Wednesday, November 26, 2008

आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.......

ORIGINALLY , I BELONG TO NAGPUR. I AM BORN AND BROUGHTUP IN THIS WONDERFUL CITY; SEEN MOST OF MY LIFE'S UPS AND DOWNS HERE . RECENTLY ON 19TH FEB 2008, I LANDED AT NAGPUR AIRPORT AND I DON'T KNOW WHY, BUT ALL OF SUDDEN ALL THE PAST MEMORIES OF MY LIFE FLASHED UPON ME . I COMPOSED THIS POEM. I DEDICATE THIS POEM TO ALL THOSE, WHO LEAVE THEIR BIRTHPLACE; JUST IN THE SEARCH OF " एक अदद रोजी रोटी "……...

आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
बहुत पुराना सा सब कुछ याद दिला गया ;
मुझको ;
मेरे शहर ने रुला दिया.....

यहाँ की हवा की महक ने बीते बरस याद दिलाये ,
इसकी खुली ज़मीं ने कुछ गलियों की याद दिलायी....
यहीं पहली साँस लिया था मैंने ,
यहीं पर पहला कदम रखा था मैंने ...
इसी शहर ने जिन्दगी में दौड़ना सिखाया था.
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

दूर से आती हुई माँ की प्यारी सी आवाज ,
पिताजी की पुकार और भाई बहनो के अंदाज..
यहीं मैंने अपनों का प्यार देखा था ;
यहीं मैंने परायों का दुलार देखा था ;
कभी हँसना और कभी रोना भी आया था यहीं ,
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

कभी किसी दोस्त की नाखतम बातें..
कभी पढाई की दस्तक , कभी किताबो का बोझ
कभी घर के सवाल ,कभी दुनिया के जवाब ..
कुछ कहकहे ,कुछ मस्तियां , कुछ आंसू ,और कुछ अफ़साने .
थोड़े मन्दिर,मस्जिद और फिर बहुत से शराबखाने ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

पहले प्यार की खोई हुई महक ने कुछ सकून दिया
किसी से कोई तकरार की बात ने दिल जला दिया ..
यहीं किसी से कोई बन्धन बांधे थे मैंने ...
किसी ने कोई वादा किया था मुझसे ..
पर जिंदगी के अलग मतलब होते है ,ये भी यहीं जाना था मैंने ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

एक अदद रोटी की भूख ने आंखो में पानी भर दिया
एक मंजिल की तलाश ने अनजाने सफर का राही बना दिया..
कौन अपना , कौन पराया , वक्त की कश्ती में, बैठकर;
बिना पतवार का मांझी बना दिया मुझको,
"वही रोटी ,वही पानी ,वही कश्ती ,वही मांझी , मैं आज भी हूँ.."
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

लेकर कुछ छोटे छोटे सपनो को आंखों में ,मैंने ;
जाने किस की तलाश में घर छोड़ दिया,
मुझे जमाने की ख़बर न थी.. आदमियों की पहचान न थी.
सफर की कड़वी दास्ताँ क्या कहूँ दोस्तों ....
बस दुनिया ने मुझे बंजारा बना दिया ..
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

आज इतने बरस बाद सब कुछ याद आया है ..
कब्र से कोई “विजय” निकल कर सामने आया है..
कोई भूख ,कोई प्यास ,कोई रास्ता ,कोई मंजिल ..
किस किस की मैं बात करूं यारों ;
मुझे तो सारा जनम याद आया है.....
आज मेरे शहर ने मुझे बहुत रुलाया है........


9 comments:

  1. दूर से आती हुई माँ की प्यारी सी आवाज ,
    पिताजी की पुकार और भाई बहनो के अंदाज..
    यहीं मैंने अपनों का प्यार देखा था ;
    यहीं मैंने परायों का दुलार देखा था ;
    कभी हँसना और कभी रोना भी आया था यहीं ,
    आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया
    अच्छी कविता है .बस लिखते जाये. दिल को छू गई . बधाई .

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  2. its beautiful.... Aaj mere Shahar ne mujhe rula diya... vry gud :-)

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  3. वाह.... आपका अंदाज़ भी खूब है.. मित्र.

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  4. दर-ओ-दीवारों में कैद नहीं न सीमाओं में बंधा है
    मेरा मुल्क,मेरा देशा मेरा शहर,मेरे दिल में बसा है
    उमड़-उमड़ कर बोल रहा है उस शहर उस गली
    दोस्तों की टकरार फिर उनका प्यार माँ का दुलार
    सब अभी भी मेरे दिल बसा है....
    इसके लिए कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं.....
    आभार...अक्षय-मन

    ๑۩۞۩๑वन्दना
    शब्दों की๑۩۞۩๑

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  5. vijay jiii....
    aapki is kavita ko pad kar bhauk ho gayi...
    bahut achhe tarike se apne..dard aur samasyaon ko ujagar kiya hai..
    aur kya kahu..ekdum lajawab kavita..

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  6. बढ़िया भाव हैं..ऐसा ही होता है जब हम अपने शहर से दूर चले जाते हैं.

    लिखते रहिये.

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  7. यहीं मैंने अपनों का प्यार देखा था ;
    यहीं मैंने परायों का दुलार देखा था ;
    कभी हँसना और कभी रोना भी आया था यहीं ,
    आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया
    bahut khub shabdo ki nahi dil ki mala hai yah khub piroyi hai aapne aap ko badhai ho ....aap ki laikhni ki kala bahut uttam hai

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  8. विजय जी आपकी कविता ने तो मुझे भी रुला दिया 1 बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति...........

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  9. गहरी संवेदना से उपजी अभिव्‍यक्ति. मनोहर श्‍याम जोशी जी की निर्मम सी लगने वाली उक्ति दुहरा रहा हूं - 'कितना त्रासद है ये हास्‍य और कितना हास्‍यास्‍पद है ये त्रास'.

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