Friday, August 7, 2009

झील


आज शाम सोचा ;

कि ,
तुम्हे एक झील दिखा लाऊं ...
पता नही तुमने उसे देखा है कि नही;
देवताओं ने उसे एक नाम दिया है….

उसे जिंदगी की झील कहते है...

बुजुर्ग ,अक्सर आलाव के पास बैठकर,
सर्द रातों में बतातें है कि,
वह दुनिया कि सबसे गहरी झील है
उसमे जो डूबा , फिर वह उभर कर नही आ पाया ...

उसे जिंदगी की झील कहते है...

आज शाम , जब मैं तुम्हे ,अपने संग ,
उस झील के पास लेकर गया ,
तो तुम काँप रही थी ,
डर रही थी ;
सहम कर सिसक रही थी..
क्योंकि ; तुम्हे डर था;
कहीं मैं तुम्हे उस झील में डुबो न दूँ ....

पर ऐसा नही हुआ ..
मैंने तुम्हे उस झील में ;

चाँद सितारों को दिखाया ;
मोहब्बत करने वालों को दिखाया;
उनकी पाक मोहब्बत को दिखाया ;

तुमने बहुत देर तक, उस झील में ,

अपना प्रतिबिम्ब तलाशती रही ,
तुम ढूंढ रही थी॥

कि शायद मैं भी दिखूं तुम्हारे संग,
पर ईश्वर ने मुझे छला…
मैं क्या, मेरी परछाई भी ,

झील में नही थी तुम्हारे संग !!!

तुम रोने लगी ....
तुम्हारे आंसू ,
बूँद बूँद खून बनकर झील में गिरते गए ,
फिर झील का गन्दा और जहरीला पानी साफ होते गया,
क्योंकि अक्सर जिंदगी की झीलें ,
गन्दी और जहरीली होती है ....

फिर, तुमने मुझे आँखे भर कर देखा...
मुझे अपनी बांहों में समेटा ...
मेरे माथे को चूमा..
और झील में छलांग लगा दी ...
तुम उसमें डूबकर मर गयी ....

और मैं...
मैं जिंदा रह गया ,
तुम्हारी यादों के अवशेष लेकर,
तुम्हारे न मिले शव की राख ;
अपने मन पर मलकर मैं जिंदा रह गया ...

मैं युगों तक जीवित
रहूंगा और तुम्हे आश्चर्य होंगा पर ,
मैं तुम्हे अब भी ;
अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
और हमेशा देखते रहूंगा..

युग से अनंत तक ....
अनंत से आदि तक ....
आदि से अंत तक....
देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...


87 comments:

  1. मौन हूँ शब्द नही है ........

    ReplyDelete
  2. ye to maine pahle bhi padhi thi aur shayad comment bhi kiya tha.

    jab naam hi jheel de diya to uski gahrayi kaise nhi hogi........na jaane kahan se itna dard ,itni gahrayi late hain.........aisa lagta hai jaise jheel mein hi doobkar ye kavita likhi ho.
    zindagi ki talkh sachchiyon ko bayan karti.......lajawaab,amazing.

    ReplyDelete
  3. dil ko choone wali rachana
    behad khoobsurt



    bahut dino baad apko apne blog per dekhker khushi hui

    ReplyDelete
  4. Vijay ji, jheel ki khubsoorat gahrayian aachchhi lagien. jab (blog ki)is duniya mei aayi thi to andaaz nahi tha ki kitne khubsoorat aur bhavuk jazbaato se mulakat hogi liken jaise-jaise safar aage barh raha hai , khushnaseebi se bahut sundar saugaatein mil rahi hai . Shukriya khuda ko aur aap sabka, jo mujhe alfaazoin ke zariye jud rahe hai. aaj pahli baar aapki kavita ki duniya mei kadam rakha . sab kuchh bahut hi sundar laga. Apki BITIYA ne to mujhe rula diya. Sach kahu to Jheel se pahle uski tareef karna chahti hu.Poori ummeed hai, ab shabdo ke zariye ye judaav bana rahega...!
    Regards...

