते है ..

वो सारी रात चाँद तारो को देखना ..
वो सारी सारी रात बाते करना ....
मैं अब भी तुम्हे चाँद में ढूंढता हूँ

वो तुम्हारे काँधे के पार मेरा देखना...
वो तुम्हारा खुलकर मुस्कराना
तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरा सहारा बनी हुई है

वो साथ साथ दुनिया को देखना ..
वो अनजानी गलियों में भटकना ...
तेरे साथ का साया अब तक मेरे साथ है

वो तुम्हारी आँखों की गहरयियो में झांकना ..
वो तुम्हारी गुनगुनाहट को सुनना ...
वो तुम्हे जानना ,तुम्हे पहचानना

वो तुम्हारे कदमो की आहट ..
वो मेरे हाथो का स्पर्श ....
वो हमारा मिलना और जुदा होना

वो मेरा बोलना , वो तुम्हारा सुनना ..
वो मौन में उतरती बाते
वो चुपचाप गहराती राते

वो कविता ....वो गीत ..
वो शब्द ,वो ख़त ,
तुम्हारे लिखे ख़त अब , मेरी साँसे बनी हुई है

वो ढलती हुई शाम ..
वो उगता हुआ सूरज
वो ज़िन्दगी का चुपचाप गुजरना

वो तुम्हारा आना ..
वो तुम्हारा जाना ...
वो ये ;
वो वो .............
जाने क्या क्या ....

इन सब के साथ ,
मेरे कुछ आंसू भी है जांना तुम्हारे पास......

तुम्हे कसम है हमारी मोहब्बत की
मेरा सामान कभी वापस न करना मुझे !!!


© विजय

Thursday, May 21, 2015

शहीद हूँ मैं .....

आज " आतंकवाद विरोध दिवस " पर मैं अपनी एक नज़्म आपको नज़र करता हूँ .
दोस्तों , मेरी ये नज़्म , उन सारे शहीदों को मेरी श्रद्दांजलि है , जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर , देश को आतंक से मुक्त कराया. मैं उन सब को शत- शत बार नमन करता हूँ. उनकी कुर्बानी हमारे लिए है ............

शहीद हूँ मैं .....

मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...
जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..
जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.
जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी
जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
वो अब भी मेरे लिए जागते है ...
मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………..

© विजय

Sunday, April 12, 2015

मेरा होना और न होना ....

उन्मादित एकांत के विराट क्षण ; जब बिना रुके दस्तक देते है .. आत्मा के निर्मोही द्वार पर ... तो भीतर बैठा हुआ वह परमपूज्य परमेश्वर अपने खोलता है नेत्र !!! तब धरा के विषाद और वैराग्य से ही जन्मता है समाधि का पतितपावन सूत्र ....!!! प्रभु का पुण्य आशीर्वाद हो तब ही स्वंय को ये ज्ञान होता है की मेरा होना और न होना.... सिर्फ शुन्य की प्रतिध्वनि ही है....!!! मन-मंथन की दुःख से भरी हुई व्यथा से जन्मता है हलाहल ही हमेशा ऐसा तो नहीं है ... प्रभु ,अमृत की भी वर्षा करते है कभी कभी ... तब प्रतीत होता है ये की मेरा न होना ही सत्य है ....!! अनहद की अजेय गूँज से ह्रदय होता है जब कम्पित और द्रवित ; तब ही प्रभु की प्रतिच्छाया मन में उभरती है और मेरे होने का अनुभव होता है !!! अंतिम आनंदमयी सत्य तो यही है की ; मैं ही रथ हूँ , मैं ही अर्जुन हूँ , और मैं ही कृष्ण .....!! जीवन के महासंग्राम में ; मैं ही अकेला हूँ और मैं ही पूर्ण हूँ मैं ही कर्म हूँ और मैं ही फल हूँ मैं ही शरीर और मैं ही आत्मा .. मैं ही विजय हूँ और मैं ही पराजय ; मैं ही जीवन हूँ और मैं ही मृत्यु हूँ प्रभु मेरे ; किंचित अपने ह्रदय से आशीर्वाद की एक बूँद मेरे ह्रदय में प्रवेश करा दे !!! तुम्हारे ही सहारे ही ; मैं अब ये जीवन का भवसागर पार करूँगा ...!!! प्रभु मेरे , तुम्हारा ही रूप बनू ; तुम्हारा ही भाव बनू ; तुम्हारा ही जीवन बनू ; तुम्हारा ही नाम बनू ; जीवन के अंतिम क्षणों में तुम ही बन सकू बस इसी एक आशीर्वाद की परम कामना है .. तब ही मेरा होना और मेरा न होना सिद्ध होंगा .. प्रणाम.. कविता © विजय कुमार

