Saturday, January 7, 2017

रे मन




रूह की मृगतृष्णा में
सन्यासी सा महकता है मन

देह की आतुरता में
बिना वजह भटकता है मन

प्रेम के दो सोपानों में
युग के सांस लेता है मन

जीवन के इन असाध्य
ध्वनियों पर सुर साधता है मन

रे मन
बावला हुआ जीवन रे
मृत्यु की छाँव में बस जा रे
प्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रे
आजा मन रे मन  !


विजय 

8 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "न्यूनतम निवेश पर मजबूत और सुनिश्चित लाभ - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  2. मन के कितने रूप ... कितने बदलाव

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  4. Participate in blogging contest at http://www.funkaar.in/contest.html.....Winning entries will win Amazon Vouchers....Contest ending soon....

    ReplyDelete
  5. very informative post for me as I am always looking for new content that can help me and my knowledge grow better.

    ReplyDelete
  6. Hey keep posting such good and meaningful articles.

    ReplyDelete