Monday, August 13, 2012

" शायर "


सुबह से शाम , और शाम से सुबह ;
ज़िन्दगी यूँ ही बेमानी है दोस्तों ....

किसी अनजान सपने में ,
एक जोगी ने कहा था ;
कि, एक नज़्म लिखो तो कुछ साँसे उधार मिल जायेंगी ...

शायर हूँ मैं ;
और जिंदा हूँ मैं !!!

आसमान के फरिश्तों ;
जरा झुक के देखो तो मुझे....

मुझ जैसा शायर सुना न होंगा ,
मुझ जैसा इंसान देखा न होंगा ...

खुदा मेरे ;
ये साँसे और कितने देर तलक चलेंगी !!

7 comments:

  1. जब तक दिल में गज़ल है...और कलम चल रही है,साँसें चलती रहेंगी..

    सादर
    अनु

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  2. बेमानी ज़िन्दगी ही सही शायरी तो हैं न .. ख़ुदा को रश्क होता है तो होने दे..

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  3. बहुत सुन्दर भाव

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  4. Bhot shandar sir.. Ye me spni site par daal raha hun,. :)

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  5. वाह बहुत खूब ...

    किसी की दुआयों में भी इतना असर ना था कि
    कुछ पल का सुकून मिलता मुझे ,उसकी पनहा में |...अंजु (अनु)

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  6. बहुत ही अच्छी.... जबरदस्त अभिवयक्ति.....वाह!

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  7. बहुत गहरी बात कही है..

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