Thursday, November 4, 2010

ओ मौला रे



ओ मौला रे
तेरे दर का रास्ता किधर है
मैं तो ढूंढ  लिया हर गाँव और हर  गली
पर तेरे बांहों का आसरा कहीं न मिला
ओ मौला रे ..............

बहुत किताबे पढ़ी
बहुत ज्ञानी मिले
पर कोई मुझे तुझ तलक
नहीं पहुंचा पाया
तेरे दर का रास्ता किधर है
ओ मौला रे................

चंद साँसे  और है बाकी
तेरा दीदार कर लूं
तो ये जहाँ छोड़ दूं
तेरे दर का रास्ता किधर है
ओ मौला रे ..............

कोई तो साज़ बजा
कोई तो नज़्म सुना
कोई तो गीत गा ले
तेरे दर को जानता हो कोई
ऐसा कोई परिंदा हो तो उसे भेज
तेरे ज़ेरेसाया अब फ़ना होना है
तेरे दर का रास्ता किधर है
ओ मौला रे ..............


8 comments:

  1. vijay bhaayi dil ki ajib tdpn he lekin aek farmula he dil me jhank lo molaa ke drshn ho jayenge maafi chaahta hun yeh mzaq he dipaavli mubark ho aapki prstuti alfaazon ki tdpn bhut khub lgi mubark ho . akhar khan akela kota rajsthan

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  2. बहुत खूब...
    दिवाली पर आपको और आपके परिवार को शुभकामनाएं...

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  3. ना तू ज़ुदा
    न वो ज़ुदा
    बस वक्त का
    है फ़ैसला
    इक करम
    फ़रमा ले
    कुछ निगाह
    झुका ले
    दीदार हो
    जायेगा
    तुझे तेरा
    खुदा मिल
    जायेगा

    दीप पर्व की असीम शुभकामनायें।

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  4. इस रचना को पढ़ कर आनंद आ गया विजय जी ! आपको दीवाली की शुभकामनायें !

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  5. आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं

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  6. वह सबको रास्ता दिखाता है, अलग अलग।

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  7. वो तो एक ही है बस उस तक जाने के रास्ते अलग अलग हैं ...........

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  8. सुंदर सी प्रस्तुती !

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