बहुत दिन बीते ... खुदा ने सोचा कि,
कुछ खुशियाँ इकठ्ठी की जाएँ ;
और दुनिया के बन्दों को बांटा जाएँ ....
खुदा को तलाश थी उन बन्दों की ,
जो थक चुके थे अपने जीवन से
और सोचते थे कि;
खुदा ने ढूँढा तो पाया ,
कि, हर बन्दा कुछ यूँ ही था ..
वो बड़ा परेशान हुआ ..
उसकी दुनिया शायद जीने लायक नहीं थी ..
खराब हो चुकी थी ..
उसने एक शहर बनाया
और उसमे बहती एक नदी बनायीं ..
उस नदी के चारो ओर
ऊंचे ऊंचे संगमरमर के पर्वत बनाये ...
और चांदनी रातो में ;
और वहां एक सपना भी बनाया ....
प्रेम से भरा हुआ ..
जीवन से आनंदित ...
और खुशियों से मुदित ....!!!
खुदा को इन्तजार था अपने उन बन्दों का;
जिन्होंने जीवन को सब कुछ दिया था
पर जीवन ने उन्हें कुछ नहीं दिया था ..
खुदा को इन्तजार करना पड़ा ..
बहुत लम्बा ...
बहुत ज्यादा देर तक ..
दिन पर दिन बीतते गए..
बरसों को पंख लग गए थे ...
यूँ ही कई जनम बीत गए थे...
खुदा थकने लग गया था ..
वो अब बुढा हो चूका था ..
फिर एक करिश्मा हुआ
खुदा भी हैरान था ..
किसी खुदाई ने उस पर भी रहम किया था ...
उसके बनाये दो बन्दे ...
जो कई जनम दूर थे एक दूजे से
उसी शहर में मिलने आ रहे थे...
दोनों कुछ इस तरह जी रहे थे ;
कि ज़िन्दगी ने भी सोचा ..
अल्लाह इन पर रहम करें..
क्योंकि वो रात दिन ..
नकली हंसी हंसते थे और नकली जीवन जीते थे..
ज़िन्दगी ने सोचा ,
एक बार कुछ असली रंग भर दे..
और ..बस किसी सपने की कशिश में बंधकर दोनों
उसी शहर में पहुंचे ....
जहाँ खुदा ने वो सपना सजाया था
बस एक बार वो मिले ,
फिर उन दोनों को हाथ थामकर खुदा
उन्हें उस नदी के किनारे ले गया ..
और अपने बनाये हुए सपने में ,
सपना ...बस इतना हसीन था कि
दोनों की नींद ख़तम नहीं होती थी ..
दोनों ने सपने में दुनिया जहान को देख लिया ...
सब कुछ किसी पिछलें जनम की बात सी थी ..
दोनों कहीं से भी अजनबी नहीं थे ..
बस यूँ लग रहा था कि एक दूजे के लिए ही थे..
सपना बस पंख लगाकर उढ़ गया...
जब नींद खुली तो ;
लेकिन उस सपने की खुशबू अब तक महक रही थी ..
मैं तो अब भी वही हूँ ;
तेरे साथ...वही चाँद , वही नदी और वही रात ......
जानाँ , क्या तुम उस सपने को भूल सकी हो .....!!!