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Saturday, September 2, 2017

“ क्षितिज ”



मिलना मुझे तुम उस क्षितिज पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिज है कहाँ प्रिय ।
© विजय


Monday, January 2, 2017

सोचता हूँ...................



सोचता हूँ
कि
कविता  में शब्दों
की जगह
तुम्हें भर दूँ ;

अपने मन की भावों के संग

फिर मैं हो जाऊँगा
पूर्ण

विजय


Thursday, October 15, 2015

एक नज़्म खुदा के लिए.........


उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा
तुमने उस हाथ को दफना दिया
अपनी जिस्म की जमीन में !
और कुछ आंसू जो मेरे नाम के थे ,
उन्हें भी दफना दिया अपनी आत्मा के साथ !

अब तुम हो
और मैं हूँ
और हम बहुत दूर है !
हां; इश्क खुदा के आगोश में चुपचाप बैठा है!

खुदा ने एक कब्र बनायीं है ,
तुम्हारी और मेरी ,
उसने उसमे कुछ फूल और आहो के साथ मेरी प्रार्थनाओ को भी दफ़न किया है !

हां ;
कुछ लोग अब भी मेरी नज्मे पढ़ते है और मोहब्बत की बाते करते है !

© विजय

Thursday, September 24, 2015

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

/// नज़्म : दुनिया, तुम और मैं !!! ///

दुनिया भर घूम आते हो !
दुनिया को जी भर कर देखते हो !!
दुनिया से बाते करते रहते हो ....!!!

.......कभी उस मोड़ पर भी चले आओ.....जहाँ हम खड़े है ,
……….कभी हमें भी जी भर कर देख लो …….आँखे तुम्हारा इन्तजार करती रहती है ;
………कभी कोई एक लफ्ज़ हमारे नाम कर दो .......मन तुम्हे सुनने को तरसते रहताा है !

और फिर..... दुनिया के पास वो निगाहें कहाँ जो हमारे पास है !
और दुनिया के पास वो अलफ़ाज़ कहाँ जो हमारे दिल में है !
और इस फानी दुनिया के पास वो आगोश कहाँ जो हमारे बांहों में है !

all you have to remember that YOU live only once ....!

या तो इस तरह जी लो या फिर उस तरह ही जी जाओ , जो जी रहे हो .
फर्क बहुत मामूली है , उस जहान में मैं नहीं और इस जहान में मेरे सिवा कुछ भी नहीं ..!!!

© विजय

Sunday, June 7, 2015

||| कविता : ज़िन्दगी ||



भीगा सा दिन,
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !


कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

© विजय

Wednesday, April 8, 2015

प्रेम



हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी
और बांटना था प्यार
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे !
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा
नदी के साथ मन बांटा
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी
और कहा उनसे कि वो आशीष दे
हमारे प्रेम को
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह
और
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए
धरती आकाश और नदी पीछे ,
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से
और दोनों का आत्मा से
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ,
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की
देवता सच में होते है कहीं ?

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित
अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;
तुम और मैं
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित
किन्ही दुसरे स्त्री पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 



Thursday, February 27, 2014

मैं, वो और मोहब्बत !


उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!

© नज़्म : विजय

Tuesday, February 4, 2014

मानवता के स्वप्न अब तक अधूरे है



 
स्वप्न मेरे, अब तक वो अधूरे है;  
जो मानव के रूप में मैंने देखे है !

मानवता के उन्ही स्वप्नों की आहुति पर
आज विश्व सारा;
एक प्राणरहित खंडहर बन खड़ा है !

आज मानवता एक नए युग-मानव का आह्वान करती है;
क्योंकि,
आदिम-मानव के उन अधूरे स्वप्नों को,
इस नए युग-मानव को ही पूर्ण करना होंगा !

