Monday, November 24, 2008

भोर

भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा,

रवि ने किया दूर ,जग का दुःख भरा अन्धकार ;
किरणों ने बिछाया जाल ,स्वर्णिम किंतु मधुर
अश्व खींच रहें है रविरथ को अपनी मंजिल की ओर ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी रथ का सार्थ बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

सुंदर प्रभात का स्वागत ,पक्षिगण ये कर रहे
रही कोयल कूक बागों में , भौंरें ये मस्त तान गुंजा रहे ,
स्वर निकले जो पक्षी-कंठ से ,मधुर वे मन को हर रहे ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी गगन का पक्षी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

खिलकर कलियों ने खोले ,सुंदर होंठ अपने ,
फूलों ने मुस्कराकर सजाये जीवन के नए सपने ,
पर्णों पर पड़ी ओस ,लगी मोतियों सी चमकने ,
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी मधुबन का माली बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रभात की ये रुपहली किरने ,प्रभु की अर्चना कर रही
साथ ही इसके ,घंटियाँ , मंदिरों की एक मधुर धुन दे रही ,
मन्त्र और श्लोक प्राचीन , पंडितो की वाणी निखार रही
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी देवालय का पुजारी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रक्रति ,जीवन के इस नए भोर का स्वागत कर रही
जैसे प्रभु की सारी सृष्टि ,इस का अभिनन्दन कर रही ,
और वसुंधरा पर ,एक नए युग ,नए जीवन का आव्हान कर रही ,
तू भी हे मानव ,इस जीवन रूपी सृष्टि का एक अंग बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

10 comments:

  1. बहुत ही बढिया एक साहित्यक रचना है।प्राकृति पर बहुत सुन्दर रचना लिखी है।बधाई स्वीकारें।

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  2. अच्छे भाव....
    सुसंगठित भाषा


    सभी पंक्तियाप्रसंशनीय

    बहुत शुभांग दर्शन...

    और हाँ दिल कभी धडकना नही भूलता .....

    हमेशा याद रहेंगे आप.........

    आपकी रचनाये .........

    मेरे अमर शायर ........



    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है आने के लिए
    आप
    ๑۩۞۩๑वन्दना
    शब्दों की๑۩۞۩๑
    सब कुछ हो गया और कुछ भी नही !!
    इस पर क्लिक कीजिए
    मेरी शुभकामनाये आपकी भावनाओं को आपको और आपके परिवार को
    आभार...अक्षय-मन

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  3. ..bhor ! arthaat nai shuruaat, nai soch, naye maarg, naya silsilaa, nai umang....aur in sb ka vistrit varnan karvaane mei sakhshm rahi aapki ye nai kavita. Harsho.ulaas, prakritik saundryaa, mithihaasik swar, aur in sb se barh kr aapki paavas bhaavnaaeiN poorn roop se ujaagar ho rahi haiN. Iss kavita mei bhasha aur shilp ka sumel rachnakaar ke vyaktitv ka darpan bn kr ubhra hai. "jaise Prabhu ki saari srishti is ka abhinandn kr rahi" ye keh kr aapne saarthak bna diya apni iss kriti ko. to! priy anuj ! jg ke manuj ko jgaane ke prayaas hetu dhanyavaad aur shubhkaamnaaeiN. ---MUFLIS---

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  4. बहुत अच्छे भाव हैं... बहुत-बहुत बधाई...

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  5. जारी रखें इतना सुंदर लिखना! अच्छा लगा!

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  6. खिलकर कलियों ने खोले ,सुंदर होंठ अपने ,
    फूलों ने मुस्कराकर सजाये जीवन के नए सपने ,
    पर्णों पर पड़ी ओस ,लगी मोतियों सी चमकने ,
    तू भी हे मानव ,जीवन रूपी मधुबन का माली बन जा !
    भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

    बहुत सुन्दर रचना लिखी है।बधाई स्वीकारें।

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  7. Behad saadgeebharee, manme aasha jagane waalee kavita....jobhi padhe palbharke liyehi sahee niashase hatke ummeedonse apna daman bhar le...!

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  8. भोर का यह सुन्दर चित्रण,लिये है प्यारा लक्ष्य.
    तमस-निराशा-काहिली, सबको करता भक्ष्य.
    सबको करता भक्ष्य, सुबह की आस जगाता.
    एक नये भारत का जैसे स्वप्न सजाता.
    कह साधक कवि, क्यों होते हो निराश मित्रन.
    पढो विजय की कविता, भोर का सुन्दर चित्रन.

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  9. बहुत अच्छे भाव हैं।बधाई स्वीकारें।

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