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Wednesday, September 6, 2017

“ रे मन ”



रूह की मृगतृष्णा में
सन्यासी सा महकता है मन

देह की आतुरता में
बिना वजह भटकता है मन

प्रेम के दो सोपानों में
युग के सांस लेता है मन

जीवन के इन असाध्य
ध्वनियों पर सुर साधता है मन

रे मन
बावला हुआ जीवन रे
मृत्यु की छाँव में बस जा रे
प्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रे
आजा मन रे मन  !


© विजय

Saturday, September 2, 2017

“ क्षितिज ”



मिलना मुझे तुम उस क्षितिज पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिज है कहाँ प्रिय ।
© विजय


Tuesday, August 22, 2017

चल वहां चल ,

चल वहां चल ,
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!

जहाँ नीली नदी खामोश बहती हो
जहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए हो
जहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े हो
जहाँ शाम धुन्धलाती न हो
जहाँ कुल जहान का मौन हो
जहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम हो
जहाँ बस तू हो
चल वहाँ चल
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!

उसी एक लम्हे में मैं तुझसे मोहब्बत कर लूँगा
वि ज य

Saturday, May 20, 2017

जीवन


हमें लिखना होंगा जीवन की असफलताओं के बारे में
ताकि फिर उड़ सके हम इतिहास के नभ में
हमें फूंकना होंगा टूटे हुए सपनो में नयी उर्जा 
ताकि मृत जीवन की अभिव्यक्ति को दे सके
कुछ और नयी साँसे !
© विजय

Monday, March 13, 2017

ज़िन्दगी

मैं खुदा के सजदे में था ;
जब तुमने कहा, ‘मैं चलती हूँ !’
.......इबादत पूरी हुई 
................मोहब्बत ख़त्म हुई 
..............................और ज़िन्दगी ?
वि ज य

Friday, March 10, 2017

क्षितिझ

मिलना मुझे तुम उस क्षितिझ पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी 
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिझ है कहाँ प्रिय ।
वि ज य

Friday, January 13, 2017

आज माँ की बरसी पर तीन कविताएं :











"माँ का बेटा"



वो जो अपनी माँ का एक बेटा था
वो आज बहुत उदास है !
बहुत बरस बीते ,
उसकी माँ कहीं खो गयी थी .....

उसकी माँ उसे नहलाती ,
खाना खिलाती , स्कूल भेजती
और फिर स्कूल से आने के बाद ,
उसे अपनी गोद में बिठा कर खाना खिलाती
अपनी मीठी सी आवाज़ में लोरियां सुनाती ..
और उसे सुलाती , दुनिया की नज़रों से बचाकर ....रखती !!!

उस बेटे को कभी कुछ माँगना न पड़ा ,
सब कुछ माँ ही तो थी ,उसके लिए ,
हमेशा के लिए... उसकी दुनिया बस उसकी माँ ही तो थी
अपनी माँ से ही सीखा उसने
सच बोलना , और हँसना
क्योंकि ,माँ तो उसके आंसुओ को
कभी आने ही नहीं देती थी
माँ से ही सीखा ,नम्रता क्या होती है
और मीठे बोल कैसे बोले जातें है
माँ से ही सीखा ,
कि हमेशा सबको क्षमा किया जाए
और सबसे प्यार किया जाए
वो जो अपनी माँ का एक बेटा था
वो आज बहुत उदास है !!

बहुत बरस बीते ,
उसकी माँ खो गयी थी ..
बहुत बरस हुए , उसकी माँ वहां चली गयी थी ,
जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता ,
शायद ईश्वर को भी अच्छे इंसानों की जरुरत होती है !
वो जो बच्चा था ,वो अब एक
मशीनी मानव बना हुआ है ...
कई बार रोता है तेरे लिए
तेरी गोद के लिए ...

आज मैं अकेला हूँ माँ,
और बहुत उदास भी
मुझे तेरे बिन कुछ अच्छा नहीं लगता है
यहाँ कोई नहीं ,जो मुझे ; तुझ जैसा संभाले
तुम क्या खो गयी ,
मैं दुनिया के जंगल में खो गया !

आज ,मुझे तेरी बहुत याद आ रही है माँ !!!