    Pratima Sinha from MERA AKASH

    ReplyDelete
  5. बहुत ही कलात्मक रचना.....सुन्दर अभिव्यक्ति. मेरे ब्लाग पर आने और टिप्पणियों द्वरा प्रोत्साहित करने की लिये बहुत बहुत आभार.

    ReplyDelete
  6. बहुत अधिक प्रभाव महसूस कर रहा हूँ इस कविता का मन पर । आपके रूपक का प्रभाव भी निरख रहा हूँ ।
    कविता खूबसूरत है । आभार ।

    ReplyDelete
  7. झील सी गहरी बातें कहती यह सुन्दर रचना। झील और जिदंगी क्या बात है। ऐसे ही अपने अनुभव लिखते रहिए विजय जी।

    ReplyDelete
  8. मैं युगों तक जीवित
    रहूंगा और तुम्हे आश्चर्य होंगा पर ,
    मैं तुम्हे अब भी ;
    अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
    और हमेशा देखते रहूंगा..
    युग से अनंत तक ....
    अनंत से आदि तक ....
    आदि से अंत तक....
    देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...



    bahut sundar bhav .badhai!

    ReplyDelete
  9. Hello!

    Very beautifully written!
    Really liked the way you linked each episode with each other.

    And last but not the least, thanks for your nice comments on my blog.

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

    ReplyDelete
  10. ज़िन्दगी की झील....अच्छा प्रयोग है...अति भावुकता लिए हुए रचना है ये आपकी.
    नीरज

    ReplyDelete
  11. achchhi samvednatmak rachna. badhai.

    ReplyDelete
  12. अच्छी संवेदनायें

    शब्दों की अगर थोडी और किफ़ायत करें तो अभिव्यक्ति और बेहतर होगी

    ReplyDelete
  13. बेहतरीन रचना

    ReplyDelete
  14. Vijay Bhai

    Ek bhavuk kavita ke liye badhaai. Vaise proof reading kee zaroorat mehsoos huyee.

    tejendra sharma

    ReplyDelete
  15. waah bahut hi gehre ,marmik bhav,zindagi ki jhilka ye drapnab hi bahut achha laga,badhai.

    ReplyDelete
  16. विजय भाई ,
    जिंदगी और झील का साम्य अच्छा किया गया है इस कविता में -
    प्रणय के भावावेश से ही कई कविताओं का जन्म होता है .....लिखते रहें,
    शुभकामना
    - लावण्या

    ReplyDelete
  17. Sir..............is kavita ke baare mein kya kahoon......... aapne to speechless kar diya hai mujhe............. Om Arya ji se main bilkul sahmat hoon....... pata nahi kyun mujhe aisa lagta hai ki OM ARYA ji wahi likhte hain..........jo main kahna chahta hoon..... chahe wo kavita ho, ya bhaavnayen ya phir comment......

    AApne zindagi ko itne achche se define kiya hai ki ......... mujhe yeh lag raha ki yahi to main kahna chahta tha...........

    aap pen se likhte hain ya phir dil ki syaahi se? mujhe bataiyega zaroor.........

    Main aapke call ka wait kar raha hoon.......

    Thanx for sharing........

    ReplyDelete
  18. बुजुर्ग ,अक्सर आलाव के पास बैठकर,
    सर्द रातों में बतातें है कि,
    वह दुनिया कि सबसे गहरी झील है
    उसमे जो डूबा , फिर वह उभर कर नही आ पाया ...उसे जिंदगी की झील कहते है...


    सुन्दर अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  19. sach me bahut sundar kavita hai .kafi gaharai liye huye hai .

    ReplyDelete
  20. बेहतरीन सुन्दर रचना...

    ReplyDelete
  21. आप की कविताओं में ऐसा क्या है, जो मन बरबस फ़िसल जाता है. इसी झील में , जिसमें शायद स्वच्छ , निर्मल मन की भावनाओं के कमल खिलते हैं, जो इतनी गहरी है, मग्र डूब जाने को दिल करत है.