Wednesday, April 8, 2015

प्रेम



हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी
और बांटना था प्यार
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे !
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा
नदी के साथ मन बांटा
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी
और कहा उनसे कि वो आशीष दे
हमारे प्रेम को
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह
और
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए
धरती आकाश और नदी पीछे ,
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से
और दोनों का आत्मा से
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ,
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की
देवता सच में होते है कहीं ?

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित
अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;
तुम और मैं
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित
किन्ही दुसरे स्त्री पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 



Thursday, January 22, 2015

पिताजी की स्मृति में...................


दोस्तों, आज पिताजी को गुजरे एक माह हो गए.

इस एक माह में मुझे कभी भी नहीं लगा कि वो नहीं है. हर दिन बस ऐसे ही लगा कि वो गाँव में है और अभी मैं मिलकर आया हूँ और फिर से मिलने जाना है. कहीं भी उनकी कमी नहीं लगी. यहाँ तक कि संक्रांति की पूजा में भी ऐसा लगा कि वो है. बस कल अचानक लगा कि फ़ोन पर उनसे बात करू तो डायल कर बैठा और सिर्फ फ़ोन की घंटी बजती रही. बहुत देर तक..............कोई उसे उठाने वाला नहीं था !

आज सोचा कि पिताजी की स्मृति पर कुछ लिखू.

पिताजी ने बहुत बरस पहले हमारे गाँव को रोजगार के लिए छोड़ दिया था. कलकत्ता में कुछ दिन रहे फिर नागपुर में आकर बसे. वही पर हम तीनो भाई बहनों का जन्म हुआ. और फिर हमारी पढाई नौकरी इत्यादि भी वही की शुरुवात है. पिताजी ने गाँव भले ही छोड़ा हो, लेकिन जैसे कि होता है, गाँव ने उन्हें और हमें नहीं छोड़ा. हम भी यदा-कदा गाँव जाते रहे. लेकिन गाँव में कुछ भी नहीं रहा था !

पिताजी की ज़िन्दगी में पांच टर्निंग पॉइंट आये. [१] उन की नागपुर में नौकरी. [२] मेरा इंजिनियर बन जाना. [३] मेरी माँ की मृत्यु और [४] मेरी बहन की शादी. और फिर एक सबसे बड़ा और पांचवा टर्निंग पॉइंट आया. मेरी बेटी का जन्म, बस वो उसी में रम गए. हम सब एक तरफ और वो और मेरी बेटी एक तरफ. ज़िन्दगी बस गुजरती रही. और फिर इन सब के बाद, बहुत बरसो के बाद, जब हम तीनो भाई बहन धीरे धीरे जमने लगे अपनी ही अलग अलग दुनिया में तो वो कभी गाँव में रहते, कभी हम तीनो के पास रहते. उनकी ज़िन्दगी कुछ इसी तरह से गुजरती रही.

फिर मैंने अपने गाँव के टूटे फूटे घर को थोडा अच्छा बनवा दिया ताकि वो और मेरे ताऊ जी अच्छे से रह सके. ज़िन्दगी अच्छे से बस गुजरती रही.

उनके और हमारे परिवार के अन्य सदस्यों के दो पीढी के जेनेरेशन गैप में कई बाते कभी पसंद की गयी और कई बाते नापसंद की गयी. कुछ आदतों और बातो को स्वीकार किया गया, कुछ पर आपत्ति उठायी गयी. लेकिन मैं हमेशा उनके साथ रहा, भले ही उनकी कुछ बातो से मुझे मेरी विचारधारा नहीं मिलती थी. कई बार मेरा और उनका कई बातो पर विरोध हुआ. और फिर बाद में patch-up भी होता रहा. लेकिन फिर भी मेरे लिए पिता ही थे. और अंत तक रहे.