"माँ / तलाश"



माँ को मुझे कभी तलाशना नहीं पड़ा;
वो हमेशा ही मेरे पास थी और है अब भी .. !
लेकिन अपने गाँव/छोटे शहर की गलियों में ,
मैं अक्सर छुप जाया करता था ;
और माँ ही हमेशा मुझे ढूंढती थी ..!
और मैं छुपता भी इसलिए था कि वो मुझे ढूंढें !!
....और फिर मैं माँ से चिपक जाता था ..!!!
अहिस्ता अहिस्ता इस तलाश की सच्ची आँख-मिचोली ,
किसी और झूठी तलाश में भटक गयी ,
मैं माँ की गोद से दूर होते गया ...!
और फिर एक दिन माँ का हाथ छोड़कर ;
मैं ;
इस शहर की भटकन भरी गलियों में खो गया ... !!
मुझे माँ के हाथ हमेशा ही याद आते रहे .....!!
वो माँ के थके हुए हाथ ,
मेरे लिए रोटी बनाते हाथ ,
मुझे रातो को थपकी देकर सुलाते हाथ ,
मेरे आंसू पोछ्ते हुए हाथ ,
मेरा सामान बांधते हुए हाथ ,
मेरी जेब में कुछ रुपये रखते हुए हाथ ,
मुझे संभालते हुए हाथ ,
मुझे बस पर चढाते हुए हाथ ,
मुझे ख़त लिखते हुए हाथ ,
बुढापे की लाठी को कांपते हुए थामते हुए हाथ ,
मेरा इन्तजार करते करते सूख चुकी आँखों पर रखे हुए हाथ ...!
फिर एक दिन हमेशा के हवा में खो जाते हुए हाथ !!!
आज सिर्फ माँ की याद रह गयी है , उसके हाथ नहीं !!!!!!!!!!!
न जाने ;
मैं किसकी तलाश में इस शहर आया था .............







"माँ"



आज गाँव से एक तार आया है !
लिखा है कि ,
माँ गुजर गई........!!

इन तीन शब्दों ने मेरे अंधे कदमो की ,
दौड़ को रोक लिया है !

और मैं इस बड़े से शहर में
अपने छोटे से घर की
खिड़की से बाहर झाँक रहा हूँ
और सोच रहा हूँ ...
मैंने अपनी ही दुनिया में जिलावतन हो गया हूँ ....!!!

ये वही कदमो की दौड़ थी ,
जिन्होंने मेरे गाँव को छोड़कर
शहर की भीड़ में खो जाने की शुरुवात की ...

बड़े बरसो की बात है ..
माँ ने बहुत रोका था ..
कहा था मत जईयो शहर मा
मैं कैसे रहूंगी तेरे बिना ..
पर मैं नही माना ..
रात को चुल्हे से रोटी उतार कर माँ
अपने आँसुओं की बूंदों से बचाकर
मुझे देती जाती थी ,
और रोती जाती थी.....

मुझे याद नही कि
किसी और ने मुझे
मेरी माँ जैसा खाना खिलाया हो...

मैं गाँव छोड़कर यहाँ आ गया
किसी पराई दुनिया में खो गया.
कौन अपना , कौन पराया
किसी को जान न पाया .

माँ की चिट्ठियाँ आती रही
मैं अपनी दुनिया में गहरे डूबता ही रहा..

मुझे इस दौड़ में
कभी भी , मुझे मेरे इस शहर में ...
न तो मेरे गाँव की नहर मिली
न तो कोई मेरे इंतज़ार में रोता मिला
न किसी ने माँ की तरह कभी खाना खिलाया
न किसी को कभी मेरी कोई परवाह नही हुई.....

शहर की भीड़ में , अक्सर मैं अपने आप को ही ढूंढता हूँ
किसी अपने की तस्वीर की झलक ढूंढता हूँ
और रातों को , जब हर किसी की तलाश ख़तम होती है
तो अपनी माँ के लिए जार जार रोता हूँ ....

अक्सर जब रातों को अकेला सोता था
तब माँ की गोद याद आती थी ..
मेरे आंसू मुझसे कहते थे कि
वापस चल अपने गाँव में
अपनी मां कि गोद में ...

पर मैं अपने अंधे क़दमों की दौड़
को न रोक पाया ...

आज , मैं तनहा हो चुका हूँ
पूरी तरह से..
कोई नही , अब मुझे
कोई चिट्टी लिखने वाला
कोई नही , अब मुझे
प्यार से बुलाने वाला
कोई नही , अब मुझे
अपने हाथों से खाना खिलाने वाला..

