Thursday, September 10, 2009

प्रेम कथा


बहुत समय पहले की बात है
जब देवताओ ने सोचा की
एक प्रेम कथा बनाई जाए ;
उन्होंने तुम्हे बनाया ,
उन्होंने मुझे बनाया ,
और एक जन्म बनाया ;

पर शायद कुछ भूल हो गई ....
कुछ समय का रथ आगे निकल गया,
इस जन्म के लिए एक जन्म बीत गया !!!

जाने -अनजाने में जब हम बने तो
तुम किसी और की हो चुकी थी
मैं किसी और हो चुका था
तुम्हारा जीवन बन रहा था
किसी और के संग फेरे लेते हुए
मेरा जीवन बन रहा था
किसी और के संग मन्त्र पढ़ते हुए....

देवताओ ने हमें बनाया
और जुदा कर दिया
शायद देवता पत्थर के होतें है
शायद देवताओ को एक नए दर्द को जन्म देना था
शायद तुम्हारे मन से
शायद मेरे मन से
पता नही ,
पर देवताओ की बातें देवता ही जाने
हम बने ..
प्यार का जन्म हुआ...
पर हमारे बन्धनों ने उस जन्म को पहली साँस में ही
मृत्यु का आलिंगन दे दिया
और मैं अपनी बात कह न सका ...

समय बीता और जीवन बीता
हमारे बंधन पिघलने लगे
शायद नए बन्धनों के जन्म के लिए
या फिर एक मृत्यु के लिए
हमारी मृत्यु के लिए !

मैंने अब तुमसे अपनी बात की है
देवता शायद इसी दिन का इन्तजार कर रहे थे
वो बड़ी अनोखी रात थी
सारी दुनिया सोयी हुई थी

अचानक चाँद को बादलों ने
अपनी आगोश में ले लिया था
जुगुनू किसी विस्फोट के अंदेशे में कहीं छुप गए थे
आकाश को चूमते हुए पर्वत सिकुड़ गए थे
झींगूरो की कर्कश आवाज शांत थी

सब तरफ़ अजीब सी शान्ति थी
शायद मृत्यु की शान्ति थी
लगता था सब मर चुके है
चाँद ,तारे, पेड़ ,पर्वत और
सारे इंसान
हाँ !
सिर्फ़ हम जिंदा थे
तुम और मैं ......

हम दोनों जल रहे थे
जब कांपती हुई आवाज में ,
तुम्हारा हाथ; मैंने अपने धड़कते हुए दिल पर रखकर
तुमसे , मैंने अपनी बात कही
वो अनजानी सी पुरानी बात कही
उस बात को कहने में
सच कितना समय बीत गया था
यूँ लग रहा था की कई जन्म बीत गए थे
मैंने जब तुमसे वो बात कही
तो शायद समय रुक गया था
हवा ठहर गई थी
हमारी साँसे भी ठहर गई थी
मैंने तुमको तुमसे माँगा
इस जन्म के लिए
तुमने देवताओं को देखा
उन्हें देखकर आंसू बहाए
और प्रार्थना की
कि ;
समय को पीछे ले जाया जाएँ
पर देवता तो पत्थर के बने होतें है

उन्होंने मना कर दिया
न ही उन्होंने हमें ज़िन्दगी दी और न ही दी , हमें एक मौत
जो सब कुछ शांत कर दे
उन्होंने दिए हमें अपने अपने बंधन
जिनके साथ हमने जीना है
इस जन्म के लिए..... उस मृत्यु के लिए

उस मृत्यु के लिए ,जो हमें जुदा कर दे एक जन्म के लिए
जब हम एक हो
जो हमें मिला दे हमेशा के लिए
हम हार गए ..इस जन्म के लिए
और शायद जीत गए ,अगले जन्म के लिए
शायद ..पता नही ;

जन्म और मृत्यु को किसने समझा है
देवताओ कि बातें देवता ही जाने
हम तो इंसान है
मन कि बातें मन के शहर कि गलियों में भटकने दो
यही शायद वक्त का फ़ैसला है
पता नही ...पर शायद ,
प्रेमकथा
इसे ही कहते है
शायद देवता भी यही चाहते है .......

