Saturday, February 14, 2009

पहचान


बादलों का एक टुकडा तू ,
अपने चेहरे पर लगा ले ...

कि ;
जब तू मुझसे मिलने आए तो
दुनियावाले तुझे देख न ले..
तुझे पहचान न ले...

अक्सर दुनियावालें मोहब्बत के चेहरों का खून करते है ..

9 comments:

  1. बहुत प्यारी रचना। धन्यवाद ।

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  2. सुंदर भाव लिए कुछ चंद शब्द अच्छे लगे

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  3. वाह ! वाह !!
    इतने कम शब्दों में
    इतनी गहरी बात कह दी आपने
    मुहोब्बत और ज़माने का
    सदियों से जो रिश्ता रहा है ,
    उसे बखूबी ब्यान किया है
    अपनी सुंदर कविता में .......

    विजय को
    लफ्ज़ों का जादूगर यूँ ही तो नही कहते . . . .
    बधाई ........
    ---मुफलिस---

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  4. दुनिया वालों ने देखी हो ना देखी हमने तो देख ली है। वैसे लगती है कैसी है?
    बहुत ही अच्छे भाव लिखे है आपने।
    सच दुनियावालें मोहब्बत के चेहरों का खून करते है।

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  5. दुनिया वाले मुहब्बत के चेहरे का खून करते नहीं, करते आए हैं.

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  6. aap ki pomes me bhut hi ghrai aur ek khab ko sochne pr mjbur kr deti hai..... thanks

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  7. विजय जी इस भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई...

    नीरज

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  8. BAHOT KHUB,CHHOTI RACHANA MAGAR GAZAB KA BHAV BEHAD UMDA SHAILI,KAVITA JAISE UNMUKTA GAGAN ME UD RAHI HO BAHOT HI KHUBSURAT RACHANA HAI BEHAD PRABHAVIT KARNE WALI.....


    AAPKA
    ARSH

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  9. बहुत खूब ...बधाई हो .

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