स्वप्न था कि,
एक अकाल मुक्त विश्व हो,
जहाँ न कोई प्यासा रहे और न ही कोई भूखा सोये;
हर मानव को जीने के लिए अन्न और जल मिले !
पर अभिशप्त आदिम तृष्णा ने अर्ध-विश्व को,
भूखा–प्यासा ही रखा है अब तक !
मेरा वो खाद्यान से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक हर भाषा के अक्षरों से संपन्न विश्व हो,
जहाँ हर कोई किताब और कलम को ह्रदय से लगाए;
अक्षरों से मिल रहे ज्ञान पर अधिकार हो हर किसी का !
पर निर्धनता के राक्षस ने कागज़ और कलम के बदले में,
क्षणिक मजदूरी थमा दी मासूमो के हाथो में !
मेरा वो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
एक स्वछन्द मेघो और स्वतंत्र विचारों से भरा हुआ विश्व हो,
जहाँ मानवता मुक्त पक्षियों की तरह उड़ान भरे;
जहाँ जीवन स्वतंत्रता और खुशियों की सांस ले हर क्षण !
पर युद्ध की विभीषिका ने बारूद से सारा आकाश ढक दिया है,
और निर्दोषों के रक्त से सींचकर, इस भूमि को अपवित्र कर दिया है !
मेरा वो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
इंसानों, पशुओ और वृक्षों से स्पंदित एक सुन्दर विश्व हो,
कि हर किसी को यहाँ जीवन-ऊर्जा की प्राण-छाया मिले;
इस धरा ने हम सभी को जीने लायक कितना कुछ तो दिया है !
पर इंसान हैवान बन गया, पशु मिट गए और वृक्ष ख़त्म हो गए,
और अब हमारा ये एकमात्र भूमण्ड़ल ख़त्म होने की कगार पर है !
मेरा वो प्रकृति के प्रति मातृभाव से भरे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सरहदे न रहे; सृष्टि में एक सकल बंधुत्व हर ओर बना रहे,
इस धरती पर जो कि हम सबके लिए है; सिर्फ मानवता ही बसी रहे;
पर, हमने सरहदे बना दी और जमीन को अनचाहे हिस्सों में बाँट दिया !
अपने देश बेगाने से और अपने इंसान पराये से हो गए / कर दिए,
धर्म को अधर्म में बदल दिया और अंत में ईश्वर को भी बाँट दिया !
मेरा वो सर्वव्यापी बंधुत्व वाले विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
हम प्रेम, मित्रता और भाईचारा को बिना शर्त निभाये,
पर हमने प्रेम की ह्त्या की, मित्रता में विश्वासघात किया;
और भ्रातुत्व के भाव को जलाया; और जीने के लिए शर्ते रखी  !
इंसानों का घृणित व्यापार किया और  स्वंय को लालसा / वासना के दांव पर लगाया,
और आज सम्पूर्ण विश्व प्रेम, मित्रता और भ्रातृभाव से वंचित है !
मेरा वो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबे विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

स्वप्न था कि,
सारी पृथ्वी पर बुद्ध की असीम शान्ति की स्थापना हो,
सारी वसुंधरा में कृष्ण के पूर्ण प्रेम का बहाव हो;
सारी भूमि पर ईशा का सदैव क्षमाभाव हो !
हर धर्म, हर भाषा, हर जाती और व्यक्ति का सम्मान हो  !
पर अब सिर्फ आदमियत की विध्वंसता बची है और ईश्वर कहीं खो से गए है !
एक अतुलनीय विश्व के जागरण का मेरा वो स्वप्न अब तक अधुरा है !


स्वप्न था कि,
मानव मुक्त हो राग, द्वेष, क्रोध, पाप और वासना के मन-मालिन्य से,
अंहकार, आकांक्षाओ, सांसारिक धारणाओ और असीमित आसक्तियो से;
और भर जाए जीवन के उल्लास से और प्रफुल्लित कर दे अपनी आत्मा को;
बच्चो की मासूमियत, फूलो के सौन्दर्य और वर्षा की तृप्त अनुभूतियो से !
एक नये जीवन का; एक नए युग-मानव का और एक नए विश्व का जन्म हो !
मेरा वो प्राण -स्पंदन से भरे हुए विश्व का स्वप्न अब तक अधुरा है !

हां !
देशकाल के अँधेरे अवरोधनो से मुक्त होकर,
हमें एक नए युग-मानव के रूप में बदलकर;
मानवता के इन अधूरे स्वप्नों को पूरा करना ही होंगा !

हां !
वो हम ही होंगे जो एक नए विश्व का निर्माण करेंगे,
जहाँ निश्चिंत ही हम मानवो के सारे अधूरे स्वप्न पूरे होंगे !

हाँ !
एक सुन्दर और प्यारा विश्व होंगा, जो हम सबका होंगा;
जो खाद्यान से भरा हुआ होंगा, हर किसी के लिए !
जो अक्षर-ज्ञान से दीप्तिमान होंगा, हर मानव के लिए !
जो युद्ध-मुक्त और भय-मुक्त होंगा, हर इंसान के लिए !
जो प्रकृति के मातृभाव से भरा होंगा, हर मनुष्य के लिए !
जो सार्वभौमिक, सर्वव्यापी बंधुत्व वाला होंगा, हर व्यक्ति के लिए !
जो मानव-मन के आकंठ प्रेम में डूबा हुआ होंगा; हर किसी के लिए !

और मेरा वो आदिम / प्राचीन स्वप्न,
जिसमे मैं;
एक अतुलनीय, अप्रतिम,  उत्कृष्ट,  सार्वभौमिक, अद्भुत  और,
प्राण-स्पंदन से भरे हुए विश्व का नूतन जागरण देखता हूँ;
वो अवश्य पूरा होंगा !

मैं अपने सारे अधूरे स्वप्न,
इस धरा को और नए युग-मानव को समर्पित करता हूँ !

Monday, December 9, 2013

ज़िन्दगी




भीगा सा दिन, 
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !

कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई  टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

नज़्म  © विजय कुमार

एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...