    शायद आध्यात्म ही इसका कारण है.

    ReplyDelete
  22. bahut dil tak utri hai apki baat..

    ReplyDelete
  23. badhiya prayog hai zindagee ka jhil ke saath bahot achhi lage aapki ye kavita.... gahare jajbaat ko darshaya hai aapne .... alaw waali baat vishesh roop se sarahniya hai , dhero badhaayee

    arsh

    ReplyDelete
  24. aankhon me mere neend ka bojhh bharaa hai lekin jab baanchne laga toh yun laga maano..baanchtaa hi jaaun ...

    aadarneey vijayji,
    bhai main toh kaayal ho gaya aapki medhaa ka ..........waah...
    kya baat hai ?

    zindgi ki jheel me uthne wali har lahar aur har lahar ke antar me hone wali halchal ko aapne itnee kaarigari se varnit kiya hai ki
    man abhibhoot ho gaya...

    badhaai
    badhaai
    badhaai !

    ReplyDelete
  25. Jindagee kee zeel kee tarah hee gaharee kawita. hum me se adhik tar to is jindagee ke zeel me doobe hee hote hain. sunder bhawbheenee kwita ke liye badhaee.

    ReplyDelete
  26. मैने भी देखी है यह झील - अकेले। कूदने या तैरने का साहस बनाता हूं और फिर भहरा जाता है वह साहस।

    बहुत सुन्दर बुनी है आपने यह कविता मित्र!

    ReplyDelete
  27. मैं तुम्हे अब भी ;
    अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
    और हमेशा देखते रहूंगा..
    युग से अनंत तक ....
    अनंत से आदि तक ....
    आदि से अंत तक....
    देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...


    बहुत गहरे विचार परोसे हैं आपने.. हैपी ब्लॉगिंग

    ReplyDelete
  28. वाह!वाह!वाह! सुंदर रचना ज़िन्दगी कि झील के बारे में।

    कविता का अंत बहोत ही भावनात्मक रहा।

    ReplyDelete
  29. आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
    सचमुच में बहुत ही प्रभावशाली लेखन है... वाह…!!! वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। बहुत सुन्दरता पूर्ण ढंग से भावनाओं का सजीव चित्रण... आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे, बधाई स्वीकारें।

    आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं। आप मेरे ब्लॉग पर आये और एक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिया…. शुक्रिया.
    आशा है आप इसी तरह सदैव स्नेह बनाएं रखेगें….

    आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

    …Ravi Srivastava

    ReplyDelete
  30. jheel si gahri kavita ke liye babhai...

    ReplyDelete
  31. wah.... उसे जिंदगी की झील कहते है... bahut umdaa kaavya ki rachna....

    ReplyDelete
  32. Ham sabhee aisee kisi,jheel'ki talashme rahte hain shayad!

    http://shamasansmaran.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    ReplyDelete
  33. sir, maine kabhi is jheel ke bare main nahi suna , shayad ye apki kalpana ki jheel hai jisme aap ne jeevan ko jheel saman liya hai ?
    par aap ki bhavna main main jaroor dub gai or laga ki shayad main bhi apni atma ki jheel main unhe dekti rahugi chahe vo saath ho ya na ho
    bhut ki achchhi rachna

    ReplyDelete
  34. nazm ko padhnaa...jheel ki gehraaii mei utarne jaisa hi mehsoos hua.....badee hi bhaavuk aur maarmik rachna hai .
    badhaaee .
    ---MUFLIS---

    ReplyDelete
  35. "JHEEL"........aapki kavita mai bahut GHERAEE hai.......bahut acha likha hai...must say very nice.....

    ReplyDelete
  36. आपने बहुत सुंदर कविता लिखी है।
    धन्यवाद।

    ReplyDelete
  37. मैं युगों तक जीवित
    रहूंगा और तुम्हे आश्चर्य होंगा पर ,
    मैं तुम्हे अब भी ;
    अपनी आत्मा की झील में सदा देखते रहता हूँ..
    और हमेशा देखते रहूंगा..
    युग से अनंत तक ....
    अनंत से आदि तक ....
    आदि से अंत तक....
    देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...देखता रहूंगा ...

