Friday, July 22, 2011

फूल , चाय और बारिश का पानी



 
फूल,चाय और बारिश का पानी 

बहुत दिनों के बाद ,
हम मिले...
हमें मिलना ही था , प्रारब्ध का लेखा ही कुछ ऐसा था .
मिलना , जुदा होना और फिर मिलना और फिर जुदा होना ......!!!

जब मिले तो देखा कि
उम्र से ज्यादा कहर ,
हम पर;
हमारी यादो ने ढाया था .
हम वो नहीं थे , जो जुदा होते वक़्त थे ..
हम वो थे, जो ,हम कभी थे ही नहीं ...

मैं तुम्हे और तुम मुझे बहुत देर तक यूँ ही देखते रहे
शायद हैरान थे और कुछ कोशिश आंसुओ को रोकने की भी थी
मुझे याद आया कि , जब  हम पहली बार मिले थे ,
तब भी इतना नहीं देखा था एक दुसरे को ;
वक़्त से शिकवा करे या ज़िन्दगी से ,
कुछ समझ नहीं आ रहा था ….
……. लब खामोश थे .!!

होटल के खुले आँगन में एक पेड़ जिसमे ;
दो लाल रंग के फूल खिले थे;
उसके नीचे बैठकर, हमने चाय मंगाई .
हमेशा की तरह दो सफ़ेद कप
और उनमे ज़िन्दगी की रंग वाली चाय
हमने चाय पीना शुरू  किया और
बेकार की बातो से एक दूसरे को टटोलना शुरू किया
जैसे ….कैसे हो
ज़िन्दगी कैसी है

निरर्थक से सवालों के
एक झूठा सा जवाब
सब अच्छा है ,
हर सवाल का यही जवाब था !!

हम थोड़ी थोड़ी देर में पीछे मुड जाते थे
जैसे किसी को देख रहे हो
[
जिसे उम्र भर देखना चाहा था ; वो सामने ही बैठा था ]
दरअसल ,हम अपने आंसुओ को पी जाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे.

बहुत देर की ख़ामोशी के बाद मैंने कहा
मेरी याद नहीं आती !

तुमने एक फीकी सी मुस्कराहट  को ओड़ कर कहा
नहीं ; अब नहीं आती है !!
पता नहीं ये सच था  या झूठ ,

तुमने पुछा ,
तुम्हे भी नहीं आती होंगी
दुनिया में मन लग जाता है
मैंने कहा
यहाँ बात दिल की है

मैंने पुछा ,
तुम्हे याद है सब कुछ
तुमने कहा , हाँ
तुमने मेरी देखकर कहा
और तुम्हे ?
मैंने कहा हाँमुझे सबकुछ बहुत अच्छे से याद है ,
in fact ,
मैं तो कुछ भी नहीं भूला हूँ
तुम्हे भी नहीं ...कभी नहीं ...!!

तुम रोने लगी
और मैं भी ;

आकाश में अचानक घुमड़ घुमड़ कर बादल आ गए थे
हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी थी .

मैंने हाथ बढ़ाया  तुम्हारी ओर
तुम्हे बारिश से बचाने के लिए ,
होटल के shade  में ले जाना चाहता था
तुमने हिचकते हुए
मेरे हाथ में अपना हाथ दिया
उसी हाथ में ,
जिसे तुमने एक अजनबी से मोड़ पर छोड़ दिया था
समय भी कैसे कैसे पल दिखाता है हमें

तुम मेरे पास खड़ी थी
बारिश अब जोरो से होने लगी थी
मैंने तुमसे पुछा , याद है तुम्हे वो बारिश
तुमने मुस्करा कर कहा , कौनसी 
मैंने कहा  अरे वही उस पुराने शहर वाली बारिश
तुमने कहा कि हम कभी बारिश में भीगे ही नहीं
मैंने मुस्कराते हुए कहा , अब भीग जाए !!

तुमने कुछ देर ठहर कर कहा , मैं चलती हूँ   ...

समय फिर रुक  सा गया, 
मैंने देखा चाय के कप में ;
पेड़ के फूलो से पानी टपक रहा था ;
और बारिश का पानी  जमा  हो रहा  था .

मैंने कहा कि ,
नहीं .
अब मत जाओ ...

लेकिन तुमने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी थी
और
मेरी प्रेम की दुनिया में तुम नहीं रह सकती थी .
क्योंकि साथ निभाना तुमने नहीं जाना था .

तुमने कहा ,
नहीं , अब बहुत देर हो चुकी  है
और .......तुम चली  गयी !

मैं बाहर  आ कर तुम्हे मोड़ तक देखते रहा 
मैं भीग  रहा  था जोरो से..
तुमने मुड़कर  देखा मुझे मोड़ पर  ;
और चली  गयी .

मैं बहुत देर तक वह खड़ा रहा ,
और बारिश के पानी में ;
मेरे आंसुओ को मिलते हुए देखता रहा

मैं मुड कर देखा ,
मोड पर अब कोई नहीं था
और ;
वो दो फूल झड गए थे .
चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ; 
और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!




141 comments:

  1. बहुत ही गहराई लिए पूरी रचना...

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  2. मैं मुड कर देखा , मोड पर अब कोई नहीं था और ; वो दो फूल झड गए थे .
    चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ; और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!


    कोमल अहसासों से परिपूर्ण बहुत मर्मस्पर्शी रचना..बहुत सुन्दर

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  3. विजय जी
    क्या इरादा है ... !