मेरी मां क्या मर गई...
मुझे लगा मेरा पूरा गाँव मर गया....
मेरा हर कोई मर गया ..
मैं ही मर गया .....

इतनी बड़ी दुनिया में ; मैं जिलावतन हो गया !!!!!

Saturday, January 7, 2017

रे मन




रूह की मृगतृष्णा में
सन्यासी सा महकता है मन

देह की आतुरता में
बिना वजह भटकता है मन

प्रेम के दो सोपानों में
युग के सांस लेता है मन

जीवन के इन असाध्य
ध्वनियों पर सुर साधता है मन

रे मन
बावला हुआ जीवन रे
मृत्यु की छाँव में बस जा रे
प्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रे
आजा मन रे मन  !


विजय 

Monday, January 2, 2017

सोचता हूँ...................



सोचता हूँ
कि
कविता  में शब्दों
की जगह
तुम्हें भर दूँ ;

अपने मन की भावों के संग

फिर मैं हो जाऊँगा
पूर्ण

विजय


Monday, May 30, 2016

लम्हों का सफ़र....


किसी एक लम्हे में तुमसे नज़रे मिली
और
उम्र भर का परदा हो गया...
किसी एक लम्हे में तुमसे मोहब्बत हुई
और
ज़िन्दगी भर की जुदाई मिली......

लम्हों का सफ़र
लम्हों में ही सिमटा रहा !!!
© विजय

Saturday, February 13, 2016

नज़्म

नज़्म :
मुझ से तुझ तक एक पुलिया है
शब्दों का,
नज्मो का,
किस्सों का,
और
आंसुओ का .......

......और हां; बीच में बहता एक जलता दरिया है इस दुनिया का !!!!

© विजय

Thursday, November 26, 2015

नज़्म : शहीद हूँ मैं .....


दोस्तों , मेरी ये नज़्म , उन सारे शहीदों को मेरी श्रद्दांजलि है , जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर , मुंबई को 26 / 11  को आतंक से मुक्त कराया. मैं उन सब को शत- शत बार नमन करता हूँ. उनकी कुर्बानी हमारे लिए है ............!!!

शहीद हूँ मैं .....

मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...

जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..

जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.

जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी

जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
वो अब भी मेरे लिए जागते है ...

मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………..

विजय



Saturday, October 17, 2015

एक ज़िन्दगी

एक ज़िन्दगी
और कितने सारे ख्वाब
बस एक रात की सुबह का भी पता नहीं ....
कितनी किताबे पढना है बाकी
कितने सिनेमा देखना है बाकी
कितने जगहों पर जाना है बाकी
हक़ीकत में एक पूरी ज़िन्दगी जीना है बाकी !
एक ज़िन्दगी
और कितने सारे ख्वाब
बस एक रात की सुबह का भी पता नहीं ....
© विजय

Thursday, October 15, 2015

एक नज़्म खुदा के लिए.........


उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा
तुमने उस हाथ को दफना दिया
अपनी जिस्म की जमीन में !
और कुछ आंसू जो मेरे नाम के थे ,
उन्हें भी दफना दिया अपनी आत्मा के साथ !

अब तुम हो
और मैं हूँ
और हम बहुत दूर है !
हां; इश्क खुदा के आगोश में चुपचाप बैठा है!

खुदा ने एक कब्र बनायीं है ,
तुम्हारी और मेरी ,
उसने उसमे कुछ फूल और आहो के साथ मेरी प्रार्थनाओ को भी दफ़न किया है !

हां ;
कुछ लोग अब भी मेरी नज्मे पढ़ते है और मोहब्बत की बाते करते है !

© विजय

Thursday, September 24, 2015

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

दुनिया भर घूम आते हो !
दुनिया को जी भर कर देखते हो !!
दुनिया से बाते करते रहते हो ....!!!

.......कभी उस मोड़ पर भी चले आओ.....जहाँ हम खड़े है ,
……….कभी हमें भी जी भर कर देख लो …….आँखे तुम्हारा इन्तजार करती रहती है ;
………कभी कोई एक लफ्ज़ हमारे नाम कर दो .......मन तुम्हे सुनने को तरसते रहताा है !

और फिर..... दुनिया के पास वो निगाहें कहाँ जो हमारे पास है !
और दुनिया के पास वो अलफ़ाज़ कहाँ जो हमारे दिल में है !
और इस फानी दुनिया के पास वो आगोश कहाँ जो हमारे बांहों में है !

all you have to remember that YOU live only once ....!