उनकी जब भी तबियत ख़राब होती, मैं या मेरा छोटा भाई हमेशा उनके पास होते. मेरे छोटे भाई ने भी उनकी बहुत सेवा की.उनके साथ होते. उनका बेहतर से बेहतर इलाज होता और फिर कुछ दिन साथ में गुजारने के बाद फिर गाँव में रहने जाते. जिस गाँव से वो वो सब कुछ खोकर बाहर निकले थे, हम ने उस गाँव को उन्हें वापस दिया था. घर और दूसरी सारी सुविधाओं के साथ !

और वो खुश ही थे. मुझसे हमेशा ही कहते रहते थे की तू इतना अच्छा क्यों है, तू हर जनम मेरा बेटा ही बनना. ऐसे ही प्रेम और अनुराग की बहुत सी बाते. और मैं बस मुस्करा देता था. वो अक्सर मुझसे अपनी की गयी गलतियों के बारे में भी दुखी होकर कहते, जिस पर मेरा कुछ विरोध रहा. लेकिन ये तो ज़िन्दगी है, बस इसे ऐसे ही गुजरना होता है. कभी ख़ुशी, कभी गम, कभी सही तो कभी गलत !

करीब ९-१० साल पहले जब मैंने अपने आपको ज़िन्दगी के एक नए आयाम स्पिरिचुअल डाईमेंशन में परावर्तित किया तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और ख़ुशी भी. और मुझसे कहते रहते कि तू जहाँ पहुंचा है वहां हममें से कोई नहीं पहुंचा. मैं मुस्कराकर कहता, आप सभी न होते तो मैं भी नहीं होता. बस ऐसे ही बातो से जीवन गुजर रहा था.

मैंने अपनी माँ को बहुत चाहा,अब भी चाहता हूँ, मुझे लगता है कि दुनिया में कोई और इंसान कभी भी मुझे मेरी माँ की तरह प्रेम नहीं कर सकेंगा. लेकिन मेरे पिताजी भी मुझे बहुत चाहते थे. मेरे स्वभाव में उन्हें मेरी माँ नज़र आती थी. जो क्षमा की देवी थी !

करीब ७ महीने पहले उनके एक रूटीन चेकअप के दौरान पता चला कि उन्हें liver cancer – terminal stage पर है. हम सब को एक आघात सा लगा. मैंने करीब ४ हॉस्पिटल में उन्हें दिखाया. पर सभी डॉक्टर्स ने एक ही बात कही की अब ज्यादा समय नहीं रहा है, मुश्किल से ६ महीने !

मेरे पिताजी को इस समाचार पर विश्वास नहीं हुआ. मैंने उनसे बैठकर बात की, उनसे कहा कि ये सच है. लेकिन अब इससे भी बड़ी बात ये है कि आपको पूरी तरह से जीना है और अपने जीवन के अंत को स्वीकार करना है. ये सब बाते उनके लिए मुश्किल थी. वो समझ नहीं पा रहे थे. उनके पैर में एक घाव हो गया था, मैं उसकी ड्रेसिंग करता, उन्हें दवाई देता और उनसे ढेर सारी बाते करते रहता. लेकिन जैसे ही मैं कुछ देर के लिए उनसे अलग होता वो अपने एकांत में चले जाते. वो अपने जीवन के इस तरह के अंत को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे.

फिर एक दिन मैंने उनसे पूछा कि वो कहाँ से जीवन को विदा कहना चाहते है, मेरे घर से या छोटे भाई के घर से या गाँव से. उन्होंने सोचकर कहा कि वो गाँव से ही विदा होना चाहते है क्योंकि वो वही पैदा हुए, वही बड़े हुए, वही पर शुरुवाती रोजगार किया और वही उनका ब्याह हुआ, वही पर से वो नागपुर पहुंचे और फिर अब वो वही से, अपने गाँव से विदा होना पसंद करेंगे.

मैंने गाँव में सारी व्यवस्था की. और उन्हें गाँव में लेकर गया. मैंने हर १० दिन में गाँव जाता,हफ्ता भर रहता जाता, उनके साथ वक़्त बिताता. मैंने दवाई और खाने पीने की सारी व्यवस्था कर दी. धीरे धीरे मेरा भी गाँव से एक रिश्ता बन गया. मैंने पिताजी के साथ बहुत देर तक बैठकर बहुत सी बाते करता.