    प्रेम की बड़ी दुखांत कविता लिखदी आपने तो ...
    और .......तुम चली गयी !
    मैं बाहर आ कर तुम्हे मोड़ तक देखता रहा
    मैं भीग रहा था जोरो से..
    तुमने मुड़कर देखा मुझे मोड़ पर ;
    और चली गयी .
    मैं बहुत देर तक वहां खड़ा रहा ,
    और बारिश के पानी में मेरे आंसुओ को मिलते हुए देखता रहा ...
    मैंने मुड कर देखा , मोड पर अब कोई नहीं था
    और...वो दो फूल झड गए थे .
    चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ;
    ... और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!

    पढ़ने वालों पर कुछ रहम किया करें ...
    मन भर आया है ... :(

    वैसे कविता के लिए आपको बहुत बहुत
    बधाई और शुभकामनाएं भी देना चाहता हूं ...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  4. और .......तुम चली गयी !
    मैं बाहर आ कर तुम्हे मोड़ तक देखता रहा
    मैं भीग रहा था जोरो से..
    तुमने मुड़कर देखा मुझे मोड़ पर ;
    और चली गयी .

    सुबह-सुबह सेड हो्ने का मुड नक्को रे भाय, चली गयी तो आ भी जाएगी। काहे टेंसन लेने का, मस्त रहने का, मौज करने का एकदम बिंदास

    हां! फ़ोटो में फ़ूल कौन सा है उसका नाम बताएं।

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  5. अजनबी मोड
    अजनबी मुलाकात
    जानकर भी अन्जान
    पता नही वजूद जुदा हुये थे
    या …………
    नहीं , आत्मायें कभी जुदा नही होतीं
    वज़ूद तो किराये का मकान है
    और तुम और मै बताओ ना
    वजूद कब रहे
    हमेशा ही आत्माओ से बंधे रहे
    अब चाहे कितनी ही
    बारिशें आयें
    कितने ही मोड अजनबी बनें
    कितनी ही ख्वाहिशें दम निकालें
    और चाहे चाय के कप दो हों
    और उनमे चाहे कितना ही
    पानी भर जाये
    देखना प्यार हमेशा छलकता है
    वो कब किसी कप मे
    किसी बारिश की बूंद मे
    या किसी फ़ूल मे समाया है
    वो तो वजूद से इतर
    दिलो का सरमाया है
    फिर कैसे सोचा तुमने
    हम जुदा हुये
    हम तो हमेशा
    अलग होते हुये भी एक रहे
    एक आसमां की तरह
    एक पंछी की तरह
    कहीं भी रहे
    उडान तो आसमां की तरफ़ ही होती है ना……………

    विजय जी आपकी कविता के लि्ये मुझे इससे बेहतर और कोई जवाब नही सूझा…………आपकी आज की कविता ने मन मोह लिया।

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  6. भावुक कर देने वाली कविता... बेहद सुन्दर...

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  7. हमें तो जो मिल जाये, उसे ही प्रारबेध का प्रसाद समझ लेते हैं।

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  8. अत्यंत भावपूर्ण लेकिन यथार्थ के कठोर धरातल पर बुनी गयी एक बेहद मर्मस्पर्शी रचना ! बहुत ही सुन्दर ! बधाई स्वीकार करें !

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  9. वाह! गजब की बात सुन्दर शब्द!

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  10. Lambi kintu pravah ne bandhe rakha...dil se uthi kavita...badhai.

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  11. कविता कुछ सत्य घटनाओ पर आधारित सी लग रही है. सुन्दर रचना.

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  12. इन पंक्तियों ने तो मन मोह लिया। एक बार आपका लाजवाब अंदाज दिल को भा गया। आप तो हैं ही सुपर, इस कविता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आप जैसा कोई नहीं।

    लेकिन तुमने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी थी
    और
    मेरी प्रेम की दुनिया में तुम नहीं रह सकती थी .
    क्योंकि साथ निभाना तुमने नहीं जाना था .

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  13. Email :

    Bhai Shri Vijayji,

    NAMASKAR,

    Sunder Rachna. Har dil se padhnevale ko bha jayegi.Badhai ho Badhai. Aisi rachnaye karte rahein,magar thodisi
    nirasha kam kar ke.Apka blog bahut achha lagta hai. Photography part
    bhi sunder hai, Kripya apki birth date aur sun sign suchit
    karein.shesh samanya.

    Shilpa Sontakke

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  14. कविता पढने के बाद ...आँखों में आंसू है ..और हाथ खुदबखुद लिखने लगे आपकी कविता का जबाब ........


    जिन्दगी के किसी मोड़ पे
    यूँ अचानक वो मिल जायेगें
    ऐसा सोचा ना था
    क्या जबाब आएगा
    पीते पलो का ...
    ये सोचा ना था
    हम तो खड़े रहे
    इंतज़ार में ....
    और वो
    दिल पर पत्थर
    रख ...
    फिर जुदा हो गए ...
    --

    anu

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  15. कभी तो मुड़ के देखो
    खूबसूरत यादो के जंगल मे
    तुमको शायद आज भी कोई मिल जाये
    सिर्फ तुम्हारा इंतज़ार करते हुये
    कभी तो मुड़ के देखों
    अहसास करने के लिये
    कि यादे अभी भी धुंधली
    नही पड़ी हें
    कोई उन्हे आज भी जिंदा रखे है
    सिर्फ तुम्हारे लिए
    कभी तो मुड़ के देखो
    अहसास करो
    कि किसी ने समय कों
    रोक दिया है
    सिर्फ तुम्हारे लिये
    कभी तो मुड़ के देखो
    महसूस करने के लिये
    कि निश्ब्ध एक दिल धढ़क रहा है
    सिर्फ तुम्हारे लिए
    मुड़ के देखो कभी
    क्योकि कोई चाहता है
    की
    तुम मुड़ के देखो

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  16. vijay ji excellent play of words

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  17. Aapkee kavitaa mastishk ko chhotee hee
    nahin hai ,dil mein utartee bhee
    hai .shabdon aur bhavon mein
    prawaah hai . Abhivyakti to kamaal
    kee hai .yun hee likhte rahiye
    aur sab ko lubhaate rahiye . Aapko
    romantic kavi maantaa hoon main .
    Shubh kamnaaon ke saath .

