Thursday, September 25, 2008

सिलवटों की सिहरन


मेरे प्रिय दोस्तों , मेरी नई कविता " सिलवटों की सिहरन " आप सब को पेश करता हूँ .मुझे पूरी उम्मीद है की आप सबको मेरा यह नया प्रयास पसंद आयेगा , इस बार thoughts को नए shades दिए है , जो आपको अच्छा लगेंगा . प्यार में अगर दर्द न हो तो वो प्यार कहाँ ..........

सिलवटों की सिहरन

अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..

मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
कांपते है , जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..

तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …

तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,
या मुझे वहां बुला ले......

मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........


4 comments:

  1. bahut prem-pagi rachna hai.

    मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
    कांपते है , जब मैं
    उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..
    bahut khoobsurat ehsaas.

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  2. bahut sudar likha hai aap ne sir ji . badhai aap ko.

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  3. बहुत ही सुंदर शब्द और उनसे भी सुंदर उन भावो की अभिव्यक्ति......
    मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
    कांपते है , जब मैं
    उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..
    मन के भीतर के भावो को बहुत ही सहजता से प्रकट किया है आपने इन लाइनों में,
    मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........
    इन लाइनों में आपने मन में उठ रही तरंगो को कितनी खूबसूरती के साथ रोक दिया है या यु कहिये की तरंगो में एक हलचल से मचा दी है............

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  4. बहोत ही अच्छी कवितायें है और आपका प्रयास भी सरानियह है|
    मेरी आपसे विनती है कि जो भी लिखो BOLD टाईप मैं मत लिखो|

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