Monday, February 10, 2014

::: मन-मंथन की दुःख गाथा ::: अपनी बात – part III :::


मन कुछ ख़राब सा है , आजकल कुछ ज्यादा ही रहने लगा है . मैंने अपने उस फोल्डर पर नज़र डाली है जिसका नाम था “unfinished stories & poems” . देखा तो करीब ३५ कहानियो के ड्राफ्ट थे , जिन्हें शुरू किये हुए करीब २ साल हो रहे थे. कुछ दिन पहले एक नयी किताब भी लिखना शुरू किया था खतो पर और करीब १०० से कविताएं थी , जो लिखकर भी अधूरी ही थी. मैंने सोचना शुरू किया कि क्या ये सब कुछ अधुरा ही रहा जायेंगा . क्या मेरा एक छोटा सा जीवन पर्याप्त है; मुझमे मौजूद विविधताओं को जीने के लिए ?

सोचता हूँ कि कुछ कविताएं लिखू फिर मर जाऊं या कुछ कहानियाँ बुन लूं ,फिर मर जाऊं या एक उपन्यास जो पिछले १५ सालो से लिखने की सोच रहा हूँ वो ही लिख लूं फिर मर जाऊं. दो –तीन किताबे लिख लूं और फिर दुनिया से चला जाऊं .

लिखना और मरना और जीना सब साथ साथ चल रहे है . कुछ लिखता हूँ तो लगता है जी गया , और फिर अगला ही पल मृत्यु का होता है . जीवन की कई राहो पर एक साथ चलना भी कठिन ही होता है . और फिर मैं तो शब्दों का और सपनो का सौदाकार हूँ .......!!!

कुछ दिन पहले कुछ नए closeup लेंस खरीदे ताकि और फोटोग्राफी कर सकूँ. वो सब वैसे ही रखे है . जिसे शूट करना चाहा वो मिला ही नहीं !!! एक नयी पेंटिंग शुरू की Nefertiti – The queen of Egypt वो भी अधूरी ही है . बहुत सारी किताबे खरीद ली ताकि और पढ़ सकू , ताकि मैं खुद कुछ और अच्छा लिख सकू ..लेकिन वो बस कुछ पेज ही ........ और फिर सब रुक गया है ....सब कुछ उलझा हुआ है ... या यूँ कहू कि सब कुछ उलझ सा गया है .

कितनी सारी lounge music DVDs सारी दुनिया से मंगा लिया है . संगीत ही जीवन है मेरा ... उन्हें भी पूरा नहीं सुन पा रहा हूँ एक ट्रैक सुनता हूँ ,फिर MTV coke studio पर चला जाता हूँ फिर soft ballads फिर जगजीत की गज़ले .... और फिर कोई jazz track या बॉब मारली.. फिर देवा प्रेमल ....... बस न जाने क्या क्या .... अभी किसी से दोस्ती हुई तो उसने बताया कि उसे ३७ इंस्ट्रूमेंट्स आते है बजाना . मैं अवाक रह गया हूँ ....... और मुझे सिर्फ drums.... !!!

कैसी भटकन है ..कैसी उलझन है .. क्या हम सब इसी तरह जी रहे है क्या ...या सिर्फ मैं ही इन लहरों से लड़ रहा हूँ .

सब कुछ ठहरा हुआ सा है ...रुका हुआ सा है ...

एक और फोल्डर है मन में बसा हुआ ..... उसमे पता नहीं ....क्या क्या भरा हुआ है .....उसे कब खाली कर पाऊंगा ये बता पाना ही असंभव है .

१५ दिन की मेहनत से ‘मानवता’ पर एक कविता लिखी , उस पर ५ कमेंट मिलते है . ऐसे ही ५ मिनट में कोई प्रेम-विरह की नज़्म लिखता हूँ तो उस पर ४० कमेंट आते है . दुनिया क्या चाहती है ....

फेसबुक एक और तमाशा है . मन एक झूठी आशा और निराशा में यहाँ आता है और पता नहीं क्या क्या सोचता है . जिनके प्रोफाइल को मैं देखता हूँ ; मैं उनके जीवन में सिर्फ नाम ही हूँ .. न्यूज़ फीड में दुनिया भर का शोर ! जाने क्या क्या वाही –तबाही !! लोग कितना नकली जीवन जीते है न .

एक नौकरी है जो पता नहीं मुझे कहाँ ले जा रही है . पिछले बरस professionally और financially मैं जो collapse हुआ , बस पूछो मत ..बिमारी में घर बिक गया .सब कुछ ख़त्म सा हो गया , मुझमे अगर मेरा अध्यात्म न होता तो पता नहीं मैं कैसा संभल पाता . जीवन अब कहाँ जा रहा है .. समझ ही नहीं आता है .

समय – शब्द - चित्र - रंग - मौसम - रात - दिन – आना – जाना –हंसी और आंसू ...ज़िन्दगी करीब करीब इन्ही टुकडो में बंटी हुई है . और ये सब टुकड़े शब्द बनकर उभरते है .

चुप रहता हूँ तो भीतर का शोर आंसू बन जाते है . बोलता हूँ तो बाहर का शोर दर्द बन जाता है. जिनसे बोलना सुनना चाहता हूँ वो बात नहीं करते और जो मुझसे बाते करते है वो दुनिया की बाते करते है .

लोगो को मैं कितना हंसाता हूँ , खुद हँसे जाने कितने दिन हो गए !

किसी को चाहना भी एक दुःख का कारण ही है . बहुत से दुःख हमारे खुद के द्वारा ही उपजाए होते है . अपेक्षा और उपेक्षा के मध्य जीवन का जीना होता है .

एक दिन सब कुछ ठहर जायेंगा ..हमेशा के लिए ! मैं खुद ही ख़ामोशी को अपना लूँगा .... फिर कुछ दिनों बाद फिर से लिखना शुरू करूँगा...जब मन शांत हो जाए. अगर हो जाए तो !

विजय

5 comments:

  1. ज़िंदगी में कभी कभी ऐसा होता है...मन शून्य हो जाता है और कलम सूख जाती है...आशा बनी रहे कि अंतस के भावों को फ़िर अभिव्यक्ति मिलेगी...

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  2. काश आप अपनी सारी आशायें पूरी करें। एक पाठक के रूप में हम भी लाभान्वित होंगे। हम भी अपने फ़ोल्डर देखकर ऐसी ही आह भरते हैं।

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  3. kitni sateek abhivyakti hai hriday mein uthati aandhi ki...'apekchha aur upekchha ke beech jeevan jeena hota hai' sach hi to hai.. ati sundar..

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  4. मन की उलझन कभी सुलझेेगी नहीं ,हमेशा भटकाती रहेगी .जीवन की अवधि सीमित है जो करना हो कर डालिये .कर्म में विश्वास कर संयत हो कर जुट जाइये कुछ न कुछ हासिल ज़रूर होगा .

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  5. ज़िंदगी में कभी कभी ऐसा होता है

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