Friday, March 6, 2009

प्रियतमा


कौन हो तुम प्रियतमा ;
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

क्या रजनीगंधा के फूलों की हो सुगंध !
या फिर आकाश के मेघो की हो उड़ान !
या फिर हो पहली बरखा की सोंधी खुशबु !
या फिर मेरे हृदय की हो धड़कन !

कौन हो तुम प्रियतमा ;
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

रजनीगंधा के फूलों की बनकर सुगंध ,
मेरे सम्पूर्णता मे समाई हो तुम ;
अपने आपको ; मैं तेरी खुशबू मे ढुंढु ;
मेरे अंतर्मन की देवी हो तुम !!
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

आकाश के मेघो की उड़ान हो तुम ,
उमड़ उमड़ कर दिल पर छा जाती हो तुम
उमंग भरे वसंत का उत्सव बनकर प्रिये
हृदय के आँगन को सजाती हो तुम !!
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

तुममे है पहली बरखा की सोंधी खुशबु ,
मन की तपती भूमि पर बरसती हो तुम ,
हवा भी छुकर तुझे ; बहती है मंद मंद;
प्यार का कुवाँरा अहसास हो तुम !!
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

मेरे ह्रदय की धड़कन बनकर मुझे थामा ,
क्या इसलिए की मेरे पास हो तुम ;
या फिर क्योंकि मैं हूँ तुमने मग्न,
कहो न कि, मुझमे समायी हुई हो तुम !!
कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

कौन हो तुम प्रियतमा ;
कहो की ,तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

17 comments:

  1. कौन हो तुम प्रियतमा ;
    कहो की ,तुम मेरी हो प्रियतमा
    प्रियतमा को समर्पित सुन्दर रचना है विजय जी
    प्रियतम तो दरअसल है ही ऐसा जिसपर सब कुछ लुटाने को मन करता है, वो तो इनसब से भी बढ़ कर है

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  2. कविता में या तो

    बतलाना ही चाहिए

    या पूछना ही चाहिए

    पूछें भी खुद और

    बतलायें भी, यह

    विरोधी स्‍वर है।

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  3. bahot khub likha hai nayapan liye huye hai ,,, ek shanka hai kya sondhi jandh ka istemaal sahi hai? meri shanka ka samaadhan karen..anyatha naa len...


    arsh

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  4. बहुत ही बेहतरीन। सुन्दर भाव लिये हुए रचना। कई बार पढी।
    क्या रजनीगंधा के फूलों की हो सुगंध !
    या फिर आकाश के मेघो की हो उड़ान !
    या फिर पहली बरखा की हो सोंधी गंध !
    या फिर मेरे हृदय की हो धड़कन !

    कौन हो तुम प्रियतमा ;
    कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा

    खूबसूरत।

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  5. रजनीगंधा के फूलों की बनकर सुगंध ,
    मेरे सम्पूर्णता मे समाई हो तुम ;
    अपने आपको ; मैं तेरी खुशबू मे ढुंढु ;
    मेरे अंतर्मन की देवी हो तुम !!
    कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!

    बेहतरीन कविता विजय जी ढेरों बधाईयां

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  6. Vijay Bhai

    Aaj kee kavita kewal Satta Virodh, Bhrishtachar aur Negative feelings kee kavita ban kar reh gayee hai. Prem jaisee shashvat bhaavna bilkul ghayab ho gayee hai. Prem, khoobsoorti aur Desh - sabhi kavita se rishta tod chukey hain. Aise mein aap ne Priyatma ko sambodhit kiya hai. Badhaai.

    tejendra sharma
    London, Katha UK

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  7. bahut hi gahan bhav liye hai kavita.........ek premi ki chir-parichit pukar.
    sab kuch to dhoondh liya hai aapne priyatama mein..........uske har roop ko ,uske har dhang ko jaise shabdon mein bandhne ki cheshta ki hai aapne magar tab bhi wo hath nhi aati ho kuch aisa ahsaas lag raha hai.

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  8. मेरे सम्पूर्णता मे समाई हो तुम ;
    अपने आपको ; मैं तेरी खुशबू मे ढुंढु ;

    bahut bhadhiya lage yah bhaav bahut sundar likha hai apne adbhut laga

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  9. bura mat maniye vijayji,
    कौन हो तुम प्रियतमा ;
    कहो की ,तुम मेरी हो प्रियतमा,
    in panktiyo me virodhabhaas he,,avinashji ne sahi likha he..
    darasal pryatama he to koun ho.. fir kaho ki meri ho...kese???? ho sakta he..
    kintu kavi man kuchh bhi likh sakta he jo use likhna he, is lihaaz se sundar bhaav he..

    प्यार का कुवाँरा अहसास हो तुम ..
    ise yadi pyaar ka pahla yaa anjana ahsaas jaisa kuchh kahte to baat me aour dam hota..kyuki pyaar ka kuvarapan..???aap kahna chah rahe the ki bilkul shudhdha pyaar, he na?..kuvara pyaar to esa laga mano kisi tarajoo me toula jaa raa ho ki kuavara he yaa nahi...
    pyaar sirf pyaar he apne tamaam visheshano ko samete..
    मेरे ह्रदय की धड़कन बनकर मुझे थामा ,
    क्या इसलिए की मेरे पास हो तुम ;
    या फिर क्योंकि मैं हूँ तुमने मग्न,कहो न कि, मुझमे समायी हुई हो तुम !!
    कहो की , तुम मेरी हो प्रियतमा !!!
    yanha bhi thoda mujhe atpata saa laga..
    bura mat maaniyega..me koi posmartam nahi kar raha hu..aapme sundar bhaav he, sundar kalpana he..koi shaq nahi..

