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Saturday, February 13, 2016

नज़्म

नज़्म :
मुझ से तुझ तक एक पुलिया है
शब्दों का,
नज्मो का,
किस्सों का,
और
आंसुओ का .......

......और हां; बीच में बहता एक जलता दरिया है इस दुनिया का !!!!

© विजय

Friday, September 11, 2015

अंत

...............और अंत में कुछ भी न रह जायेंगा !!
न ही ये सम्मान , न ही ये मान ,
न ही ये धन और न ही ये यश !
बस ...चंद यादें कुछ अपनों के मन में 
और वो शब्द भी जो मैंने कभी लिखे थे !!!
एक अनंत की जिज्ञासा भी साथ में थी ,
साथ में ही रही और
अंत में साथ ही चली गयी !
प्रभु तुम ही तो हो एक मेरे
बाकी तो सब जग झूठा .....!
विजय


Tuesday, June 2, 2015

मेरा कुछ सामान



कुछ दिन पहले मेरा कुछ सामान
मैंने तुम्हारे पास रख छोडा था !

वो पहली नज़र ..
जिससे तुम्हे मैंने देखा था ;
मैं अब तक तुम्हे देख रहा हूँ..

वो पहली बार तुम्हे छूना..
तुम्हारे नर्म लबो के अहसास आज भी
अक्सर मुझे रातों को जगा देते है ..

वो सारी रात चाँद तारो को देखना ..
वो सारी सारी रात बाते करना ....
मैं अब भी तुम्हे चाँद में ढूंढता हूँ

वो तुम्हारे काँधे के पार मेरा देखना...
वो तुम्हारा खुलकर मुस्कराना
तुम्हारी मुस्कान अब तक मेरा सहारा बनी हुई है

वो साथ साथ दुनिया को देखना ..
वो अनजानी गलियों में भटकना ...
तेरे साथ का साया अब तक मेरे साथ है

वो तुम्हारी आँखों की गहरयियो में झांकना ..
वो तुम्हारी गुनगुनाहट को सुनना ...
वो तुम्हे जानना ,तुम्हे पहचानना

वो तुम्हारे कदमो की आहट ..
वो मेरे हाथो का स्पर्श ....
वो हमारा मिलना और जुदा होना

वो मेरा बोलना , वो तुम्हारा सुनना ..
वो मौन में उतरती बाते
वो चुपचाप गहराती राते

वो कविता ....वो गीत ..
वो शब्द ,वो ख़त ,
तुम्हारे लिखे ख़त अब , मेरी साँसे बनी हुई है

वो ढलती हुई शाम ..
वो उगता हुआ सूरज
वो ज़िन्दगी का चुपचाप गुजरना

वो तुम्हारा आना ..
वो तुम्हारा जाना ...
वो ये ;
वो वो .............
जाने क्या क्या ....

इन सब के साथ ,
मेरे कुछ आंसू भी है जांना तुम्हारे पास......

तुम्हे कसम है हमारी मोहब्बत की
मेरा सामान कभी वापस न करना मुझे !!!


© विजय

Wednesday, April 8, 2015

प्रेम



हमें सांझा करना था 
धरती, आकाश, नदी
और बांटना था प्यार
मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमे !
और करना था प्रेम एक दूजे से !
और हमने ठीक वही किया !

धरती के साथ तन बांटा
नदी के साथ मन बांटा
और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

और एक बात की हमने जो
दोहराई जा रही थी सदियों से !

हमने देवताओ के सामने
साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी
और कहा उनसे कि वो आशीष दे
हमारे प्रेम को
ताकि प्रेम रहे  सदा  जीवित !

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओ की तरह
और
जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि
जीने की अपनी शर्ते होती है !
हम अनचाहे ही एक द्वंध में फंस गए
धरती आकाश और नदी पीछे ,
कहीं बहुत पीछे;
छूट गए !

मन का तन से , तन का मन से
और दोनों का आत्मा से
और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से
अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था
पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूँ,
कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को
अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूँ की
देवता सच में होते है कहीं ?

हाँ , प्रेम अब भी है जीवित
अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;
तुम और मैं
साथ नहीं है !

हाँ , प्रेम है अब भी कहीं जीवित
किन्ही दुसरे स्त्री पुरुष में !  

कविता © विजय कुमार 



Thursday, February 27, 2014

मैं, वो और मोहब्बत !


उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!

© नज़्म : विजय

Monday, December 9, 2013

ज़िन्दगी




भीगा सा दिन, 
भीगी सी आँखें,
भीगा सा मन ,
और भीगी सी रात है !

कुछ पुराने ख़त ,
एक तेरा चेहरा,
और कुछ तेरी बात है !

ऐसे ही कई टुकड़ा टुकड़ा दिन
और कई  टुकड़ा टुकड़ा राते
हमने ज़िन्दगी की साँसों तले काटी थी !

न दिन रहे और न राते,
न ज़िन्दगी रही और न तेरी बाते !

कोई खुदा से जाकर कह तो दे,
मुझे उसकी कायनात पर अब भरोसा न रहा !

नज़्म  © विजय कुमार

एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता

घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...