धीरे धीरे मैंने उन्हें मृत्यु को प्रेम से और आनंद से स्वीकार करने के लिए तैयार कर दिया. अब वो सहज हो चुके थे. मैंने उन्हें बहुत सी कहानियाँ बतायी. लेकिन मृत्यु से शायद सभी को डर लगता ही है. उन्हें समय लगा सहज होने के लिए और मेरी ही सोच पर उतर कर जीने के लिए !

ज़िन्दगी अब जैसे रिवर्स गियर में चल रही थी. जैसे उन्होंने मुझे बड़ा किया था वैसे ही अब मैं उनके साथ कर रहा था. मैं उन्हें खिलाता. मैं उन्हें चलाता, मैं कहानी बताता, उनकी ड्रेसिंग करता, उनके कपडे बदलता, उनका मल-मूत्र साफ़ करता. उन्हें अपने साथ लेकर चलाता. उनकी खूब सेवा की.

मैंने उनसे कहा कि जैसे उन्होंने जीवन को स्वीकार किया है, वैसे ही वो मृत्यु को भी स्वीकार करे. जो हो गया वो हो गया. जो बीत गया वो बीत गया. उन्होंने एक भरा पूरा जीवन जिया है. एक परिवार, एक ज़िन्दगी. सब कुछ तो जी लिया है. अब किसी भी बात से उन्हें व्यथित नहीं होना चाहिए.

मैंने उनसे एक बार कहा, हो सकता हो की जीवन की इस आपाधापी में इतने बरसो में कभी मुझसे कोई गलती हुई हो, तो वो मुझे माफ़ जरुर करे. क्योंकि ये ज़िन्दगी तो बहुत सी घटनाओ का ही जमा-पूँजी होती है.तो उन्होंने कहा कि मुझसे कभी भी कोई गलती नहीं हुई और उन्होंने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद दिया था.

उनके लिए अंतिम दिनों में मैं उनका पुत्र ही नहीं बल्कि उनका दोस्त, उनकी माँ, उनका भाई, उनका सन्यासी गुरु बन गया था जो कि उनसे जीवन के अंत को स्वीकार करने की कला को जानने के बारे में कहता था.

और फिर इसी तरह से पिछले साल के ६ महीने गुजरे और उन्होंने २२ दिसंबर २०१४ को सुबह ५ बजे अंतिम सांस ली !

जैसे एक युग का ही अंत हुआ हो, पर मुझे तो अब भी वो करीब ही है ऐसा ही लगता है, कोई कमी नहीं महसूस होती है. वो अक्सर मुझसे कहते थे, विजया [ उन्होंने मुझे कभी विजय नहीं कहा, बस हमेशा विजया ही कहा, माँ भी विजया ही कहती थी ] तू हमेशा इतना शांत कैसे रह सकता है, इतनी मुश्किल में भी हँसना, ये तो बहुत कठिन है मैं उनसे कहता, यही सबसे आसान है इसी तरह से जीना है. और इसे ही जीवन कहते है. वो मुझे बहुत सा आशीर्वाद देते और मैं बस मुस्करा देता.

आज वो शरीर रूप में नहीं है, लेकिन उनका प्रेम और उनका आशीर्वाद हमेशा ही मेरे साथ है.

उनको नमन और श्रद्धांजलि.

विजय 

[ फोटो में मेरे पिताजी , मेरे बच्चो के साथ ]




Tuesday, January 13, 2015

माँ



संसार में सबसे अच्छा ,सबसे सच्चा और सबसे प्यारा शब्द सिर्फ और सिर्फ " मां " ही है !
आज अम्मा को गए २६ बरस बीत गए. अम्मा से मेरा रिश्ता ईश्वर से जुड़ने का ही है वो कहते है न, since God can not be everywhere so he created mothers !

आज वो शरीर रूप में भले ही न हो , पर मैंने उन्हें हमेशा अपने पास ही पाया . मैं जो कुछ भी हूँ , उनकी वजह से हूँ . मुझमे मौजूद हर अच्छाई , उनकी ही है . मैं भी उनका ही हूँ . आज भी भीड़ भरी जिंदगी में उनके बिना अपना अकेलापन मन को बहुत सीलता है .. बहुत दर्द देता है ... सच में माँ की जगह इस संसार में कोई नहीं ले सकता है .....


