Sunday, September 5, 2010

स्त्री – एक अपरिचिता


 

 

दोस्तों , आज मैंने एक तमिल कवियित्री  सलमा की कविता पढ़ी ..मुझे बहुत पहले पढ़ी हुई एक किताब याद गयी . The second sex by Simone De Beauvoir.... फिर मैंने आज ये कविता लिखी . स्त्रीयों को underdeveloped और developing  देशो में जिस तरह की ज़िन्दगी हासिल होती है ..वो ज्यादातर सिर्फ उनके शरीर पर ही केंद्रित होता है .. मैंने इस कविता को लिखते समय इसी पक्ष को रखने कि कोशिश की है .... बस ,हमेशा की तरह आपका आशीर्वाद चाहिए .....

 



स्त्री – एक अपरिचिता





मैं हर रात ;
तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ
कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ;
मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा
और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ”

कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही
मैं जन्मो से ,तुम्हारे लिए सिर्फ शरीर ही बनी रही ..
ताकि , मैं तुम्हारे घर के काम कर सकू ..
ताकि , मैं तुम्हारे बच्चो को जन्म दे सकू ,
ताकि , मैं तुम्हारे लिये तुम्हारे घर को संभाल सकू .

तुम्हारा घर जो कभी मेरा घर बन सका ,
और तुम्हारा कमरा भी ;
जो सिर्फ तुम्हारे सम्भोग की अनुभूति के लिए रह गया है
जिसमे , सिर्फ मेरा शरीर ही शामिल होता है ..
मैं नहीं ..
क्योंकि ;
सिर्फ तन को ही जाना है तुमने ;
आज तक मेरे मन को नहीं जाना .

एक स्त्री का मन , क्या होता है ,
तुम जान सके ..
शरीर की अनुभूतियो से आगे बढ़ सके

मन में होती है एक स्त्री..
जो कभी कभी तुम्हारी माँ भी बनती है ,
जब वो तुम्हारी रोगी काया की देखभाल करती है  ..
जो कभी कभी तुम्हारी बहन भी बनती है ,
जब वो तुम्हारे कपडे और बर्तन धोती है
जो कभी कभी तुम्हारी बेटी भी बनती है ,
जब वो तुम्हे प्रेम से खाना परोसती है
और तुम्हारी प्रेमिका भी तो बनती है ,
जब तुम्हारे बारे में वो बिना किसी स्वार्थ के सोचती है ..
और वो सबसे प्यारा सा संबन्ध ,
हमारी मित्रता का , वो तो तुम भूल ही गए ..

तुम याद रख सके तो सिर्फ एक पत्नी का रूप
और वो भी सिर्फ शरीर के द्वारा ही ...
क्योंकि तुम्हारा सम्भोग तन के आगे
किसी और रूप को जान ही नहीं पाता  है ..
और  अक्सर चाहते हुए भी मैं तुम्हे
अपना शरीर एक पत्नी के रूप में समर्पित करती हूँ ..
लेकिन तुम सिर्फ भोगने के सुख को ढूंढते हो ,
और मुझसे एक दासी के रूप में समर्पण चाहते हो ..
और तब ही मेरे शरीर का वो पत्नी रूप भी मर जाता है .

जीवन की अंतिम गलियों में जब तुम मेरे साथ रहोंगे ,
तब भी मैं अपने भीतर की स्त्री के
सारे रूपों को तुम्हे समर्पित करुँगी
तब तुम्हे उन सारे रूपों की ज्यादा जरुरत होंगी ,
क्योंकि तुम मेरे तन को भोगने में असमर्थ होंगे
क्योंकि तुम तब तक मेरे सारे रूपों को
अपनी इच्छाओ की अग्नि में स्वाहा करके
मुझे सिर्फ एक दासी का ही रूप बना चुके होंगे ,

लेकिन तुम तब भी मेरे साथ सम्भोग करोंगे ,
मेरी इच्छाओ के साथ..
मेरी आस्थाओं के साथ..
मेरे सपनो के साथ..
मेरे जीवन की अंतिम साँसों के साथ

मैं एक स्त्री ही बनकर जी सकी
और स्त्री ही बनकर मर जाउंगी
एक स्त्री ....
जो तुम्हारे लिए अपरिचित रही
जो तुम्हारे लिए उपेछित रही
जो तुम्हारे लिए अबला रही ...

पर हाँ , तुम मुझे भले कभी जान न सके
फिर भी ..मैं तुम्हारी ही रही ....
एक स्त्री जो हूँ.....







Saturday, August 21, 2010

लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!





दोस्तों , इस बार एक नया प्रयोग किया है ,एक शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत लिखा है ,थोड़ी सी तकलीफ हुई इस नयी बोली को लिखने में , लेकिन मन को अच्छा लग रहा था तो , लिखकर ही दम लिया ..एक दोस्त से मन ही मन में वादा किया था , इस गीत को उसे उपहार के रूप में देने का .. और अब हमेशा की तरह आपकी नज़र इसे कर रहा हूँ . मुझे पूरा विश्वास है की आपको मेरा ये नया प्रयोग जरुर पसंद आयेंगा. एक छोटी सी गुजारिश  आप  सबसे है  ... इसे सुनते  हुए  आप  VISUALISE करे  की BACKGROUND में FUSION MUSIC बज  रहा है [ INSTRUMENTAL COMBINATION OF TABLA, FLUTE , JAZZ DRUMS, KEYBOARD, SAXOPHONE AND ELECTRIC GUITAR WITH LOWTONE BACKUP VOCALS  ] [ और  ये  भी  VISUALISE कीजिये  की इसे  गाने  वाले  महान   गायक  है  ..या तो शुभा मुदगल या परवीन सुल्ताना या बॉम्बे जयश्री या किशोरी अमोनकर या वीणा सहस्त्रबुद्धे या जो कोई भी आपके मनपसंद CLASSICAL VOCALIST है ] अब इसे पढ़िये और आनंद लीजिये विरह की अग्नि का बारीश  की बूंदों  के साथ .  अब मैं हमेशा की तरह आप सभी के प्यार और आशीर्वाद का इच्छुक हूँ. धन्यवाद.



लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!




घिर  आई फिर से ... कारी कारी बदरिया
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!
नैनन को मेरे , तुमरी  छवि हर पल नज़र आये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

सा  नि ध पा , मा गा रे सा ........

बावरा मन ये उड़ उड़ जाये जाने कौन देश रे
गीत सावन के ये गाये तोहे लेकर मन में
रिमझिम गिरती फुहारे बस आग लगाये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

सा  नि ध पा , मा गा रे सा ........

सांझ ये गहरी , साँसों को मोरी ; रंगाये ,
तेरे दरश को तरसे है ; ये आँगन मोरा
हर कोई सजन ,अपने घर लौट कर आये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

सा  नि ध पा , मा गा रे सा ........

बिंदिया, पायल, आँचल, कंगन चूड़ी  पहनू सजना 
करके सोलह श्रृंगार तोरी राह देखे ये सजनी
तोसे लगन लगा कर , रोग  दिल को लगाये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

सा  नि ध पा , मा गा रे सा ........
बरस रही है आँखे मोरी ; संग बादलवा..
पिया तू नहीं जाने मुझ बावरी का  दुःख रे
अब के बरस ये राते ; नित नया जलाये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

सा  नि ध पा , मा गा रे सा ........
 
आँगन खड़ी जाने कब से ; कि तोसे संग जाऊं
चुनरिया मोरी भीग जाये ; आँखों के सावन से 
ओह रे पिया , काहे ये जुल्म मुझ पर तू ढाये
तेरी याद सताये  , मोरा जिया जलाये !!
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!

घिर  आई फिर से ... कारी कारी बदरिया
लेकिन तुम घर नहीं आये ....मोरे सजनवा !!!




Tuesday, August 17, 2010

कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ कि तुम मेरे हो ....

तुम.....
किसी दुसरी ज़िन्दगी का एहसास हो ..
कुछ पराये सपनो की खुशबु हो ..
कोई पुरानी फरियाद हो ..
किस से कहूँ की तुम मेरे  हो ..
कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ .....

तुम...
किसी किताब में रखा कोई सूखा फूल हो
किसी गीत में रुका हुआ कोई अंतरा हो
किसी सड़क पर ठहरा हुआ कोई मोड़ हो
किस से कहूँ की तुम मेरे  हो ..
कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ .....

तुम...
किसी अजनबी रिश्ते की आंच हो
किसी अनजानी धड़कन का नाम हो
किसी नदी में ठहरी हुई धारा हो
किस से कहूँ की तुम मेरे  हो ..
कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ .....

तुम...
किसी आंसू में रुखी हुई सिसकी हो
किसी खामोशी के जज्बात हो
किसी मोड़ पर छूटा हुआ हाथ हो
किस से कहूँ की तुम मेरे  हो ..
कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ .....

तुम...  हां,  तुम ........
हां , मेरे अपने सपनो में तुम हो
हां,  मेरी आखरी फरियाद तुम हो
हां, मेरी अपनी ज़िन्दगी का एहसास हो ...
कोई तुम्हे कैसे भूल जाएँ कि तुम मेरे  हो ....
 
हां,  तुम मेरे  हो ....
हां,  तुम मेरे  हो ....
हां,  तुम मेरे  हो ....

Tuesday, August 3, 2010

सर्द रातें



सर्द रातें

इन सर्द रातों में ,तुझे कुछ याद हो न हो .....
मुझे तो सारी बातें याद है.......
अब तक ,  
जो तेरे - मेरे साथ गुजरी , और जो नही गुजरी ...
वो सब कुछ याद है ...

ऐसी ही एक सर्द रात थी , जब हम कहीं मिले
और एक मुलाकात से दुसरे मुलाकात की बात बनी ..

ऐसी ही एक सर्द रात में तेरे आंसुओ ने मुझे भिगोया था ..
और सारी रात हमने कोई पुरानी सी ग़ज़ल सुनी थी ..

ऐसी ही एक सर्द रात में हमने रात भर आलाव तापा था ,
और ज़िन्दगी की राख की आग को अपने जिस्मो पर सहा था......

ऐसी ही एक सर्द रात में हमने वो पुरानी कसमे खायी थी ..
जिनमे मिलने और मिलकर साथ रहने की बातें होती है ..

ऐसी ही एक सर्द रात में ;
तुमने मेरा हाथ एक अँधेरी सड़क के सूने मोड़ पर छोडा था ..
और मैं तन्हाई का तमाशबीन बन कर रह गया था ..

और उस सर्द रात से , आज तक ;
मुझे हर रात , सर्द रात नज़र आती है ..
मैं तुम्हे याद करता हूँ और ;
अपने आंसुओं से ओस की बूंदे बनाता हूँ...

खुदा जाने , तुम्हे अब ये रातें सर्द लगती है या नही ..
खुदा जाने , तुम्हे अब मेरी याद आती है या नही....
खुदा जाने , अब किसी सर्द रात को हम दोबारा मिलेंगे या नही ...

आज की रात बहुत सर्द है ..
मालूम होता है ,
तेरी यादो के साथ मेरी जान लेकर जाएँगी...
तब शायद,  
किसी सर्द रात को ,  
तुम्हे मेरी याद आयें......


एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...