Friday, November 14, 2008

पागल



तेरी साँसे महकती है मेरी साँसों में,

तेरे होंठ दहकते है मेरे होंठों पर,

तेरी जुल्फों का साया है मेरे चेहरे पर ,

सारी दुनिया है मेरे पास ,
पर तू नही।


दुनियावालो देखो तो ज़रा मुझे ॥

सपने चिपका कर रखे है ..

मैंने अपने जिस्म पर !!

लोग कहते है कि,
मैं पागल हो गया हूँ……

और एक दिन मैंने सुना कि ,

तुने भी कहा है ... वो पागल हो गया है ॥

शायद ,
अब मैं ,
सच में ,
पागल हो गया हूँ..

4 comments:

  1. विजय जी आशिक और कवि पागल ही होते हैं अच्‍छी बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी आपने एक एक शब्‍द कमाल किया है आपने

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  2. sir , nice word and very good use (pagal ) word .

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  3. koi bada hai to koi chota hai.....
    yahan har koi pagal hota hai.....

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  4. ...vijay bhai ! aapki qalam aapke dil ki ek.ek baat samajhti hai, aapke dil ki ek.ek dharhkan ko pehchaan`ti hai...varnaa itni khoobsurat kavita ka janam kaise ho sakta tha. "sapne chipka kr rakkhe hai maine apne jism pr.." ye baat sach.much koi paglaa hi keh saktaa hai...sachche pyaar ka paglaa, sachche samarpan ka paglaa, ek bahot hi pyara.. samvedansheel paglaa. Itni achhi aur sachchi kavita ke liye dheron badhaaee. ---MUFLIS---

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