इस संसार की सारी माताओं को मेरा प्रणाम .

मैंने कुछ दिन पहले एक कविता लिखी थी " माँ का बेटा " . वही आज आप सभी के साथ बाँट रहा हूँ.









"माँ का बेटा"

वो जो अपनी माँ का एक बेटा था
वो आज बहुत उदास है !
बहुत बरस बीते ,
उसकी माँ कहीं खो गयी थी .....

उसकी माँ उसे नहलाती ,
खाना खिलाती , स्कूल भेजती
और फिर स्कूल से आने के बाद ,
उसे अपनी गोद में बिठा कर खाना खिलाती
अपनी मीठी सी आवाज़ में लोरियां सुनाती ..
और उसे सुलाती , दुनिया की नज़रों से बचाकर ....रखती !!!

उस बेटे को कभी कुछ माँगना न पड़ा ,
सब कुछ माँ ही तो थी ,उसके लिए ,
हमेशा के लिए... उसकी दुनिया बस उसकी माँ ही तो थी
अपनी माँ से ही सीखा उसने
सच बोलना , और हँसना
क्योंकि ,माँ तो उसके आंसुओ को
कभी आने ही नहीं देती थी
माँ से ही सीखा ,नम्रता क्या होती है
और मीठे बोल कैसे बोले जातें है
माँ से ही सीखा ,
कि हमेशा सबको क्षमा किया जाए
और सबसे प्यार किया जाए
वो जो अपनी माँ का एक बेटा था
वो आज बहुत उदास है !!

बहुत बरस बीते ,
उसकी माँ खो गयी थी ..
बहुत बरस हुए , उसकी माँ वहां चली गयी थी ,
जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता ,
शायद ईश्वर को भी अच्छे इंसानों की जरुरत होती है !
वो जो बच्चा था ,वो अब एक
मशीनी मानव बना हुआ है ...
कई बार रोता है तेरे लिए
तेरी गोद के लिए ...

आज मैं अकेला हूँ माँ,
और बहुत उदास भी
मुझे तेरे बिन कुछ अच्छा नहीं लगता है
यहाँ कोई नहीं ,जो मुझे ; तुझ जैसा संभाले
तुम क्या खो गयी ,
मैं दुनिया के जंगल में खो गया !

आज ,मुझे तेरी बहुत याद आ रही है माँ !!!

विजय

Tuesday, December 2, 2014

अंतिम यात्रा

एक दिन ऐसे ही प्रभु की भेजी हुई नाव में बैठकर 
एक न लौटने वाली यात्रा पर चले जाऊँगा ! 
अनंत में खो जाने के लिए
धरती में मिल जाने के लिए
अंतिम आलिंगन मेरा स्वीकार करो प्रभु
मैं भी तेरा , मेरा जीवन भी तेरा प्रभु 
मैं मृत्यु का उत्सव मनाता हूँ प्रभु
बस मेरे शब्द और मेरी तस्वीरे ही मेरे निशान होंगे प्रभु
मुझे स्वीकार करो प्रिय प्रभु
इसी उत्सव के साथ , इसी ख़ुशी के साथ
मैं अंत में तुझमे समां जाऊं प्रभु


Sunday, June 8, 2014

||| नज़्म |||



बड़ी देर हो गई है ,
कागज़ हाथ में लिए हुए !

सोच रहा हूँ ,
कि कोई नज़्म लिखूं !

पर शब्द कहीं खो गए है ,
जज्बात कहीं उलझ गए है ,
हाथों की उंगलियाँ हार सी गई है ;

क्या लिखु .... कैसे लिखु ...

सोचता हूँ ,
या तो ;
सिर्फ “खुदा” लिख दूं !
या फिर ;
सिर्फ “मोहब्बत” लिख दूं !
या फिर ;
तुम्हारा नाम ही लिख दूं !

इन तीनो से बेहतर भला
कोई और नज़्म क्या होंगी...!!!