Friday, August 7, 2009

झील


आज शाम सोचा ;

कि ,
तुम्हे एक झील दिखा लाऊं ...
पता नही तुमने उसे देखा है कि नही;
देवताओं ने उसे एक नाम दिया है….

उसे जिंदगी की झील कहते है...

बुजुर्ग ,अक्सर आलाव के पास बैठकर,
सर्द रातों में बतातें है कि,
वह दुनिया कि सबसे गहरी झील है
उसमे जो डूबा , फिर वह उभर कर नही आ पाया ...

उसे जिंदगी की झील कहते है...

आज शाम , जब मैं तुम्हे ,अपने संग ,
उस झील के पास लेकर गया ,
तो तुम काँप रही थी ,
डर रही थी ;
सहम कर सिसक रही थी..
क्योंकि ; तुम्हे डर था;
कहीं मैं तुम्हे उस झील में डुबो न दूँ ....

पर ऐसा नही हुआ ..
मैंने तुम्हे उस झील में ;

चाँद सितारों को दिखाया ;
मोहब्बत करने वालों को दिखाया;
उनकी पाक मोहब्बत को दिखाया ;

तुमने बहुत देर तक, उस झील में ,

अपना प्रतिबिम्ब तलाशती रही ,
तुम ढूंढ रही थी॥

कि शायद मैं भी दिखूं तुम्हारे संग,
पर ईश्वर ने मुझे छला…
मैं क्या, मेरी परछाई भी ,

झील में नही थी तुम्हारे संग !!!

तुम रोने लगी ....
तुम्हारे आंसू ,
बूँद बूँद खून बनकर झील में गिरते गए ,
फिर झील का गन्दा और जहरीला पानी साफ होते गया,
क्योंकि अक्सर जिंदगी की झीलें ,
गन्दी और जहरीली होती है ....

फिर, तुमने मुझे आँखे भर कर देखा...
मुझे अपनी बांहों में समेटा ...
मेरे माथे को चूमा..
और झील में छलांग लगा दी ...
तुम उसमें डूबकर मर गयी ....

और मैं...
मैं जिंदा रह गया ,
तुम्हारी यादों के अवशेष लेकर,
तुम्हारे न मिले शव की राख ;
अपने मन पर मलकर मैं जिंदा रह गया ...

मैं युगों तक जीवित
रहूंगा और तुम्हे आश्चर्य होंगा पर ,
मैं तुम्हे अब भी ;
अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
और हमेशा देखते रहूंगा..

युग से अनंत तक ....
अनंत से आदि तक ....
आदि से अंत तक....
देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...


Wednesday, August 5, 2009

आओ इश्क की बातें कर ले…


दोस्तों , मेरी एक पुरानी कविता पेश है आपकी महफिल में , जो आज मुझे बहुत HAUNT कर रही है ...



आओ इश्क की बातें कर ले…


आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

लबो पर कोई लफ्ज़ न रह जाए, खामोशी जहाँ खामोश हो जाए ;
सारे तूफ़ान जहाँ थम जाये , जहाँ समंदर आकाश बन जाए......!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

तुम अपनी आंखो में मुझे समां लेना , मैं अपनी साँसों में तुम्हे भर लूँ ,
ऐसी बस्ती में चले चलो , जहाँ हमारे दरमियाँ कोई वजूद न रह जाए !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

कोई क्या दीवारे बनायेंगा , हमने अपनी दुनिया बसा ली है ,
जहाँ हम और खुदा हो, उसे हमने मोहब्बत का आशियाँ नाम दिया है.!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

