Tuesday, March 13, 2012

सिलवटों की सिहरन


अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..

मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
कांपते है , जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..

तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …

तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,
या मुझे वहां बुला ले......

42 comments:

  1. आदरणीय विजय जी
    नमस्कार !
    तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
    जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
    ........बहुत मर्मस्पर्शी अहसास बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
    जरूरी कार्यो के ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ

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  2. सिलवटों को सुन्दर शब्द दिये आपने....
    बधाई.....

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  3. तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
    मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
    चिठिया हो तो हर कोई बांचे भाग न बांचे कोए सजनवा बैरी हो गए हमार ...सुन्दर एहसास की रचना ...बहुत अलग बहुत ख़ास .जीवन से निस्संग मगर जीने की आस .

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  4. कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
    कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
    कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
    या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......

    फिर कोई नाखुदा मुझे खुदा से मिला दे
    रात और दिन का हर फ़र्क मिटा दे
    सिलवटों की सिहरनों से आज़ाद करा दे
    ओ मौला मेरे, जिस्म को जाँ से मिला दे

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  5. और कुछ ना हो सके तो उसका दीदार करा दे
    मौला या कि नज़रों मे उसकी तस्वीर बसा दे मौला
    कोई देखे मेरी निगाह मे दीदार उसका हो
    नज़रों को मेरी उसका दर्पण बना दे मौला

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  6. और कुछ ना कर सके तो इतना कर दे
    एक ही अक्स मे दोनो रूप मिला दे मौला
    अर्धनारीश्वर को फिर साकार करा दे
    नही तो खुद को खुदा कहलाना भुला दे मौला

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  7. वाह ... बहुत खूब लिखा है आपने ...आभार ।

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  8. कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
    कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
    कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
    या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......

    बहुत बहुत सुन्दर विजय जी ! अत्यंत भावपूर्ण और दिल में गहराई तक उतरती रचना ! बहुत खूब !

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  9. बहुत ही सुंदर भाव संयोजन किया है आपने सुंदर रचना...शुभकामनायें

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  10. आपने जो बिम्ब इस्तेमाल किये हैं विजय जी, क्या कहूँ...बिम्ब नहीं बोम्ब हैं वे...सचमुच आग लगा जाने वाले...

    जबरदस्त रचना..

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  11. बहुत सुन्दर कल्पना...

    अक्सर तेरा साया
    एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
    और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है!

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  12. या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......
    पूरे समर्पण के साथ ...भावना जैसे कूट कूट कर भर दी है आपने अपनी रचना में ....
    बहुत सुंदर रचना ....!!

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  13. bahut sunder bhav sanjoye hain vijay ji.

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  14. बहुत ही सुंदर और मर्म को छूने वाली कविता है ।

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  15. बहुत सुंदर रचना ....!

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  16. बहुत बहुत सुन्दर विजय जी !!! जबरदस्त रचना.....

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  17. कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
    कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
    कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
    या तो तू यहाँ आजा ,
    या मुझे वहां बुला ले......

    बहुत खूबसूरत एहसास.......
    सादर.

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  18. अच्‍छे शब्‍द और विचार

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  19. शिर्षक से लेकर अन्त तक ..........

    "A Simple Human and a dreamer, a poet , a musician , a singer, a photographer, a sculptor, a comic artist, a dancer, a writer, a painter, a giver, a worshiper, a lover, a friend, a teacher, a mentor, a speaker, a thinker, a philosopher and a student for lifetime learning from this world".....

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  20. kin shabdo se tarif karoon.........umda

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  21. बहुत कोमल अभिव्यक्ति..

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  22. बाप रे बाप
    कमाल कर दिया आपने तो
    सिलवटों में सिहरन एक ग़ज़ब एहसास है भई

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  23. ईमेल के द्वारा कमेन्ट :

    Namskar sir

    Bahut hi achi kavita haii...


    with regards,

    Kosha G

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  24. ईमेल के द्वारा कमेन्ट :

    hello bhai ji,
    kavita achchi hai,lekhni mein mah ke kavi banne ke liye bahut- bahut badhayee,holi ki shubh kamnaon ke saath,

    sheel nigam

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  25. ईमेल के द्वारा कमेन्ट :

    Good work.
    Worth appreciation.
    B.K.Dave
    Executive Director (Retd.)

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  26. तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
    मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ

    ....वाह! लाज़वाब अहसास...बहुत सुंदर भावमयी प्रस्तुति...

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  27. बहुत ही बढ़िया सर

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  28. ईमेल के द्वारा कमेन्ट :

    Bhai Shri vijayji,
    Namaste,

    Man ke Bhavon ko kabhi man ki gahrayion main pighla dena to kabhi
    bebaki se kagaj par utarna, aapki kavitaon ka yehi mizaj
    hai.Badhai.Likhte rahen, magar bahut jyada mukharta se bachen. kuch
    baaten khamosh achi lagti hain. Bura ne mane ye meri feeling hai.
    Aapke blogs ki vividhta se main behad khush hun.main unhe baar baar
    dekh chuki hun.kush rahen.God Bless You.


    Regards,
    Shilpa

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  29. ईमेल के द्वारा कमेन्ट :

    विजय कुमार जी,

    नमस्कार|

    "सिलवटो की सिहरन " अच्छी कविता है|

    -शुभ कामनाओं सहित

    -दिनेश श्रीवास्तव

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  30. कविता की प्रवाह कहूँ या भावों का समंदर..बस खींचती जाती है ..खींचती जाती है और अहसासों में पूरी तरह डुबो देती है..

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  31. बहुत खूब ..
    शुभकामनायें आपको !

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  32. अक्सर तेरा साया
    एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
    और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..
    ................waah sunder geet , anand aa gaya padhkar , vijay ji ,

    bahut dino ke baad aapki blooging suru hui ,
    kabhi kabhi hamare blog par bhi aapna anmol samay den ..hardhik badhai aapki rachna ke liye

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  33. bahut bhav pravan kavita hai...badhai...

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  34. वो अपने गम अब खुद ही
    ढोने लगा हैं
    अब हमें दर्द भी नहीं होता
    क्यूँ दर्द खुद हमें छूकर
    रोने लगा हैं |.........अनु

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  35. बहुत सुन्‍दर भाव चित्र हैं मित्र । आपको बधाई ....

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  36. sundar ehsason ko choone vali sundar rachna..

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  37. वाह ||
    बहुत ही सुन्दर
    कोमल भावो की सुन्दर अभिव्यक्ति....

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