या तो इस तरह जी लो या फिर उस तरह ही जी जाओ , जो जी रहे हो .
फर्क बहुत मामूली है , उस जहान में मैं नहीं और इस जहान में मेरे सिवा कुछ भी नहीं ..!!!

© विजय

Friday, September 11, 2015

अंत

...............और अंत में कुछ भी न रह जायेंगा !!
न ही ये सम्मान , न ही ये मान ,
न ही ये धन और न ही ये यश !
बस ...चंद यादें कुछ अपनों के मन में 
और वो शब्द भी जो मैंने कभी लिखे थे !!!
एक अनंत की जिज्ञासा भी साथ में थी ,
साथ में ही रही और
अंत में साथ ही चली गयी !
प्रभु तुम ही तो हो एक मेरे
बाकी तो सब जग झूठा .....!
विजय


Saturday, August 22, 2015

यूँ ही ...

यूँ ही ...

ज़िन्दगी भर कुछ साए साथ साथ ही चलते है
और उन्ही सायो की याद में ये ख़ाक ज़िन्दगी;
.......कभी कभी गुलज़ार भी होती है !!!

सोचता हूँ अक्सर यूँ ही रातो को उठकर ...
अगर अम्मा न होती ,
अगर पिताजी न होते .
अगर तुम न होती ..
अगर वो दोस्त न होता ...
...चंद तकलीफ देने वाले रिश्तेदार न होते ...
...चंद प्यार करने वाले दुनियादार न होते ..

तो फिर जीना ही क्या होता !
यूँ ही ज़िन्दगी के पागलपन में लिखे गए अलफ़ाज़ भी न होते !

copyright © विजय कुमार

Sunday, June 7, 2015

||| कविता : ज़िन्दगी ||



भीगा सा दिन,
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !


कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

© विजय

Tuesday, June 2, 2015

मेरा कुछ सामान



कुछ दिन पहले मेरा कुछ सामान
मैंने तुम्हारे पास रख छोडा था !

वो पहली नज़र ..
जिससे तुम्हे मैंने देखा था ;
मैं अब तक तुम्हे देख रहा हूँ..

वो पहली बार तुम्हे छूना..
तुम्हारे नर्म लबो के अहसास आज भी
अक्सर मुझे रातों को जगा देते है ..

वो सारी रात चाँद तारो को देखना ..
वो सारी सारी रात बाते करना ....
मैं अब भी तुम्हे चाँद में ढूंढता हूँ

वो तुम्हारे काँधे के पार मेरा देखना...
वो तुम्हारा खुलकर मुस्कराना
तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरा सहारा बनी हुई है

वो साथ साथ दुनिया को देखना ..
वो अनजानी गलियों में भटकना ...
तेरे साथ का साया अब तक मेरे साथ है

वो तुम्हारी आँखों की गहरयियो में झांकना ..
वो तुम्हारी गुनगुनाहट को सुनना ...
वो तुम्हे जानना ,तुम्हे पहचानना

वो तुम्हारे कदमो की आहट ..
वो मेरे हाथो का स्पर्श ....
वो हमारा मिलना और जुदा होना

वो मेरा बोलना , वो तुम्हारा सुनना ..
वो मौन में उतरती बाते
वो चुपचाप गहराती राते

वो कविता ....वो गीत ..
वो शब्द ,वो ख़त ,
तुम्हारे लिखे ख़त अब , मेरी साँसे बनी हुई है

वो ढलती हुई शाम ..
वो उगता हुआ सूरज
वो ज़िन्दगी का चुपचाप गुजरना

वो तुम्हारा आना ..
वो तुम्हारा जाना ...
वो ये ;
वो वो .............
जाने क्या क्या ....

इन सब के साथ ,
मेरे कुछ आंसू भी है जांना तुम्हारे पास......

तुम्हे कसम है हमारी मोहब्बत की
मेरा सामान कभी वापस न करना मुझे !!!


© विजय

Wednesday, April 8, 2015

प्रेम



हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी
और बांटना था प्यार
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे !
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा
नदी के साथ मन बांटा
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी
और कहा उनसे कि वो आशीष दे
हमारे प्रेम को
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह
और
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए
धरती आकाश और नदी पीछे ,
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से
और दोनों का आत्मा से
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ,
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की
देवता सच में होते है कहीं ?

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित
अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;
तुम और मैं
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित
किन्ही दुसरे स्त्री –पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 



एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...