    वाह्! लाजवाब भाव्! अति सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें!!

    ReplyDelete
  38. नज़्म वाकई बहुत ख़ूबसूरत है. आपकी पुरानी नज़में भी पढीं. आपकी शैली बहुत असरदार है.

    ReplyDelete
  39. और मैं...
    मैं जिंदा रह गया ,
    तुम्हारी यादों के अवशेष लेकर,
    तुम्हारे न मिले शव की राख ;
    अपने मन पर मलकर मैं जिंदा रह गया ...

    Bahut hee bhaavpurn rachna, bilkul antarman ko chhoti hui see. Badhai. Saath hee aapka "Yuva' par pahli baar aane ka swagat..

    ReplyDelete
  40. बहुत प्रभावशाली अभिव्यक्ति है. साधुवाद.

    ReplyDelete
  41. shabdon mein jitnaa kaha gaya hai usse kahin adhik kehti hai yeh rachnaa... behad khoobsoorat...

    ReplyDelete
  42. अत्यन्त सुंदर और दिल को छू लेने वाली रचना लिखा है आपने! आपका हर एक ब्लॉग लाजवाब है! बस मैं तो यही कहूँगी कि आपकी लेखनी को सलाम!

    ReplyDelete
  43. Jheel ki tarah gahre bhav hain is kavita me.Badhai.Haan ise thoda kasa ja sakta tha.

    ReplyDelete
  44. इस झील में आज हमें भी डुबो दिया आपने...
    वाह विजय जी...
    आपके शब्दों से आपकी सोच की गहराई का सहज ही अंदाजा होता है....
    आपका अंदाज अपने आप में अनूठा है...
    मीत

    ReplyDelete
  45. सुन्दर भावुक कविता है. झील और ज़िन्दगी का प्रयोग अनुपम है. झील की ही तरह भावों की गहराई भी है. साधुवाद.

    ReplyDelete
  46. वाह क्या कमाल की सोच ,और उससे भी सुन्दर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  47. शब्द कुछ ज्यादा पर भावनाएं बहुत सुंदर हैं...

    ReplyDelete
  48. Really its very nice poem sir.

    u r most welcome at my blog

    ReplyDelete
  49. बहुत खूब बढ़िया लगी आपकी यह अभिव्यक्ति .

    ReplyDelete
  50. विजय भैया, पहले तो यह बता दूं कि आपने फिर एक शानदार रचना से मन मोह लिया। वैसे मन तो आप पहले ही मोह चुके हैं। काश मैं भी ऐसा ही लिख पाता, लेकिन क्या करूं, हर आदमी विजय भैया नहीं हो सकता है न...

    खैर, क्षमा चाहूंगा कि मैं इतने दिनों के बाद आया ब्लॉग पर। सारी रचनाएं पढ़ डालीं मैंने, सभी एक से बढ़कर एक लगे। मैं असल में काम के सिलसिले में इधर-उधर गया हुआ था। इसलिए ब्लॉग देखने का साधन नहीं मिला। उम्मीद है कि आप इस मजबूरी को समझते हुए क्षमा करेंगे।

    ReplyDelete
  51. वाह आपकी कविता ने तो आत्मिक सुख देने वाली साबित हुई। सचमुच जिंदगी की गहराइयों का इतना सटीक विश्लेषण इतने कम शब्दों के माध्यम से कर पाना कठिन है। बहुत खूब। इसी तरह लिखते रहे।

    ReplyDelete
  52. गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वरा ||
    गरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मे श्री गुरुवे नमः ||
    नमस्कार विजय जी देरी के लिए माफ़ी चाहूँगा ,, कारण वही वयस्तता का बहाना सच कह रहा हूँ इस कविता को मै तीन बार पढ़ कर निकल गया एक बार कुछ लिखा भी पर सायद नेट प्रोव की बजह से पोस्ट नहीं हुआ माफ़ी चाहूँगा ,,
    अब कविता के बारे में क्या कहूँ जिन्दगी के एक नए रंग को , जो होते हुए भी हम महसूस नहीं करते आप ने प्रदर्सित किया है और प्रेम की अनुपम अनुभूति कराई है मै तो नत मस्तक हूँ
    मेरा प्रणाम स्वीकार करे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

    ReplyDelete
  53. इतना दर्द कहा से लाते हो ...
    यह तो वाही लिख सकता है जिसने इसका अनुभव किया हो.
    amazing.