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  18. Beautiful poemS.. poems isliye kyuki Vandana ji ka jawaab bhi behad pyara h :)

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  19. हर सवाल का यही जबाव ..सब अच्छा है . बस यही कहने को रह जाता है . जो न कही जाए वो यूँ ही सुनी जाती है . बहुत अच्छा लिखा है.

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  20. प्‍लास्टिक के थे कप

    कैसे हो गए कांच के

    जैसे कविता बांच के

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  21. वाह ! क्या बात है! गहरे भाव के साथ दिल को छू लेने वाली कविता! उम्दा प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  22. जिन्दगी के किसी मोड़ पे
    यूँ अचानक वो मिल जायेगें

    गहन भावों का समावेश हर पंक्ति में ...बेहतरीन भावमय करती प्रस्‍तुति ..बधाई स्‍वीकारें ।

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  23. ज़िंदगी के रंग की चाह-कविताएं

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  24. फूल , चाय और बारिश का पानी" पढ़ कर यह तो तय है कि शब्द विन्यास एवं दृश्यांकन इस रचना की जान है.
    काफी साढ़े हुए शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.
    सबसे बड़ी बात यह उभर कर सामने आई है कि आपने बगैर अश्लीलता के शालीनता पूर्वक श्रृंगार रस को पूर्णता प्रदान की है.
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है.
    मेरी दृष्टि से इन भावनाओं को यदि एक लघुकथा के रूप में पिरोया जाता तो निश्चित रूप से चार चाँद लग जाते.
    - विजय तिवारी 'किसलय'

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  25. Aapki kavitayen.. nazm .. man ko bheetar se kachotti hai.. halki halki bheetar samati hui .. har shabad par samvedansheelta thartharti hai..bahut achcha likhte hain aap

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  26. बहुत ही गहराई

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  27. संवेदनाओं की धरातल पर उपजा जीवन का कर्कश उद्घोष, यह कविता महज कविता नहीं एक तरह से प्रवाह है भावनाओं का गहरी छाप छोड़ती हुयी एक गंभीर कविता हेतु हार्दिक बधाईयाँ !

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  28. कुछ कहने लायक छोड़ा कहाँ आपने जो कह सकूँ ...

    बस दर्द का दरिया ही बहा दिया आपने...

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  29. विजय जी, इस रचना मे संवेदना अपने भाव खुद प्रकट कर रही है... बेहद संवेदनशील रचना.. आभार
    स्वागत है आपका मेरे ब्लाग पर...

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  30. बहुत गहरे एहसास. प्रेम की अभिव्यक्ति आपके हर शब्द में उभर आई है.
    कहाँ-कहाँ से कोट करूं?
    भावनाओं का अथाह सागर!
    साथ ही वंदना जी का जवाब भी बहुत सुन्दर है.
    आप दोनों की कविताओं ने मन को झिंझोड़ कर रख दिया है.
    इतनी बढ़िया कवितायें लिखने के लिए आपदोनो को ही धन्यवाद.

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  31. आपकी आज की कविता ने मन मोह लिया।
    बधाई स्वीकार करें !

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  32. होटल के खुले आँगन में एक पेड़ जिसमे ; दो लाल रंग के फूल खिले थे; उसके नीचे बैठकर, हमने चाय मंगाई .
    हमेशा की तरह दो सफ़ेद कप
    और उनमे ज़िन्दगी की रंग वाली चाय
    हमने चाय पीना शुरू किया और बेकार की बातो से एक दूसरे को टटोलना शुरू किया जैसे ….कैसे हो
    ज़िन्दगी कैसी है ... bahut hi behtareen bhaw

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  33. आप ब्लॉग जगत के देवदास हो...

    नीरज

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  34. विजय जी आमंत्रण के लिए आभारी हूं।
    *
    यहां कई दिग्‍गज ब्‍लागरों ने आपकी इस कविता की जी भरके तारीफ की है। क्‍योंकि वह है तारीफ के लायक।
    लेकिन जैसा कि इस ब्‍लागर दुनिया का रिवाज है, सब अच्‍छा अच्‍छा कहने के लिए ही आते हैं। डरते हैं कि कहीं सामने वाला बुरा न मान जाए या उसे तकलीफ न पहुंचे। असल में ऐसे में वे रचनाकार का नुकसान ही करते हैं। रचनाकार अपनी उन कमजोरियों या कमी की तरफ ध्‍यान दे ही नहीं पाता। क्‍योंकि उसे अपनी हर रचना प्‍यारी होती है।
    बहरहाल यह भाषण या संभाषण मैंने इसलिए दिया क्‍योंकि मैं यह कहने जा रहा हूं कि आपकी यह कविता अभी बहुत अधिक काम मांगती है। कविता का शीर्षक जितना सुंदर बन पड़ा है या उसमें जो भाव हैं,उनके साथ आपने अभी न्‍याय नहीं किया है। कविता में न केवल संपादन की जरूरत है वरन् उसकी पुनर्रचना की आवश्‍यकता है। और यह काम स्‍वयं ही कर सकते हैं। आप अपनी इस कविता को इस तरह पढि़ए जैसे उसे आपने लिखा ही नहीं है। वह किसी और की है। कुछ शब्‍दों को जो वास्‍तव में अनावश्‍यक हैं छोड़कर पढि़ए। विश्‍वास मानिए ऐसा कर‍के देखिए आपकी यह कविता अनूठी बन पड़ेगी।