© विजयकुमार 

Wednesday, April 2, 2014

प्रेम


हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी 
और बांटना था प्यार 
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे ! 
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा 
नदी के साथ मन बांटा 
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो 
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने 
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी 
और कहा उनसे कि वो आशीष दे 
हमारे प्रेम को 
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह 
और 
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि 
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए 
धरती आकाश और नदी पीछे , 
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से 
और दोनों का आत्मा से 
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से 
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था 
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ, 
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को 
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की 
देवता सच में होते है कहीं ? 

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित 
अतीत में और सपनो में ! 

और अब कहीं भी;
तुम और मैं 
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित 
किन्ही दुसरे स्त्री –पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 

Thursday, February 27, 2014

मैं, वो और मोहब्बत !


उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!

© नज़्म : विजय

Monday, February 10, 2014

::: मन-मंथन की दुःख गाथा ::: अपनी बात – part III :::


मन कुछ ख़राब सा है , आजकल कुछ ज्यादा ही रहने लगा है . मैंने अपने उस फोल्डर पर नज़र डाली है जिसका नाम था “unfinished stories & poems” . देखा तो करीब ३५ कहानियो के ड्राफ्ट थे , जिन्हें शुरू किये हुए करीब २ साल हो रहे थे. कुछ दिन पहले एक नयी किताब भी लिखना शुरू किया था खतो पर और करीब १०० से कविताएं थी , जो लिखकर भी अधूरी ही थी. मैंने सोचना शुरू किया कि क्या ये सब कुछ अधुरा ही रहा जायेंगा . क्या मेरा एक छोटा सा जीवन पर्याप्त है; मुझमे मौजूद विविधताओं को जीने के लिए ?

सोचता हूँ कि कुछ कविताएं लिखू फिर मर जाऊं या कुछ कहानियाँ बुन लूं ,फिर मर जाऊं या एक उपन्यास जो पिछले १५ सालो से लिखने की सोच रहा हूँ वो ही लिख लूं फिर मर जाऊं. दो –तीन किताबे लिख लूं और फिर दुनिया से चला जाऊं .

लिखना और मरना और जीना सब साथ साथ चल रहे है . कुछ लिखता हूँ तो लगता है जी गया , और फिर अगला ही पल मृत्यु का होता है . जीवन की कई राहो पर एक साथ चलना भी कठिन ही होता है . और फिर मैं तो शब्दों का और सपनो का सौदाकार हूँ .......!!!

कुछ दिन पहले कुछ नए closeup लेंस खरीदे ताकि और फोटोग्राफी कर सकूँ. वो सब वैसे ही रखे है . जिसे शूट करना चाहा वो मिला ही नहीं !!! एक नयी पेंटिंग शुरू की Nefertiti – The queen of Egypt वो भी अधूरी ही है . बहुत सारी किताबे खरीद ली ताकि और पढ़ सकू , ताकि मैं खुद कुछ और अच्छा लिख सकू ..लेकिन वो बस कुछ पेज ही ........ और फिर सब रुक गया है ....सब कुछ उलझा हुआ है ... या यूँ कहू कि सब कुछ उलझ सा गया है .

कितनी सारी lounge music DVDs सारी दुनिया से मंगा लिया है . संगीत ही जीवन है मेरा ... उन्हें भी पूरा नहीं सुन पा रहा हूँ एक ट्रैक सुनता हूँ ,फिर MTV coke studio पर चला जाता हूँ फिर soft ballads फिर जगजीत की गज़ले .... और फिर कोई jazz track या बॉब मारली.. फिर देवा प्रेमल ....... बस न जाने क्या क्या .... अभी किसी से दोस्ती हुई तो उसने बताया कि उसे ३७ इंस्ट्रूमेंट्स आते है बजाना . मैं अवाक रह गया हूँ ....... और मुझे सिर्फ drums.... !!!

कैसी भटकन है ..कैसी उलझन है .. क्या हम सब इसी तरह जी रहे है क्या ...या सिर्फ मैं ही इन लहरों से लड़ रहा हूँ .

सब कुछ ठहरा हुआ सा है ...रुका हुआ सा है ...

एक और फोल्डर है मन में बसा हुआ ..... उसमे पता नहीं ....क्या क्या भरा हुआ है .....उसे कब खाली कर पाऊंगा ये बता पाना ही असंभव है .

१५ दिन की मेहनत से ‘मानवता’ पर एक कविता लिखी , उस पर ५ कमेंट मिलते है . ऐसे ही ५ मिनट में कोई प्रेम-विरह की नज़्म लिखता हूँ तो उस पर ४० कमेंट आते है . दुनिया क्या चाहती है ....