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  10. वाह ! वाह !!
    पूरी तरह से मन कर्म और वचन से
    पुकार लगाईं है ........
    एक-एक शब्द प्रिय और प्रियतमा के बीच पुल जैसा बन गया है
    कविता madhur है , एहसास कोमल हैं ...
    बधाई . . . . .
    ---मुफलिस---

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  11. विजय जी मुझे आपको जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है आप अति भावुक व्यक्ति हैं. ये अति भावुकता आप की रचनाओं में भी दिखाई देती है. आप बुरा न माने भावुकता आप की शक्ति भी है और कमजोरी भी.
    आप अपनी कविताओं को लिख कर कुछ समय के लिए भूल जाएँ...फिर उसे पढें तभी आपको उसमें कमियां नजर आएँगी जिन्हें सुधारें और तब पूर्ण रूप से आश्वस्त होने पर ही पोस्ट करें.
    आप की इस कविता में मेघों की उड़ान और बरसात की सौंधी सुगंध का जिक्र बार बार आया है....जो अटपटा लगता है...ये भी स्पष्ट नहीं होता की आप इस कविता के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं...
    मैं भी सिर्फ वाह वा लिख कर आपको खुश कर सकता था लेकिन ऐसा किया नहीं क्यूँ की मुझे आशा है की आप मेरी बात को सही दिशा में समझ कर अपनी कमियों को दूर करेंगे...
    आप से स्नेह है इसलिए इतना लिख गया हूँ...आपका नाम होगा तो सबसे अधिक ख़ुशी मुझे ही होगी....इसमें कोई संदेह नहीं है. आप निरंतर अच्छा लिखे इस कामना के साथ...
    नीरज

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  12. मित्र,कविता तो हमेश| की तरह अच्छी है किन्तु अच्छा मित्र वही होता है जो कमियों को भी बताये .लगता है कविता बहुत जल्दी में लिखी गई है .में राजीव जी से इस बात पर सहमत हूँ कि लिखने के बाद कुछ समय पश्चात् फिर पढ़ना चाहिए तब कमियां नज़र आ जाती हैं.
    २.अन्य लागों की तरह मुझे भी विरोधाभास लगा .कौन हो ? फिर कहो ना .
    ये तो हुई कविता की बात .kam की व्यस्तता के बीच भी आप कविताओं के लिए समय बचा लेते हैं इसके लिए बधाई .
    तेजेंदर जी की शिकायत वाजिब नहीं है मेरी तो लगभग सारी रचनाये, कविता हो या कहानी प्रेम के ही इर्द-गिर्द हैं. shubhakamnaon sahit

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  13. शानदार कविता साहेब,,,,और उस से भी लाजवाब उस पर कमेंट,,,,,,,,,,
    वाह वाह वाह ,,,,,
    मैं तो आपके एस, एम्, एस , के हिसाब से पिछले वाली पर कमेंट देने आया था पर तब तक आप एक और छाप चुके थे......मैं तो निशब्द हूँ सर जी,,,,,,,,,,,बस दिल रो पडा है आँख ,,,
    टपक रही हैं,,,,,,,,,,,,,मुझे आपकी कविता में अपनी प्रियातामा याद अ गयी
    ,,ओह,,,आह,,,हाय,,
    हूंह,,,,,,,,,,,,
    अब अगली कविता छपते ही मुझे एस ,एम्, एस, जरूर कर देना,,,,आ[ने मुझे इस के बारे में नहीं बताया,,,,,,,,,,,मैं बड़ा नाराज हूँ ,,,पर एपी खुश होंगे,,,,,आप खुश रहे ,,,,मेरी दुआ कबूल हो,,,,
    अगले एस, एम् ,एस, के इन्तेजार में,,,
    मनु,,,,,,,,,,,,,,,,,

    ये वाला कमेंट सही है ना,,,,??
    छपेगा ना,,,,,????????????????//

    फिर से ,
    आपका ,,,,,
    मनु,,,,,,,,,,,,,

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  14. विजय जी !
    एक बार फिर आना पड़ा...
    सिर्फ ये कहने के लिए कि
    amitaabh ji, avinaash ji, नीरज जी, सीमा जी, और मनु जी की टिप्पणियों पर
    ज़रूर गौर करें ....
    सच्चे मित्र ही इस तरह के साफ़ और बेबाक
    विचार दिया करते हैं ......
    आप में कला है , संभावनाएं भी हैं .....
    और अब तो ज़ाहिर है ...मार्ग-दर्शन भी है .

    खैर-ख्वाह . . . . .
    ---मुफलिस---

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  15. बहुत सुंदर लगी है आपकी 'प्रियतमा'!
    'प्यार का कुंवारा अहसास हो तुम!!' -
    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है।
    पूरी कविता पढ़ने में आनंद आगया।
    महावीर शर्मा

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  16. wah vijey jee bahut hi khub kavita likhi hai......

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  17. very nice poem...with beautiful similies....i simply fall in love with ur priyatama...aapne unki itni sundar chhavi ankan ki h ki koi bhi unn se prem kar baithega...and thanks for ur comment for my poem...
    thanks

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