    ReplyDelete
  54. Umda prastuti...badhai.

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. "शब्द सृजन की ओर" पर इस बार-"समग्र रूप में देखें स्वाधीनता को"

    ReplyDelete
  55. हिला कर रख दिया आपने, इतनी गहरी झील की तो कभी कल्पना भी न की थी............

    सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई.

    ReplyDelete
  56. Vijay ji,

    Kripaya aap anyatha na len to ek baat kahne ki dhrishtta karun.......

    Hamare ek mitra hain,bahut bade ohde par hain,unhone ek baar kaha ki - ka batayen,ee sasur angreji se bade pareshaan hain...ab dekho na...sochne ki aadat hai,bhojpuri me...to pahle sochte bhojpuri me hain,fir uska roopantaran hindi me karte hain aur hindi me sochkar fir use angrejo me kahna padta hai to....itna roopantaran karte karte batwa me oo wajan nahi rah jata jo bhojpuri me kahte to rahta......


    to mujhe lagta hai,aapki bhavnayen jitni sundar hoti hain,chunki aapka hindi bhasha gyaan utna gahra nahi ki aap abhivyakti ke liye shabd chanay me bahut suvidha mahsoos karte honge.....
    maine aapki kavitayen angreji me padhi aur we mujhe hindi se bahut hi behtar lagin.....to mera aapko sujhaav hai ki abhi kuchh dino tak aap kavitayen angreji me likhen aur uska anuwaad kisi yogy hindi kavi se karwayen.....do chaar kavitaon ke anuwaad ke saath hi aap anubhoot karenge ki aapke bhavon me jo gahrai hai ,usi ke anuroop aapke shabd me bhi wah wajan aa gaya hai....

    Aapke hindi prem ke aage main natmastak ho jaya karti hun aur isliye dil se main chahti hun ki aap jaisa komal hriday kavi khoob likhe aur khoob sundar likhe,taki kai ahindi lekhakon kaviyon ko isse prerna mile...

    Aasah hai aap meri baton ko kinchit bhi anyatha na lenge.....mera uddeshy kewal ek hi hai ki aap jaise bhavuk kavi ke kriti ko paryapt samman mile....

    ReplyDelete
  57. बहुत भावुक और गहरी अभिव्यक्ती मन को स्पर्श करने वाली,बहुत-बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  58. बेहतरीन बहुत बेहतरीन रचना ,मज़ा आगया।
    आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
    रचना गौड़ ‘भार

    ReplyDelete
  59. तुमने बहुत देर तक, उस झील में ,
    अपना प्रतिबिम्ब तलाशती रही ,
    तुम ढूंढ रही थी॥
    कि शायद मैं भी दिखूं तुम्हारे संग,
    पर ईश्वर ने मुझे छला…
    मैं क्या, मेरी परछाई भी ,
    झील में नही थी तुम्हारे संग !!!

    aapki zindagi ki jheel ne sab ko iskadar khud mein sameit liya hai
    har aor sirf ghahrayi hi nazaar aati hai, har waqt ke ehsaas ko bakhubi neebhaya hai.

    padhte huye aise laga yeh chal chitr ki tarha, samne chal rahi hai. bahut pasand aayi aapi jheel
    apna khayal rakhain
    nira

    ReplyDelete
  60. बिखरे सितारे ! ७) तानाशाह ज़माने !
    पूजा की माँ, मासूमा भी, कैसी क़िस्मत लेके इस दुनियामे आयी थी? जब,जब उस औरत की बयानी सुनती हूँ, तो कराह उठती हूँ...

