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Saturday, February 13, 2016

नज़्म

नज़्म :
मुझ से तुझ तक एक पुलिया है
शब्दों का,
नज्मो का,
किस्सों का,
और
आंसुओ का .......

......और हां; बीच में बहता एक जलता दरिया है इस दुनिया का !!!!

© विजय

Saturday, August 22, 2015

यूँ ही ...

यूँ ही ...

ज़िन्दगी भर कुछ साए साथ साथ ही चलते है
और उन्ही सायो की याद में ये ख़ाक ज़िन्दगी;
.......कभी कभी गुलज़ार भी होती है !!!

सोचता हूँ अक्सर यूँ ही रातो को उठकर ...
अगर अम्मा न होती ,
अगर पिताजी न होते .
अगर तुम न होती ..
अगर वो दोस्त न होता ...
...चंद तकलीफ देने वाले रिश्तेदार न होते ...
...चंद प्यार करने वाले दुनियादार न होते ..

तो फिर जीना ही क्या होता !
यूँ ही ज़िन्दगी के पागलपन में लिखे गए अलफ़ाज़ भी न होते !

copyright © विजय कुमार

एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...