Thursday, February 27, 2014

मैं, वो और मोहब्बत !


उसकी सोच ये कि,
उसने मुझे सिर्फ आशिक समझा;

जबकि मुझे ये हौसला कि,
मैं इंसान भी बेहतर हूँ !

उसको ये फ़िक्र कि
जमीन और ज़माने का क्या करे;

जबकि मैं ख्वाबो और
आसमान की बाते करता रहा !

उसने मेरे और अपने बीच
बंदिशों के जहान को ला दिया;

जबकि मैं अपने
इश्क के जूनून से फुर्सत न पा सका !

मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
इसका गम ज़ियादा हुआ !

पर उम्मीदों के दिये
मैंने अब भी जलाए रखे है

तुम्हारे आने तक
उन्हें बुझने न दूंगा ;
ये वादा रहा !

तुम बस मिलो तो सही !
फिर एक बार !!!

© नज़्म : विजय

12 comments:

  1. कोमल भाव लिए सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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  2. Bahot sunder rachna ki hai intezar ki....

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  3. sudar nazm ukeri hai apne!
    bdhayi swikaren...

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  4. प्रेम के संवादीय सुर, सुंदर रचना।

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  5. कल 02/03/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. साधू साधू/ दिल से लिखी रचना, दिल तक पहुँचती हुई...

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  7. महसूस करता मोहब्बत शायद हो न पाएगी ,
    इसका इल्म थोडा सा मुझे भी था;

    पर उसने मुझे चाहने की कोशिश ही न की,
    इसका गम ज़ियादा हुआ !
    सुन्दर नज्म

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  8. क्या बात है सप्पती जी, आप बस उम्मीद का दिया रोशन रखिये वे आ जायेंगी। बहुत सुंदर कविता।

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  9. सुन्दर पोस्ट.....
    आप को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हास्यकविता/जोरू का गुलाम

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  10. सुन्दर पोस्ट.....बहुत बहुत शुभकामनाएं...

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  11. Bahut sundar rachna..badhaayi :)

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  12. बहुत सुंदर भाव....उम्मीद का दीया बुझने ना पाये!!

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