    लाख ज़हमतें , हज़ार तोहमतें,
    चलती रही,काँधों पे ढ़ोते हुए,
    रातों की बारातें, दिनों के काफ़िले,
    छत पर से गुज़रते रहे.....
    वो अनारकली तो नही थी,
    ना वो उसका सलीम ही,
    तानाशाह रहे ज़माने,
    रौशनी गुज़रती कहाँसे?
    बंद झरोखे,बंद दरवाज़े,
    क़िस्मत में लिखे थे तहखाने...

    Aapke intezaar me hain,ye 'bikharte sitare'! Kitna simte-samete jaa sakte hain?

    ReplyDelete
  61. नतमस्तक ! प्रणाम ,झील में कही खो गया हूँ

    ReplyDelete
  62. झील काफी खूबसूरत है।

    ReplyDelete
  63. aur main zinda reh gaya !!

    hum shayad choti choti si cheezein dekh kar hi zinda reh lete hain ...

    ReplyDelete
  64. विजय जी झील में तो मैं पहले ही कही खो चूका हूँ .............

    ReplyDelete
  65. hi... really a nice one... I cant even think of writing such a beautiful creation... I am grateful to you that you shared this with me .. Thanks

    ReplyDelete
  66. vijay ji 75 log bahut kuchh kah chuke is rachna ke bare men main to bas ek hi shabd kah sakta hun.

    ANUPAM.

    ReplyDelete
  67. aapne to jindagi ki jheel ki baaten kar din Vijay ji...
    ise sundar rachana se bhi sundar kah sakte hain...
    mohabbat to samandar hai n.. shayron se suna hai...to jindagi hamari vasundhara kyun nhi ban jati jo samandar ko bhi samet le...!!
    dhanyawad..
    apne blog ke shuruaat me hi aap jaise jindagi k geet gane wale kaviyon ke prashansha bol mile... prashann hun...
    abhi to ma gaurayya hun... aapki munder par jab jab baithun kuch vicharon ka dana pani de diya kisie taki mai apne jindagi me naye geet bana sakun..
    DHANYAWAD!

    ReplyDelete
  68. very beautiful poem. Bahut gehri hai ye jheel....

    ReplyDelete
  69. aapaki rachna ne dil choo liya sir...apane bahut achcha likha hai ...meri tarf se badhai ho ....

    ReplyDelete
  70. bahut khoob, मैं क्या, मेरी परछाई भी ,
    झील में नही थी तुम्हारे संग !!!

    ReplyDelete
  71. में अति सुन्दर - कथन में विश्वास नहीं रखता। कविता तो सुन्दर है, भावनात्मक भी; परन्तु भ्रामक तथ्य सहित--ज़िन्दगी अक्सर गन्दी व ज़हरीली नहीं होतीं--यदि वह देवताओं ने नाम दिया है तो??? " उसमें जो डूबा उभर कर नहीं आपाया" भी गलत बयानी है----ज़िन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ"
    डूब-डूब कर ही मज़ा आता है. बिखरे भाव कविता में नहीं होने चाहिये।

    ReplyDelete
  72. Sir
    your poem really carried me to a jheel
    , a jheel of life.
    I'm speechless,floating and trying to dive deep inside it.
    shabdo se hi apne charno par ik sparsh sweekar kar mujhe anugrahit karen.

    ReplyDelete
  73. विजय जी सच में बहुत ही गहरी है आपकी झील दिल को छू गई बहुत ही बेहतरीन

    ReplyDelete
  74. बहुत ही सुन्दर ......जिंदगी कि झील गहरी है ,पर डूबना भी पड़ता है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  75. bahut sundar rachna hai.........

    ReplyDelete
  76. VIJAY SIR THIS POEM IS TOO GOOD! DIL,DIMAAG AUR AATMAA KO CHHO GAYEE! AANKHEN BHI NAM KAR GAYI AAPKI KAVITA!
    PLEASE KEEP IT UP!

    ReplyDelete