Friday, July 25, 2008

शमशान

आज मैं जब शमशान गया
तो देखा , वहाँ चार कब्रें बनी थी
दो मेरी वाली , दो तेरी वाली
मैं काफी देर तक खड़ा रहा
शमशान में एक जिस्म बन कर
फिर मैंने वहां के फ़कीर से पुछा ,
कि ये कब्रें किसने बनाया ,
फ़कीर ने एक उंगली उठा कर कहा
खुदा ने और उसकी बनाई हुई तकदीरों ने
मैंने ठहर ठहर कर पुछा ,
इन कब्रों पर मट्टी किसने डाली
फ़कीर ने कहा , वक्त ने
मैं बड़ी देर तक चुप रहा
फ़कीर ने मुझसे पुछा
तुम कौन हो?
मैंने रोते हुए कहा..
मैंने ही तो इन कब्रों को खोदा है....

2 comments:

  1. Dear Vijay Kumar your this Kavita is really superb zindgi ki kuch unchuye pehlii ujagar karti aapki yeh kavita waqai bahut acchi hai particularly mujhe bahut acchi lagi is kavita aur baqi kavitaon ke liye mein aapko
    KHIRAZ-E-TEHSEEN pesh karta hoon


    Ur frnd
    FAIZAN FAIZ

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  2. avaak hoon, lafz nahi hain, jazbaat ki zubaan toh sab aapne hi kardi bayaan...ek goonj pad rahi hai kaano mein..ek meri bhi sada hai usme!

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