मैं दरवेश हूँ तेरी जन्नत का ,रिश्तो की क्या कोई बातें करे.
किसी ने हमारा रिश्ता पूछा ,मैंने दुनिया के रंगों से तेरी मांग भर दी !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

Saturday, August 1, 2009

सपना

आदरणीय समीर लाल जी . This poem is dedicated to you. इस नज़्म का backdrop जबलपुर शहर है ,जहाँ मैं कुछ महीनो पहले गया था. वहां Bhedaghat में बहती नर्मदा नदी और marble rocks ने मुझे ये नज़्म लिखने की प्रेरणा दी. मैं ये नज़्म सारे जबलपुर वासियों और वहां के कवि तथा अन्य रचनाकारों को समर्पित करता हूँ ...


सपना

बहुत दिन बीते ... खुदा ने सोचा कि,
कुछ खुशियाँ इकठ्ठी की जाएँ ;
और दुनिया के बन्दों को बांटा जाएँ ....

खुदा को तलाश थी उन बन्दों की ,
जो थक चुके थे अपने जीवन से
और सोचते थे कि;
ये जीवन अब यूँ ही बीतेंगा ...

खुदा ने ढूँढा तो पाया ,
कि, हर बन्दा कुछ यूँ ही था ..
वो बड़ा परेशान हुआ ..
उसकी दुनिया शायद जीने लायक नहीं थी ..
खराब हो चुकी थी ..

उसने एक शहर बनाया
और उसमे बहती एक नदी बनायीं ..
उस नदी के चारो ओर
ऊंचे ऊंचे संगमरमर के पर्वत बनाये ...
और चांदनी रातो में ;
बिखरती प्यार की रौशनी बनायी !!
और वहां एक सपना भी बनाया ....
प्रेम से भरा हुआ ..
जीवन से आनंदित ...
और खुशियों से मुदित ....!!!

खुदा को इन्तजार था अपने उन बन्दों का;
जिन्होंने जीवन को सब कुछ दिया था
पर जीवन ने उन्हें कुछ नहीं दिया था ..

खुदा को इन्तजार करना पड़ा ..
बहुत लम्बा ...
बहुत ज्यादा देर तक ..
दिन पर दिन बीतते गए..
बरसों को पंख लग गए थे ...
यूँ ही कई जनम बीत गए थे...
खुदा थकने लग गया था ..
वो अब बुढा हो चूका था ..

फिर एक करिश्मा हुआ
खुदा भी हैरान था ..
किसी खुदाई ने उस पर भी रहम किया था ...
उसके बनाये दो बन्दे ...
जो कई जनम दूर थे एक दूजे से
उसी शहर में मिलने आ रहे थे...

दोनों कुछ इस तरह जी रहे थे ;
अपने अपने देश में ....
कि ज़िन्दगी ने भी सोचा ..
अल्लाह इन पर रहम करें..
क्योंकि वो रात दिन ..
नकली हंसी हंसते थे और नकली जीवन जीते थे..
ज़िन्दगी ने सोचा ,
एक बार कुछ असली रंग भर दे..
इनके जीवन में...!!!

और ..बस किसी सपने की कशिश में बंधकर दोनों
उसी शहर में पहुंचे ....
जहाँ खुदा ने वो सपना सजाया था
बस एक बार वो मिले ,
फिर उन दोनों को हाथ थामकर खुदा
उन्हें उस नदी के किनारे ले गया ..
और अपने बनाये हुए सपने में ,
उन्हें जीने का एक मौका दिया .......

सपना ...बस इतना हसीन था कि
दोनों की नींद ख़तम नहीं होती थी ..
दोनों ने सपने में दुनिया जहान को देख लिया ...

सब कुछ किसी पिछलें जनम की बात सी थी ..
दोनों कहीं से भी अजनबी नहीं थे ..
बस यूँ लग रहा था कि एक दूजे के लिए ही थे..
सपना बस पंख लगाकर उढ़ गया...