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  35. wow
    mere paas shabd nahi hain explain karne k liye
    ek ek shabd aapne itni khubsoorati se piroya hai
    :)

    rachna dil ko chu gayi
    badhai

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  36. हाँ मैं चली आई थी वहां से
    तुम्हें अकेला छोड़ कर
    ज़ज्ब करके अपने को अपने-आप में

    लेकिन तुम्हें आज भी सिर्फ तुम दिखे
    मैं नहीं .......
    इस बरसाती शाम में क्या
    उस दिन भी नहीं...
    जब तुम्हारा हाथ उस गली के मोड़ पर छोड़ा था मैंने
    ________

    तुम्हें अगर मैं कभी दिखी होती
    तो आज बात कुछ और होती
    हाँ फूलों से झड़ता पानी इन कपों में आज भी गिरता
    पर तब
    हम-तुम यूँ अपनी शाम जाया न कर रहे होते
    समेट रहे होते इक-दुसरे को इक-दुसरे में
    कहीं ना जाने देने के लिए

    तब क्यूँ नहीं समझे थे तुम.....मुझे ?
    तब क्यूँ नहीं रोका था तुमने.....मुझे ?

    अब फिर कैसी शिकायत......

    गुंजन
    ५/८/११

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  37. aur koi behter zavab sujha nahin apki is khubsurat kavita ke liye

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  38. bahut sunder! baarish ke paani mein aansoon ka milna... dil ko chhoo gaya

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  39. चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ; और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!

    दर्द का कितना कोमल अहसास । दिल को छू लेने वाला ।

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  40. This very deep and touching poem. Title is something anyone can relate to and the picture makes reading a wholesome experience.

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  41. बहुत दिनों के बाद ,
    हम मिले...
    हमें मिलना ही था , प्रारब्ध का लेखा ही कुछ ऐसा था


    यही सच है

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  42. behad bhawbhinee,nazuk si kavita....bahut achchi lagi.

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  43. मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद... कोमल अहसासों को पिरोती हुई... दिल की गहराईयों को छूने वाली बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  44. मैं बाहर आ कर तुम्हे मोड़ तक देखता रहा
    मैं भीग रहा था जोरो से..
    तुमने मुड़कर देखा मुझे मोड़ पर ;
    और चली गयी .


    अत्यंत हॄदयस्पर्षि और भावपूर्ण रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम

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  45. विजयजी भावुक कर दिया आपकी कविता ने ... शालीनता मन को बहुत भायी... बेहद सुन्दर भाव...
    मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद..जी मैं भी नागपुर से ही हूँ ...

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  46. निरर्थक से सवालों के
    एक झूठा सा जवाब
    सब अच्छा है ,
    हर सवाल का यही जवाब था !!
    हम थोड़ी थोड़ी देर में पीछे मुड जाते थे
    जैसे किसी को देख रहे हो
    [ जिसे उम्र भर देखना चाहा था ; वो सामने ही बैठा था ]
    दरअसल ,हम अपने आंसुओ को पी जाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे.
    rachna bahut hi khoobsurat hai ,shabd nahi mil rahe tarif ke liye ,aesi duvidha aksar lambe antraal par aa jaati hai jahan hokar bhi kuchh nahi hota kahne ko .har cheez ka apna waqt hota hai jo jaane ke baad wo shama nahi bana paata dobara .

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  47. सब अच्छा है ,
    हर सवाल का यही जवाब था !!

    Behtreen rachna...

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  48. आपकी यह रचना....सुन्दर है...साथ ही साथ सत्यता के बहुत करीब भी लगी.

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  49. bahut subder , dil ko choo lene wali kavita

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  50. गहराई को बयां करती रचना...

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  51. अरे, यह तो एक जबरदस्त काव्य नाटिका के समान [समान] है| इसे फिर से पढ़ने की तमन्ना रहेगी, यदि वक़्त वापस यहाँ तक खींच कर ला पाया तो|

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  52. कप में पानी तो नहीं है विजय जी .....?
    :))

    पर गज़ब का वियोग रस है आपकी कलम में ..
    उपमालंकार गज़ब के हैं ....

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  53. jai ho...
    hats off...
    aur kya bolu...
    poori kavita padhne ke baad do min main bhi wahi kahdi poora drishya dekh rahi thi...
    fir samajh aaya ki mai kavita padh rahi thi... aur uske liye comment bhi dekar apni upasthiti darz karani hai...
    fabulous...

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  54. waah hats off sir ji.....

    barsaat ke mosam main wo intzaar

    aur uspar aapke shabd mano aisa pratit ho raha ho

    barsaat main koi virah agni main jal raha ho...

    last ki lines kamal ki hai wo aansu aur cup aur zinadagi bahut

    khubsurti se in sabko joda hai aapne maja aagaya.....

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  55. बारिश की बूंदें, आंसुओं का झरना और यादों का रेला- कविता में इन तीनों का प्रतीकात्मक संयोजन उसे उत्कृष्ट बना रहा है।
    इस सुंदर भावमयी कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

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  56. simply superb n awesome..
    brilliantly written :)

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  57. मार्मिक और भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
    पहली दफा आपके ब्लॉग पर आया हूँ.
    आपकी लेखनी विरह के दर्द को रचना में
    उंडेलने में समर्थ है.कायल हो गया हूँ मैं.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

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  58. jeevan ke ahsason ko kvita ke rup me prastuti adbhut hai. man ki aavaj aur shbdon ke saath ne acchi rachna ki

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  59. फ़ूल चाय और बारिश का पानी ..सब तो मिल गया ... बहुत मार्मिक चित्रण

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  60. ह्रदय की गहराइयों से उपजे आप के भावों ने भाव-विभोर कर दिया...
    भावों की अद्भुत अभिव्यक्ति...

