उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;
जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !
उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;
जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !
उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;
जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !
मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;
पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !
पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है
तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !
तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!
© नज़्म : विजय