Friday, November 30, 2012

नज़्म : मर्द और औरत




हमने कुछ बनी बनाई रस्मो को निभाया ;

और सोच लिया कि;
अब तुम मेरी औरत हो और मैं तुम्हारा मर्द !!

लेकिन बीतते हुए समय ने जिंदगी को ;
सिर्फ टुकड़ा टुकड़ा किया ….

तुमने वक्त को ज़िन्दगी के रूप में देखना चाहा
मैंने तेरी उम्र को एक जिंदगी में बसाना चाहा .
कुछ ऐसी ही सदियों से चली आ रही बातो ने ;
हमें  एक दुसरे से , और दूर किया ....!!!

प्रेम और अधिपत्य ,
आज्ञा और अहंकार ,
संवाद और तर्क-वितर्क ;
इन सब वजह और बेवजह की  बातो में ;
मैं और तुम सिर्फ मर्द और औरत ही बनते गये ;
इंसान भी न बन सके अंत में ...!!!

कुछ इसी तरह से ज़िन्दगी के दिन ,
तन्हाईयो की रातो में  ढले ;
और फिर तनहा रात उदास दिन बनकर उगे .

फिर उगते हुए सूरज के साथ ,
चलते हुए चाँद के साथ ,
और टूटते हुए तारों के साथ ;
हमारी चाहते बनी और टूटती गयी '
और आज हम अलग हो गये है ..

बड़ी कोशिश की जानां ;
मैंने भी और तुने भी ,
लेकिन ....
न मैं तेरा पूरा मर्द बन सका
और न तू मेरी पूरी औरत !!

खुदा भी कभी कभी
अजीब से शगल किया करता है ..!!
है न जानां !!

© विजय कुमार

19 comments:

  1. namaskaar vijay ji , bahut sundar rachna mard aur auurat , bakhoobi aapne gaharai se baato ko vyakt kiya , bahut dino baad aapki rachna aayi , badhai aapko .

    kabhi tjhoda samaye sapne ko bhi de .

    http://sapne-shashi.blogspot.com

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  2. behtreen abhivyakti vijay bhai,niyameet lekhan ek din aap ko janpriya karega.

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  3. फिर उगते हुए सूरज के साथ ,
    चलते हुए चाँद के साथ ,
    और टूटते हुए तारों के साथ ;
    हमारी चाहते बनी और टूटती गयी '
    और आज हम अलग हो गये है

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  4. समझोते की चारपाई तुमने बिछाई वो सोई

    तुम भी अधूरे उठे वो भी अधूरी उठी
    http://rachnapoemsjustlikethat.blogspot.in/2008/02/blog-post.html
    vijay
    ur poem reminded me of my couplet just posting it for you reading pleasure

    nice poem , yours is , nice expressions

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (1-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (1-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. वाह बहुत बढ़िया !

    विश्व एड्स दिवस पर रखें याद जानकारी ही बचाव - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. प्रकृति के रहस्यों को समझना एक गुत्थी ही है..

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  9. waah...lajawab kar diya aapki rachna ne...bahut khoob..

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  10. वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

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  11. वाह...
    बहुत सुन्दर और कोमल भावों की अभिव्यक्ति..

    सादर
    अनु

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  12. प्रेम और अधिपत्य ,
    आज्ञा और अहंकार ,
    संवाद और तर्क-वितर्क ;
    इन सब वजह और बेवजह की बातो में ;
    मैं और तुम सिर्फ मर्द और औरत ही बनते गये ;
    इंसान भी न बन सके अंत में ...!!!

    ....लाज़वाब अहसास...जीवन की सच्चाई का बहुत सुन्दर और प्रभावी प्रस्तुतीकरण..

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  13. वाह ....बहुत बढिया विजय ...रिश्तों पर बखूबी लिखते हो तुम ...

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  14. मैं और तुम सिर्फ मर्द और औरत ही बनते गये ;
    इंसान भी न बन सके अंत में ...!!!

    रिश्तों की पहेली को समझती और समझाती सुंदर कविता.

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  15. सादर आमंत्रण,
    आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
    कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

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  16. Jahan tum chale.jahan wo chli..wo rshte shareer ke thhe...rishty dilon ke hote ..to ye naubat na aati

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  17. Deekhane wale shareer. Insan nahi hote...
    Man ki sundarta ko insaan kaha jata hai...

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  18. Rishty likhe nahi jaate....mahasoos kiye jaate hain...

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