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  61. विजय जी!
    पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर और बांध कर रह गया.. पूरी कविता एक फिल्म की कहानी की तरह आँखों के सामने से गुजार गयी..लगा जैसे यह कविता नहीं कोइ सेल्युलोएड पर कैमरे की कलम से लिखी एक नज़्म है!!कुछ ऐसे ही एहसासात फिल्म सिलसिला या कभी कभी देखते हुए मन में उठे थे!! आभार व्यक्त करता हूँ आपका!

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  62. हर ह्रदय में कभी न कभी सहज रूप से उठती भावनाओं को शब्द दे दिया है .. शुभकामना

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  63. वाह वाह क्या बात है क्या बात है ।

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  64. मैं तुम्हे और तुम मुझे बहुत देर तक यूँ ही देखते रहे
    शायद हैरान थे और कुछ कोशिश आंसुओ को रोकने की भी थी
    मुझे याद आया कि , जब हम पहली बार मिले थे ,
    तब भी इतना नहीं देखा था एक दुसरे को ;
    वक़्त से शिकवा करे या ज़िन्दगी से ,
    कुछ समझ नहीं आ रहा था …. ……. लब खामोश थे .!!

    बहुत ही भावपूर्ण रचना है विजय जी
    बहुत ख़ूब !!!

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  65. bahut accha , dil ko chu lene wala . namra eahsas .
    badhai ho .

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  66. ''मैंने मुड कर देखा , मोड पर अब कोई नहीं था
    और...वो दो फूल झड गए थे .
    चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ;
    ... और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!''

    ये पंक्तियाँ मन को गहरे छू गयी. रचना के दृश्य जैसे आँखों के सामने आ गए और उस पीड़ा को महसूस कर मन में कुछ भींग गया, शायद बारिश का पानी मन में उतर गया. बहुत भावुक रचना, बधाई विजय जी.

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  67. बहुत दिनों के बाद ,
    हम मिले...
    हमें मिलना ही था , प्रारब्ध का लेखा ही कुछ ऐसा था .
    मिलना , जुदा होना और फिर मिलना और फिर जुदा होना ......!!!
    waah kya baat hai , dil ke ander gher ker hi gyi aapki ye rachna , jitne sunder ahasaan utne hi sunder alfaj .....bahut umda .........badhai ...........

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  68. jinhe jana hai Vijay ji wo to jayenge hi
    kaun ruka hai aaj tak kisi liye
    na waqt aur na woh
    haan ek ehsaan kar jate hain jate-jate
    yaadein de jate hain
    yaad karne ke liye

    ankh nam ho gayi padh kar aapki rachna

    fir bhula hua sa kuch y7aad dila diya

    abhaar

    Naaz

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  69. मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद...विजय जी

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  70. बहुत दिनों के बाद ,
    हम मिले...
    हमें मिलना ही था , प्रारब्ध का लेखा ही कुछ ऐसा था .
    मिलना , जुदा होना और फिर मिलना और फिर जुदा होना ......!!!
    सुन्दर........मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

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  71. बेहद खूबसूरत शब्द और उतनी ही खूबसूरत कविता........बहुत अच्छा लगा आपका ब्लॉग और खासकर आपकी कविता पढके.....

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  72. मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
    आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
    पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  73. बहुत दिनों बाद मुलाक़ात होने पर अक्सर देर हो चुकी होती है ! निराशा और आंसू ही हाथ आते हैं !

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  74. गली के मोड़ पर सूना सा एक दरवाज़ा,
    तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा,
    निगाह दूर तलक तक जा के लौट आएगी,
    करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
    गुज़रते वक्त की हर मौज ठहर जाएगी...

    (ब्लॉग का बैकग्राउंड काले से बदल कर किसी लाइट कलर का कर दें, पढ़ने वालों की आंखों पर स्ट्रैस नहीं पड़ेगा)

    जय हिंद...

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  75. बेहद सुंदर और अपनी सी लगी आप कि यह रचना...लिखते रहिए

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  76. यह रचना कईयों के दिलों को झझकोड़ कर रख देगी ।
    अक्सर बिछड़ने के बाद न तो मिलना होता है , या फिर अजनबी ही होते हैं ।
    लेकिन एक सुन्दर ख्वाब हो सकता है , यह मुलाकात ।

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  77. बरसात में रोमांस का मज़ा ही कुछ और है.वो भी जब बिछड़ा यार मिला हो तब.आपकी कविता पढ़कर किसी का बड़ा मौजूं शेर याद आ गया,सुनियेगा:-

    मज़ा बरसात का चाहो तो इन आँखों में आ जाओ,
    वो बरसों में बरसती है,ये बरसों से बरसती है.

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  78. itne comments mil chuke hain aapko mai to kya hi likhoon. .. aapki rachna chitratmak hai. kahi kahi jeevan darshan bhi jhalkta hai jo kavita ko gahrai deta hai. bimbo ka abhav laga lekin iski sarlta me jo prvaah hai vah baandhe rakhta hai.. badhai.