जब नींद खुली तो ;
देखा दोनों अपनी दुनिया में वापस जा चुके थे
लेकिन उस सपने की खुशबू अब तक महक रही थी ..

मैं तो अब भी वही हूँ ;
तेरे साथ...वही चाँद , वही नदी और वही रात ......
जानाँ , क्या तुम उस सपने को भूल सकी हो .....!!!

Wednesday, July 22, 2009

तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना ...

तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना ...


एक सपने में कोई आधी -अधूरी आस जगी
कहीं किसी खेत में सरसों की उवास चली
मेरे साँसों में तेरी सांस कैसे मिली ....
तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना .....

ज़िन्दगी की राह बदल गयी....
आसमान से एक बादल का टुकडा टुटा
तेरे नाम से उसने मेरा पता पुछा ..
तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना ...

मेरे तन से तेरी खुशबू कैसे छूटी.......
मिटटी की गंध ने तेरे घर का पता दिया
मेघो ने तेरे आंसुओ पर मेरा नाम लिखा ..
तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना ...

मेरे लबो पर तेरे होंठो की ये मुहर कैसी ..
सूरज की किरणों ने एक जाल बुना
चाँद ने उस पर सितारों की चादर बिछाई ..
तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना ...

मेरे साये की तस्वीर में तेरा रंग ये कैसा...
कि , एक बैचेनी सी आँखों में है छायी ..
कि , मन ने कहा , तू बहुत उदास है ..
कि , तुमने मुझे पुकारा तो नहीं जांना .....
क्योंकि ; मैंने भी तुझे याद किया है….

हाँ , मैंने भी तुम्हे बहुत याद किया है !!!

Wednesday, July 8, 2009

मन की खिड़की /// The window of my heart


वो एक अजीब सी रात थी ,
जो मेरे जीवन की आखरी रात भी थी !

ज़िन्दगी की बैचेनियों से ;
घबराकर ....और डरकर ...
मैंने मन की खिड़की से;
बाहर झाँका .........

बाहर ज़िन्दगी की बारिश जोरो से हो रही थी ..
वक़्त के तुफानो के साथ साथ किस्मत की आंधी भी थी.

सूखे हुए आँखों से देखा तो ;
दुनिया के किसी अँधेरे कोने में ,
चुपचाप बैठी हुई तुम थी !!!

घुटनों में अपना चेहरा छुपाये,
कांपती हुई ,और भीगती हुई .....
और;
मेरे नाम को अपने आँसूओँ मेँ जलाती हुई ......

मुझे देखकर कहा ;
सुनो .......
मैं बरसो से भीग रही हूँ ..
मैं तुम्हारे मन के भीतर आ जाऊं ?

मैंने मुड़कर मन की खिड़की से ;
झाँककर अपने भीतर देखा ...
मेरे मन की दुनिया ,
अपनी आखरी साँसे गिन रही थी ..
ज़िन्दगी बेजार सी थी
और वीरान थी ..
सब कुछ ख़तम सा हो गया था…..
मेरी सारी खुशियों को
ज़िन्दगी के अँधेरे निगल गए थे......

मेरी किस्मत को तेरा प्यार मंज़ूर नहीं था ,
मेरे खुदा को तेरा साथ का इकरार नहीं था ,
मैं हार चूका था ;
समय से !
ज़िन्दगी से !!
और खुदा से ...!!!

मैंने बड़े प्यार से ;
अपनी भीगी आँखों से तुम्हे देखा ;
बड़े हौले से तेरा नाम लिया ;
एक आखरी सांस ली ;
और
फिर मर गया ..................


The Window of my heart

It was a very strange night,
so strange and ruthless;
That I couldn’t recognize,
It as last night of my life....

such restless was my life ;
By traveling a long journey ,
That it made me Frightened and scared
Of the world around me;

On that night I looked out of
The window of my heart... .........

The rains of Life were very harsh;
There were the tornados of time ;
With unseen storms of fate ;
Making deafening sounds around me ….

