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एक अधूरी [ पूर्ण ] कविता
घर परिवार अब कहाँ रह गए है , अब तो बस मकान और लोग बचे रहे है बाकी रिश्ते नाते अब कहाँ रह गए है अब तो सिर्फ \बस सिर्फ...
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रूह की मृगतृष्णा में सन्यासी सा महकता है मन देह की आतुरता में बिना वजह भटकता है मन प्रेम के दो सोपानों में युग के सांस ल...
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वो एक अजीब सी रात थी , जो मेरे जीवन की आखरी रात भी थी ! ज़िन्दगी की बैचेनियों से ; घबराकर ....और डरकर ... मैंने मन की खिड़की से; बाहर झाँका ...
fizaye bhi janti hai ki unse kaun kitni mohabbat karta hai....
ReplyDeletetabhi to wo bhi aapke sath muskura rahi hai.....
अजी वाह इतनी सुन्दर जगह भी हो आए आप। सुन्दर फोटो।
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