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  79. कोमल अहसासों से परिपूर्ण मर्मस्पर्शी रचना,

    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  80. कविता को मन में उठते भावों को जैसे ज्यों का त्यों रख दिया गया हो ...अजीब से रीतेपन का अहसास कराती हुई ...जरुरी नहीं के लौटें वो रास्ते ..इसलिए वक्त रहते संभल जाना चाहिए ..

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  81. "मैंने मुड कर देखा , मोड पर अब कोई नहीं था
    और...वो दो फूल झड गए थे .
    चाय के कप में अब पूरी तरह से बारिश का पानी भर गया था ;
    ... और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!"
    विजय सर.आपकी कविता ने तो भावुक कर दिया.पढ़ते -पढ़ते आँखें भर आई.लग रहा है मानों मेरे ही जीवन की घटना हो.इतनी जीवंतता के पीछे का सच मैं समझ सकता hun.abhibhoot हूँ और महसूस कर सकता हूँ. दो अपनों के बहुत दिनों बाद पास आने और बिछड़ने पर ऐसा ही होता है.मुझे अपने पुराने दिन याद आ गए.दिल को झकझोरती रचना.

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  82. कोमल अहसासों से परिपूर्ण बहुत मर्मस्पर्शी रचना .........

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  83. अधूरे प्रेम की सच्ची और सरल वर्णन.बहुत सुन्दर रचना है

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  84. your are explain your ideas very clearly. It's great stuff. I enjoyed to read this blog.

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  85. विजय जी ... जैसे कोई चित्र चल रहा हो आँखों के सामने ... नीले गहरे पानी का रंग उतर आया है इस नज़्म में .... जैसे आँखें बंद हों और कहानी गुज़र रही हो सामने से ... गहरा एहसास लिए ...
    माफ़ी चाहता हूँ देर से आने के लिए ... पिछले १२ दिनों से बाहर था ...

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  86. भावपूर्ण प्रस्तुति!

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  87. आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  88. shukriya ...meri lekhni ko sarahne ke liye!

    aap kaafi acchha likhte hain!

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  89. hmmm! achha likhte hain aap! shukriya

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  90. मैं तुम्हे और तुम मुझे बहुत देर तक यूँ ही देखते रहे
    शायद हैरान थे और कुछ कोशिश आंसुओ को रोकने की भी थी
    मुझे याद आया कि , जब हम पहली बार मिले थे ,
    तब भी इतना नहीं देखा था एक दुसरे को ;
    वक़्त से शिकवा करे या ज़िन्दगी से ,
    कुछ समझ नहीं आ रहा था ….
    ……. लब खामोश थे .!!
    shabdon और bhavon का बहुत khoobsuarat sanyojan kiya है आपने mujhse आने में देर हुई इसके लिए क्षमा chahti हूँ.और ये मेरे लिए ही गलत रहा.चलिए देर से ही सही हमें आपकी सुन्दर अभिवयक्ति से परिचित होने का अवसर मिला.आभार

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  91. मैं मुड कर देखा ,
    मोड पर अब कोई नहीं था और ;
    वो दो फूल झड गए थे .
    चाय के कप में
    अब पूरी तरह से
    बारिश का पानी भर गया था ;
    और शायद ज़िन्दगी में भी !!!!


    शब्द-शब्द संवेदनाओं से भरी मर्मस्पर्शी रचना ! हार्दिक शुभकामनायें !

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  92. इस भावनात्मक रचना के लिए आपको बधाई

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  93. बहुत सुन्दर ! बधाई स्वीकार करें...|

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  94. विजय जी आपकी कविता बहुत भावपूर्ण है ।

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  95. कुछ जगह के भाव में में अपनी ही यादों में खो गया ....
    आप अपने मकसद में कामयाब हैं , इस बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बधाई भाई जी !

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  96. अगर आपको प्रेमचन्द की कहानिया पसंद हैं तो आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है |
    http://premchand-sahitya.blogspot.com/

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  97. विजय जी ...
    बहुत भावपूर्ण रचना है..
    न जाने कितनों के दिलों को छू गयी और न जाने कितने दिलों की पुरानी याद ताज़ा कर गयी! ऐसा ही वाकया हर एक के दिल से जुड़ा होगा शायद...! तभी इतने लोगों ने खुले दिल से सराहना की है....आज हम सब जिस मोड़ पर हैं....शायद यही कसक सभी के दिल में है..और सभी को चाय के दो प्यालों में बारिश की बूँदें टपकती दिखाई देने लगीं हैं......!!
    इस भावपूर्ण रचना के लिए लिए बधाई...!!

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  98. वो तन्हा चल रही थी जीवन के सफ़र में ,
    धूप में छाँव को खोजते हुए,
    बारिश की बूदों में भीगते हुए,
    ठंड में कोहरे से लड़ते हुए,
    चलते-चलते राह में पड़ा एक कारवां,
    जहाँ मिला एक अजनबी बन कर उसका साथी,
    पहले हुयी दोस्ती फिर प्यार,
    कुछ खट्टे-मीठे पलों से बन कर,
    यादों का एक सैलाब हुआ तैयार ,
    अचानक जीवन के समुन्दर में एक ऐसा उफनान आया,
    उन-दोनों को जुदा करने एक गजब का तूफान आया,
    सर झुका कर बोला वो, भूल जाओ मुझे तुम साथ था बस इतना हमारा,
    यह सुन कर टूट चुकी थी वो जैसे टूटता है कोई तारा,
    उसकी लड़खड़ाती जुबान ने उस लड़के से फ़रमाया,
    भूल नहीं पाऊँगी तुम्हें, तुम बिन जी भी नहीं पाऊँगी,
    ऐसा नहीं है वाई मेरे कि मै तुम्हें कभी भी याद ही नहीं आउंगी,
    पलकें भीगती गयी, होंठ कापते गये, उस बेजुबाँ दिल के सपने बिखरते गये,
    रब रूठा तभी प्यार छुटा और चूर-चूर हो गये सारे अरमाँ,
    ये कोई झूटी बात नहीं ये दो-दिलों की है मोहब्बत की है दास्ताँ,