My Dry eyes saw you at a distance…
You were so close to my heart and
Yet so far from my reach...
In a dark corner of the cruel world
you were sitting quietly!!!

Your face was hidden
In your knees;
you were trembling and
Getting drenched;
In the harsh rains of life.....
And;
You were burning my name in your tears ......

than suddenly;
You looked at me in a trance of happiness
You were pleading me...
Listen o’ my love
May I come inside your heart...?
I don’t want to stay here in this world…
Please let me come, inside you…

I turned away my face from you
And looked inside the window of my heart;
The world of my heart,
Was breathing its last few breaths ..
My life was destroyed and deserted…
everything had come to an end.....
All my happiness was gone...
the Darkness of death were swallowing my life ......

My destiny was not ready to accept your love
My God did not agree to unite me with you
I lost you to Time, Life and God;

With misty eyes,

I saw you o’ my great love ....
slowly I whispered your name ….
I Took one last breath;
and than I died..................


Tuesday, July 7, 2009

जोगन



गुरु पूर्णिमा के शुभअवसर पर अपने सारे गुरुजनों और मित्रो को प्रणाम करते हुए अपनी ये कविता समर्पित करता हूँ ...मैं ये आशा करता हूँ की आप सबका प्यार यूँ ही मुझ पर बना रहेंगा . ये गीत महान संत " मीराबाई " पर है , मैं इसकी composition में उनके द्वारा रचित कुछ पदों का भी सहारा लिया है. मुझे कृष्ण और राधा और मीरा पर काफी दिनों से कुछ लिखने की इच्छा थी , सो आज पूरी हुई .. हमेशा की तरह आपके प्यार और आर्शीवाद की राह में ....


जोगन


मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !
तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !!
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे
सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे
तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

मेरे नैनो में बस तेरी ही तो एक मूरत है
सावंरा रंग लिए तेरी ही मोहनी सूरत है
तू ही तो एक युगपुरुष रे ,हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

बावरी बन फिरू , मैं जग भर रे कृष्णा
गिरधर नागर कहकर पुकारूँ तुझे कृष्णा
कैसा जादू है तुने डाला रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ;हे घनश्याम मेरे !

प्रेम पथ ,ऐसा कठिन बनाया ; मेरे सजना
पग पग जीवन दुखो से भरा ; मेरे सजना
कैसे मैं तुझसे मिल पाऊं रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

Monday, June 29, 2009

क्षमा

मान्यवर मित्रो ....

मैं कुछ दिनों के लिए लेखन से विराम ले रहा हूँ .... मन कुछ ठीक नहीं है ....

यदि किसी कारणवश मुझसे कोई गलती हो गयी हो ,या मेरे कारण किसी को दुःख पहुंचा हो या ,मेरी कोई बात से कोई आहत हुआ हो तो मैं क्षमा मांगता हूँ ..

क्षमापना सारी गलतियों व अपराधों को धोने का अमोघ उपाय है. मनुष्य की श्रेष्टथा इसी में है कि वह अपनी भूलो को स्वीकार करे. जो अपराध को स्वीकार नही करता वह अपराध से कभी मुक्त भी नही हो पाता . जीवन पथ इतना लंबा और अटपटा है कि उसे यदि क्षमापना से बार बार बुहारा न जाए तो वह कुडादान बन जायेगा. दुनिया में सारे धर्मग्रंथो और उपदेशों का सार है कि क्षमा को छोड़कर हम कितना भी चले कहीं भी नही पहुँच पाएंगे. याथार्थ तो यही है कि आत्म उत्कर्ष के किसी भी शिखर पर कोई कभी पहुँचेंगा तो वह क्षमा के साथ ही पहुँचेंगा .

मैं क्षमा द्वार से प्रवेश कर ,मनो मालिन्य ,राग, द्वेष और अहंकार से मुक्त होना चाहता हूँ ..

क्षमा प्राथी

विजय

Saturday, June 27, 2009

मैं तुमसे प्यार करता हूँ ......