फेसबुक एक और तमाशा है . मन एक झूठी आशा और निराशा में यहाँ आता है और पता नहीं क्या क्या सोचता है . जिनके प्रोफाइल को मैं देखता हूँ ; मैं उनके जीवन में सिर्फ नाम ही हूँ .. न्यूज़ फीड में दुनिया भर का शोर ! जाने क्या क्या वाही –तबाही !! लोग कितना नकली जीवन जीते है न .

एक नौकरी है जो पता नहीं मुझे कहाँ ले जा रही है . पिछले बरस professionally और financially मैं जो collapse हुआ , बस पूछो मत ..बिमारी में घर बिक गया .सब कुछ ख़त्म सा हो गया , मुझमे अगर मेरा अध्यात्म न होता तो पता नहीं मैं कैसा संभल पाता . जीवन अब कहाँ जा रहा है .. समझ ही नहीं आता है .

समय – शब्द - चित्र - रंग - मौसम - रात - दिन – आना – जाना –हंसी और आंसू ...ज़िन्दगी करीब करीब इन्ही टुकडो में बंटी हुई है . और ये सब टुकड़े शब्द बनकर उभरते है .

चुप रहता हूँ तो भीतर का शोर आंसू बन जाते है . बोलता हूँ तो बाहर का शोर दर्द बन जाता है. जिनसे बोलना सुनना चाहता हूँ वो बात नहीं करते और जो मुझसे बाते करते है वो दुनिया की बाते करते है .

लोगो को मैं कितना हंसाता हूँ , खुद हँसे जाने कितने दिन हो गए !

किसी को चाहना भी एक दुःख का कारण ही है . बहुत से दुःख हमारे खुद के द्वारा ही उपजाए होते है . अपेक्षा और उपेक्षा के मध्य जीवन का जीना होता है .

एक दिन सब कुछ ठहर जायेंगा ..हमेशा के लिए ! मैं खुद ही ख़ामोशी को अपना लूँगा .... फिर कुछ दिनों बाद फिर से लिखना शुरू करूँगा...जब मन शांत हो जाए. अगर हो जाए तो !

विजय

Tuesday, February 4, 2014

मानवता के स्वप्न अब तक अधूरे है



 
स्वप्न मेरे, अब तक वो अधूरे है;  
जो मानव के रूप में मैंने देखे है !

मानवता के उन्ही स्वप्नों की आहुति पर
आज विश्व सारा;
एक प्राणरहित खंडहर बन खड़ा है !

आज मानवता एक नए युग-मानव का आह्वान करती है;
क्योंकि,
आदिम-मानव के उन अधूरे स्वप्नों को,
इस नए युग-मानव को ही पूर्ण करना होंगा !