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  99. HELLO VIJAY JI
    AAPKI IE KAVITA FUL,CHAY OR BARISH KA PANI MAINE 5 BAAR PADI.MUJHE BAHOT PASAND AAYI MUJHE AISA LAGA KI AAPKI KAVITA KUCH-KUCH MERI LIFE SE MILTI JULTI HAI...MAINE BHI APNI KHUD KI LIKHI EK KAVITA AAPKE BLOG COMMENT ME POST KI HAI JO AAPKI KAVITA KI THIK VIPREET HAI....MAI DIL SE KAH RHI HU AAPKI KAVITA KI EK-EK LINE MUJHE BEHAD PASAND AAYI...

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  100. Good points you have shared in this topic and it's really well written post. Thanks a lot for sharing this informative post here

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  101. भावुक और ह्रदयस्पर्शी.
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  102. कितने ही मोड अजनबी बनें
    कितनी ही ख्वाहिशें दम निकालें
    और चाहे चाय के कप दो हों
    और उनमे चाहे कितना ही
    पानी भर जाये
    देखना प्यार हमेशा छलकता है..

    nice...

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  103. That's beautifully written! Reminds me of the movie 'Ijaazat'.
    I have written a post about it in my blog
    http://gulzar101.blogspot.com/2011/09/chhoti-si-kahaani-se-ijaazat.html

    Hope you like it :)

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  104. aur wo chali gai.
    bahut hi acchi kavita

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  105. vijay ji bahut hi achhi kavita hai....

    aapke blog pe pehli baar ayi hun....aapne mera blog padha uske liye shukriya, ab aapko follow karenge :)

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  106. Email :

    vijay ji, thank you so much for the comment and visit...

    the poem has so much of meaning, depth and a story that reflects everyone's life

    regards,
    chintan

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  107. Aah! Bahut bhavuk kar denewali rachana hai!

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  108. THE RECURRENCE
    After a long gap
    We met again
    We were destined to it.
    As the very process.....
    Of meeting and parting,
    Parting and meeting
    Was written on every wall.

    When we met
    We found
    Our memories have taken a heavier toll
    On us than our age.

    Now,we weren't what we were
    - Hide quoted text -
    At the time of separation
    (The present was not like the past.
    We were what we weren't ever.

    You and I
    Kept watching each-other
    For long
    Trying to find the second end
    (With a sense of eternity,)
    Perhaps we were shocked,
    Or,overwhelmed
    By the sudden burst of emotions,
    And trying to make dams of lids
    For our over-brimming tears.
    Then at once
    It flashed through my mind
    We hadn't looked so intently at each-other so long
    Even at the time of our first meet
    I was a bit confused
    As to who should we blame
    Time or life?
    ....Our lips were tight......

    There was tree
    With two red flowers on it
    In the hotel ground
    Sitting whereunder like before
    We asked for tea.
    As usual it was brought
    In two white cups
    Filled with colour of life.
    We started making sips
    And talked non-sense
    To get some sense out of it,
    "How are you and how is life going?" etc.
    Meaningless question's
    Baseless answers.
    Every question had the same answer,
    "All is well".

    Off and on
    we were looking back
    As if looking for someone behind
    (Though who I always wanted to see was sitting before me).
    Infact, we were foolishly trying to hold
    Our tars back.

    After a long silence
    I dared to ask,
    "Do I still come in your dreams."
    With a faint smile on your face
    you said, "No, now not."
    I didn't know
    Whether it was true or false.
    You asked in the same manner,
    "Ever felt my absnce,
    Or got busy in the world around."
    "It's a matter of heart", I softly said.

    I asked, "Do you remember everything ?"
    You said, "yes."
    You looked at me with a question in your eyes,
    "And you ?"
    I replied, " yes, I still remember everything"
    Infact,I didn't forget anything.
    Not even you. Never.
    Both of us wept silently,
    Tears rolled out of our eys.

    Suddenly,
    Dark clouds covered the sky,
    And it started drizzling.

    I wanted to save you from the rain
    By taking you under the shade
    So, I lent my hands to you
    With a glimpse of hesitation in your eyes
    You gave your hand in my hand
    That you left once
    At an unknown turn.
    Time played pranks with me,
    Several times.

    You were standing by my side
    Rain was heavily pouring down.
    I asked you, " Do you remember the rain?"
    "Which one ? " you grew slightly interrogative.
    I Said, " That one in the old city,dear."
    You said, "We never got drenched in the rain."
    With a smile on my face I said,
    "Let us dance in the rain, but once."

    After some time you said, " Now I'll leave"
    The clock stopped ticking for me.
    I saw drops of water falling
    From the flowers of the tree
    In the cup of tea
    And the rain water filling it by and by.

    I implored, " Please,don't go now."

    You were mature enough
    And it was impossible for you
    To live in the world of love
    As you never knew
    How relations thrive.

    You impatiently said,
    " No! Not now.It's too late."
    And you left.

    I came out
    And kept watching you go
    Till you reach the turn of the road.
    I was geting havily drenched ...
    You turned your face,looked at me
    And went away

    I stood there like a statue
    And kept watching my tears
    Mingling with the drops of rain

    When I looked back
    There was none
    At the end of the turn.

    The petals of the flowers have fallen
    The cup of tea was full of rain water,
    And so was the life.