अक्सर मैं सोचता हूँ कि,

मैं तुम्हारे संग बर्फीली वादियों में खो जाऊँ !
और तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हे देखूं ...
तुम्हारी मुस्कराहट ;
जो मेरे लिए होती है , बहुत सुख देती है मुझे.....
उस मुस्कराहट पर थोडी सी बर्फ लगा दूं .

यूँ ही तुम्हारे संग देवदार के लम्बे और घने सायो में
तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलूँ......
और उनके सायो से छन कर आती हुई धुप से
तुम्हारे चेहरे पर आती किरणों को ,
अपने चेहरे से रोक लूं.....

यूँ ही किसी चांदनी रात में
समंदर के किनारे बैठ कर
तुम्हे देखते हुए ;
आती जाती लहरों से तेरा नाम पूछूँ ..

यूँ ही ,किसी घने जंगल के रास्तो पर
टेड़े मेडे राहो पर पढ़े सूखे पत्तो पर चलते हुए
तुम्हे प्यार से देखूं ..

और ; तुम्हारा हाथ पकड़ कर आसमान की ओर देखूं
और उस खुदा का शुक्रिया अदा करूँ .
और कहूँ कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ....

Monday, June 15, 2009

आओ सजन

दोस्तों , मेरी नयी नज़्म " आओ सजन " आपके खिदमत में पेश है ....उम्मीद है की हमेशा की तरह आप सबका प्यार और आर्शीवाद इस कविता को मिलेंगा . ये नज़्म एक सूफियाना भक्ति गीत है . इस कविता का जन्म एक गुरूद्वारे में हुआ था ..मैं एक कीर्तन सुन रहा था ..उसमे ये शब्द थे " आओ सजन " . ये शब्द मन में बस गए और मुझे बहुत दिनों तक मुझे haunt करते रहे . और आज इसे आप सबको नज़र कर रहा हूँ .. दोस्तों ; मैं ये नज़्म ; आदरणीय प्राण शर्मा जी , आदरणीय महावीर जी , आदरणीय तेजेंद्र जी और मेरे मित्र मुफलिस जी और सुशील छोक्कर जी को समर्पित कर रहा हूँ ...ये सारे गुरु -उस्ताद और मेरे प्रिय मित्र है और देखा जाए तो उस्ताद और मित्र भी मेरे लिए सजन ही है.... दोस्तों ,जब मैंने इस नज़्म को complete किया तो एक रुहानी positive energetic aroma मेरे आस पास था .मुझे उम्मीद है की आप के साथ भी कुछ ऐसा experience हो ..... I am sure that this poem will take you to an inner journey of soul...........MAY GOD BLESS YOU ALL. आपके प्रेम के लिए ,आप सब का आभार !!!


आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !
तेरे दर्शन को तरसे है ; मेरे भीगे नयन !
घर , दर सहित सजाया है ; अपने मन का आँगन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

तू नहीं तो जग , क्यों सूना सूना सा लगता है !
तू नहीं तो हर कोई , पराया सा नज़र आता है !
इतनी बड़ी दुनिया में कौन है यहाँ मेरा ; तेरे बिन !
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

बहुत घूम चूका मैं ; मंदिर ,मस्जिद और गुरुद्वारे !
किसी अपने को न मिल पाया ; मैं किसी भी द्वारे...!
कहीं भी तू न मिला , भटके है हर जगह मेरा मन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

जीवन में छाये है उदासी के साये बहुत गहरे !
सबने छला है मुझको तेरे नाम से ; प्रभु मेरे !
अब तो तेरे मेहर की बरसात हो मेरे सूने आँगन !!
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

बुल्ले शाह ने कहा था ' रमज सजन दी होर '
आज समझा हूँ कि , क्यों खींचे तू मुझे अपनी ओर !
तू ही मेरा सजन ,बस तू ही मेरा सजन !
आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!!

एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...