स्वप्न था कि,
एक अकाल मुक्त विश्व हो,
जहाँ न कोई प्यासा रहे और न ही कोई भूखा सोये;
हर मानव को जीने के लिए अन्न और जल मिले !
पर अभिशप्त आदिम तृष्णा ने अर्ध-विश्व को,
भूखा–प्यासा ही रखा है अब तक !
मेरा वो खाद्यान से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक हर भाषा के अक्षरों से संपन्न विश्व हो,
जहाँ हर कोई किताब और कलम को ह्रदय से लगाए;
अक्षरों से मिल रहे ज्ञान पर अधिकार हो हर किसी का !
पर निर्धनता के राक्षस ने कागज़ और कलम के बदले में,
क्षणिक मजदूरी थमा दी मासूमो के हाथो में !
मेरा वो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक स्वछन्द मेघो और स्वतंत्र विचारों से भरा हुआ विश्व हो,
जहाँ मानवता मुक्त पक्षियों की तरह उड़ान भरे;
जहाँ जीवन स्वतंत्रता और खुशियों की सांस ले हर क्षण !
पर युद्ध की विभीषिका ने बारूद से सारा आकाश ढक दिया है,
और निर्दोषों के रक्त से सींचकर, इस भूमि को अपवित्र कर दिया है !
मेरा वो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
इंसानों, पशुओ और वृक्षों से स्पंदित एक सुन्दर विश्व हो,
कि हर किसी को यहाँ जीवन-ऊर्जा की प्राण-छाया मिले;
इस धरा ने हम सभी को जीने लायक कितना कुछ तो दिया है !
पर इंसान हैवान बन गया, पशु मिट गए और वृक्ष ख़त्म हो गए,
और अब हमारा ये एकमात्र भूमण्ड़ल ख़त्म होने की कगार पर है !
मेरा वो प्रकृति के प्रति मातृभाव से भरे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सरहदे न रहे; सृष्टि में एक सकल बंधुत्व हर ओर बना रहे,
इस धरती पर जो कि हम सबके लिए है; सिर्फ मानवता ही बसी रहे;
पर, हमने सरहदे बना दी और जमीन को अनचाहे हिस्सों में बाँट दिया !
अपने देश बेगाने से और अपने इंसान पराये से हो गए / कर दिए,
धर्म को अधर्म में बदल दिया और अंत में ईश्वर को भी बाँट दिया !
मेरा वो सर्वव्यापी बंधुत्व वाले विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
हम प्रेम, मित्रता और भाईचारा को बिना शर्त निभाये,
पर हमने प्रेम की ह्त्या की, मित्रता में विश्वासघात किया;
और भ्रातुत्व के भाव को जलाया; और जीने के लिए शर्ते रखी  !
इंसानों का घृणित व्यापार किया और  स्वंय को लालसा / वासना के दांव पर लगाया,
और आज सम्पूर्ण विश्व प्रेम, मित्रता और भ्रातृभाव से वंचित है !
मेरा वो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सारी पृथ्वी पर बुद्ध की असीम शान्ति की स्थापना हो,
सारी वसुंधरा में कृष्ण के पूर्ण प्रेम का बहाव हो;
सारी भूमि पर ईशा का सदैव क्षमाभाव हो !
हर धर्म, हर भाषा, हर जाती और व्यक्ति का सम्मान हो  !
पर अब सिर्फ आदमियत की विध्वंसता बची है और ईश्वर कहीं खो से गए है !
एक अतुलनीय विश्व के जागरण का मेरा वो स्वप्न अब तक अधुरा है !


स्वप्न था कि,
मानव मुक्त हो राग, द्वेष, क्रोध, पाप और वासना के मन-मालिन्य से,
अंहकार, आकांक्षाओ, सांसारिक धारणाओ और असीमित आसक्तियो से;
और भर जाए जीवन के उल्लास से और प्रफुल्लित कर दे अपनी आत्मा को;
बच्चो की मासूमियत, फूलो के सौन्दर्य और वर्षा की तृप्त अनुभूतियो से !
एक नये जीवन का; एक नए युग-मानव का और एक नए विश्व का जन्म हो !
मेरा वो प्राण -स्पंदन से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

हां !
देशकाल के अँधेरे अवरोधनो से मुक्त होकर,
हमें एक नए युग-मानव के रूप में बदलकर;
मानवता के इन अधूरे स्वप्नों को पूरा करना ही होंगा !

हां !
वो हम ही होंगे जो एक नए विश्व का निर्माण करेंगे,
जहाँ निश्चिंत ही हम मानवो के सारे अधूरे स्वप्न पूरे होंगे !

हाँ !
एक सुन्दर और प्यारा विश्व होंगा, जो हम सबका होंगा;
जो खाद्यान से भरा हुआ होंगा, हर किसी के लिए !
जो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान होंगा, हर मानव के लिए !
जो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त होंगा, हर इंसान के लिए !
जो प्रकृति के मातृभाव से भरा होंगा, हर मनुष्य के लिए !
जो सार्वभौमिक, सर्वव्यापी बंधुत्व वाला होंगा, हर व्यक्ति के लिए !
जो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबा हुआ होंगा; हर किसी के लिए !

और मेरा वो आदिम / प्राचीन स्वप्न,
जिसमे मैं;
एक अतुलनीय, अप्रतिम,  उत्कृष्ट,  सार्वभौमिक, अद्भुत  और,
प्राण-स्पंदन से भरे हुए विश्व का नूतन जागरण देखता हूँ;
वो अवश्य पूरा होंगा !

मैं अपने सारे अधूरे स्वप्न,
इस धरा को और नए युग-मानव को समर्पित करता हूँ !