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  109. मैंने आपकी यह कविता अभी -अभी पढ़ी .तारीफ के लिए शब्द नहीं है .सच को उसी तरह लिख पाना मुश्किल होता है ,पर आपने तो यह कर दिखाया ,बधाई

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  110. बहुत ही बढ़िया और गहन भाव प्रस्तुत करती कविता।

    सादर

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  111. bahut hi gahanabhibyakti.shabdvihin kar diyaa aapki rachanaa ne.main phali baar aapke blog per aai hoon aur aapki prasanshak ban gai hoon.aap bahut hi achcha likhte hain aapko bahut badhaai.mere blog per aane ke liye shukriyaa.meri nai post bhi aapke sandesh ka intajaar kar rahi hai.aaiye aur apne vichaar se mujhe avgat kariye.aabhaar.

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  112. vijay ji, bahut hi sundar aur saral bhaasha mein likhi hui aapki ye kavita dil ko chhoo gayi. kavita padhte waqt meri aankhon ke saamne woh sab baatein chali ja rahi thi' jo aapne likhi iss kavita mein. bahut hi sundar. nihaayat hi saral par poori tarah se gehraayi mein lipt. :) aapka ek preshak

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  113. बहुत खूबसूरत , नाज़ुक , रूमानी और उदास कविता . दिल छू गई .

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  114. bahut hi khoobsurat rachna, hriday ko chhoo gayi, ek kasak, ek dard sa de gayi.

    Dhanyawad Rajivji ka jinke angreji roopantaran ne yahan tak pahunchaya.

    shubhkamnayen

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  115. एक झूठा सा जवाब
    सब ठीक है

    बहुत खूब विजय भाई - सफलता से अपने मन की बात कह गए आप

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    http://meraayeena.blogspot.com/
    http://maithilbhooshan.blogspot.com/

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  116. बहुत सुंदर, बिलकुल चित्र सामने आ गया।
    एक अंग्रेजी गाने की पंक्तियां याद आ गईं...
    its must have been love but its over now, its must have been good, but I lost is some how.

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  117. विजय जी
    नमस्कार
    आप मेरे ब्लॉग तक आये.,....मेरी नज्मों को दिल से पड़ा ...समझा और सराहा ...तह ए दिल से शुक्रिया.....माफ़ी चाहती हूं...जवाव देने में जरा देरी हों गयी ....आज आपकी कविता पड़ी ....
    "फूल , चाय और बारिश का पानी".........ह्म्म्मम्म
    बहुत बढिया....उम्दा...खुद हीही खुद इक पहाड़ी सामने आ जती है....हरी भैर.....जहां दो कप चाय के बारिश में भीगते दिखते हैं............भावनाओं का सीलापन बहुत अच्हे तरीके से उतरा है आपने कविता में
    अपनी कविता तक पहुँचाने के लिए शुक्रिया

    Take care

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  118. आपकी हर रचना अहसास से लबरेज होती है और जिंदगी के कुछ दृश्य दिखाती है
    बहुत सुंदर मन को भीगती हुई रचना फूल सी झड जो गयी निगाहों में

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  119. मैं बाहर आ कर तुम्हे मोड़ तक देखता रहा
    मैं भीग रहा था जोरो से..
    तुमने मुड़कर देखा मुझे मोड़ पर ;
    और चली गयी .

    दिल को छू गई

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  120. दिल की बात बड़े रूमानियत से कह दी. दिल ही तो है, मानता नहीं.

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  121. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  122. अब आपका ब्लोग यहाँ भी आ गया और सारे जहाँ मे छा गया। जानना है तो देखिये……http://redrose-vandana.blogspot.com पर और जानिये आपकी पहुँच कहाँ कहाँ तक हो गयी है।

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  123. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.

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  124. वक्त ने किया क्या हसीं सितम.....

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  125. Rec. by email :from MS.Dipti Gupta

    एक भावप्रवण रूह में उतर जाने वाली कविता.....!
    बधाई ! दीप्ति

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  126. recd. by email : Shri Shyam Manohar pandey.

    apki kavita acchi lagi.dhanyavad.
    shyam manohar pandey

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  127. Recd. By email : Bhupendra Kumar Dave

    barish se bhara pyala phool to khilayega
    kabhi to voh phir se chaay pe bulavega.

    Bas yahi kamnayon ke saath.
    Bhupendra Kumar Dave

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  128. विजय जी बहुत ही मार्मिक दिल को छू लेने वाली कविता के लिए बधाई...और हां एक बात और काश आपने उसकी भी बात सुन ली होती...कोई तो मजबूरी रही होगी...गुंजन गोयल ने बहुत सुन्दरता से उस रचना का जबाव दिया है......शायद वे भी इस दर्द को बखूबी समझ रही हैं......

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  129. Really very deep & great post sir with gr8 inner feelings to take a gr8 example of two cup of tea ......


    really very beautiful thought sir .

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  130. Vijay ji, bahut khuub... yakin maniye aapki iss kavita ki ek ek line mano esi lag rhi thi jese yeh meri khud ki kahani ho... aapki yeh kavita dil ki gehrai mein uttar jati hai aur wo bhi iss kadar ki hamesha wahi per aapna ghar bnale... atni achi kavita post karne ke lieyh sukriya .

    Ruchi Rai

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  131. aahaaa....yahii thi wo rchnaaa...ik kavita..ikkahaani...pehale bhi pdhii thi...aaj fir pdhi........aur wahii aandnnd ayaa jo..pehale aayaa thaa...hmm...bahut pyaarirchnaa

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  132. बेहद सुंदर और अपनी सी लगी आप कि यह रचना

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